तारीख और तवारीख के रिश्ते कभी-कभी कुछ पेचीदगियां गढ़ देते हैं।31 अक्तूबर को ही लीजिए। इस दिन आधुनिक भारत के निर्माता सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती है, तो हिन्दुस्तान की लौह महिला इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी। विवादों की आंच से स्वार्थों का तंदूर सुलगाने वाले राजनेता अक्सर ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के बारे में अधकचरे फैसले सुना देते हैं। यह इतिहास की मूल अवधारणा के साथ अन्याय है। जिस तरह तारीखें एक-दूसरे से बावस्ता होती हैं, वैसे ही महान व्यक्तित्वों में समानता के तमाम सूत्र पाए जाते हैं।
पहले पटेल की बात
सरदार वल्लभभाई पटेल को लेकर इधर किस्म-किस्म के विचार व्यक्त किए जा रहे हैं। कोई उन्हें नेहरू से महान साबित करने में जुटा है, तो किसी को ऐसे दावों पर आपत्ति है। जो लोग नेहरू और पटेल के बीच की चुनिंदा असहमतियों को विवाद का दर्जा देते हैं, उन्हें कुछ तथ्यों पर गौर फरमाना चाहिए। साल1947 की शुरुआत तक नेहरू, पटेल और तमाम अन्य नेताओं का रोल कमोबेश एक सा था। उनका मकसद समान था और लड़ाई का तरीका भी। वे ऐसे आंदोलन के अगुवा थे, जिसे देश के आमजन ने अपने खून-पसीने से सींचा था। इस जंग में शामिल होने के लिए जब उन्होंने अपने सुखद भविष्य को लात मारी थी, तब उन्हें इसका इलहाम नहीं था कि वे जीते जी अपना मकसद पूरा कर सकेंगे।
सरदार वल्लभभाई पटेल को लेकर इधर किस्म-किस्म के विचार व्यक्त किए जा रहे हैं। कोई उन्हें नेहरू से महान साबित करने में जुटा है, तो किसी को ऐसे दावों पर आपत्ति है। जो लोग नेहरू और पटेल के बीच की चुनिंदा असहमतियों को विवाद का दर्जा देते हैं, उन्हें कुछ तथ्यों पर गौर फरमाना चाहिए। साल1947 की शुरुआत तक नेहरू, पटेल और तमाम अन्य नेताओं का रोल कमोबेश एक सा था। उनका मकसद समान था और लड़ाई का तरीका भी। वे ऐसे आंदोलन के अगुवा थे, जिसे देश के आमजन ने अपने खून-पसीने से सींचा था। इस जंग में शामिल होने के लिए जब उन्होंने अपने सुखद भविष्य को लात मारी थी, तब उन्हें इसका इलहाम नहीं था कि वे जीते जी अपना मकसद पूरा कर सकेंगे।
बापू उनके सर्वमान्य नेता थे और कांग्रेस थोडे़ मत-मतांतरों के साथ समानता के सूत्र तलाशने में कामयाब रही थी, पर अगस्त आते-आते हालात बदल गए। नए उभरते लोकतंत्र को एक प्रधानमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद की आवश्यकता थी। कल तक जो लोग साथ लड़ रहे थे, उनमें से एक को नेतृत्व करना था और अन्यों को सहयोगी की भूमिका निभानी थी। अगर नेहरू की जगह पटेल अथवा राजगोपालाचारी या कोई और होता, तो कहानी के किरदार भले ही बदल गए होते, पर कहानी का ‘प्लॉट’ यही रहता। वे सियासी सहचरी के दिन थे, आज की तरह अनुचरी के नहीं।
इसीलिए कुछ मुद्दों पर अगर नेहरू और पटेल में हम असहमति की खतो-किताबत पाते हैं, तो उनमें सहमति की कशिश और परस्पर सम्मान के भाव भी नजर आते हैं। बाद के दिनों में भारत ने वंशवाद अथवा नेता विशेष की झंडाबरदारी को अपना लिया, इसलिए असहमतियां सार्वजनिक जीवन से नदारद हो गईं। क्या यह विचार का विषय नहीं कि असहमतियों के बावजूद हमारी पहली सरकार भारत के एकीकरण के साथ तमाम ऐसी संस्थाओं की स्थापना में कामयाब हो गई! वही संस्थाएं और परंपराएं आज तक हमारे लोकतंत्र की रक्षा कर रही हैं।
नेहरू और पटेल के रिश्ते को समझने के लिए उन्हीं दिनों में लौटना होगा। मौजूदा अनुभवों के आधार पर अतीत को आंकना कभी-कभी खतरनाक साबित होता है। इसकी कीमत कोई और नहीं, बल्कि खुद सरदार पटेल चुका रहे हैं। वह अगर विवादप्रिय व्यक्ति होते, तो बिना खास खून-खराबे के 550 से अधिक रियासतों का भारतीय संघ में विलय कैसे करा पाते? यहां एक संयोग का जिक्र जरूरी है। पटेल की पहली चुनावी जंग और इंदिरा गांधी के जन्म का यह शताब्दी वर्ष है। जनवरी 1917 में सरदार ने अहमदाबाद म्युनिसपैलिटी का चुनाव जीता था। उन्हें महज एक वोट से वह चुनावी फतह हासिल हुई थी।
सरदार वल्लभभाई पटेल के व्यक्तित्व को जानने के लिए हमें उनके कृतित्व को दो भागों में बांटना होगा- आजादी के पहले, स्वतंत्रता के पश्चात। उनके बारे में जब भी बात होती है, तो उन्हें भारतीय एकीकरण का नायक बताकर लोग रुखसत हो लेते हैं, जबकि 1928 के बारदोली सत्याग्रह ने न केवल उनकी संवेदनशील नेतृत्व क्षमता को उजागर किया, बल्कि उन्हें नई पहचान भी दी। बारदोली की महिलाओं ने ही उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि से नवाजा था। आप पूछेंगे, महिलाएं क्यों? बताता हूं।
यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि पटेल उन नेताओं में एक थे, जिन्होंने राजनीति में स्त्रियों के साथ भेदभाव का खुलकर विरोध किया था। सरदार ने ‘डिस्ट्रिक्ट म्युनिसिपल एक्ट’ से उस सेक्शन 15 (1) (सी) को खत्म करवाया, जो औरतों को चुनाव लड़ने से रोकता था। उनकी यह दलील थी कि निर्वाचित सदन से औरतों को बाहर रखने का मतलब अहमदाबाद की आधी आबादी के प्रतिनिधित्व को समाप्त करना है। इस नेक निर्णय के ठीक 40 बरस बाद यानी 1966 में इंदिरा गांधी ने बहैसियत प्रधानमंत्री हिन्दुस्तान की बागडोर सम्हाली थी।
पटेल के बरक्स इंदिरा गांधी वंशवाद की उपज थीं। उन्होंने समय गुजरने के साथ-साथ ‘एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति’ की परंपरा को बल दिया। 1975 में इंदिरा ने देश पर आपातकाल तक थोप दिया, परंतु इससे भारत को ताकतवर बनाने में उनका योगदान खत्म नहीं हो जाता। सिक्किम के हिन्दुस्तान में विलय और पाकिस्तान के विभाजन के जरिए उन्होंने साबित कर दिया कि देश की सीमाओं में बढ़ोतरी के साथ सुरक्षा मामलों में वह अद्वितीय हैं। सिर्फ यही दो कार्य उन्हें अमर करने के लिए पर्याप्त हैं, हालांकि उनके खाते में और भी बहुत कुछ है। पटेल ने देश का एकीकरण किया था और नेहरू ने जमींदारी प्रथा का खात्मा। इंदिरा गांधी ने ‘प्रिवी पर्स’ खत्म कर देश से राजा-महाराजा युग को सदा-सर्वदा के लिए विदा कर दिया। उन्होंने ऐसे तमाम काम किए, जो आम आदमी के हक-हुकूक के लिए जरूरी थे। इसीलिए आपातकाल और ऑपरेशन ब्लू स्टार के बावजूद इंदिरा गांधी एक जनप्रिय शासक साबित हुईं। जिन लोगों ने 31 अक्तूबर, 1984 को उनकी हत्या के बाद देश भर में लोगों को रोते हुए देखा था, वे इसकी हामी भरेंगे।
कौन कहता है कि वह अलोकतांत्रिक थीं?
अगर मैं पटेल को आधुनिक भारत का निर्माता और इंदिरा गांधी को वर्तमान भारत की जननी कहूं, तो शायद कुछ लोगों को अच्छा न लगे, पर यह सच है कि इंदिरा के अलावा कोई अन्य प्रधानमंत्री आज तक न तो देश की सीमा को बढ़ा सका और न ही पाकिस्तान जैसे चिर शत्रु के टुकडे़ कर सका। रही बात उनसे जुड़े विवादों की, तो मैं इन्हें बुरा नहीं मानता। संसार के सबसे बडे़ लोकतंत्र को स्वस्थ ‘डिबेट’ का हक हासिल होना ही चाहिए। तकलीफ तब होती है, जब हम निजी छींटाकशी पर उतर आते हैं। थोथे तर्कों की यह कालिख न केवल हमारे पुरखों की मर्यादा को धूमिल करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर वैचारिक प्रदूषण का अभिशाप भी थोप देती है। इससे बचने के लिए हमें किसी पटेल या इंदिरा की समीक्षा की नहीं, बल्कि अपने अंदर झांकने की जरूरत है। इस नेक काम के लिए 31 अक्तूबर से अधिक बेहतर भला और कौन सा दिन हो सकता है?
अगर मैं पटेल को आधुनिक भारत का निर्माता और इंदिरा गांधी को वर्तमान भारत की जननी कहूं, तो शायद कुछ लोगों को अच्छा न लगे, पर यह सच है कि इंदिरा के अलावा कोई अन्य प्रधानमंत्री आज तक न तो देश की सीमा को बढ़ा सका और न ही पाकिस्तान जैसे चिर शत्रु के टुकडे़ कर सका। रही बात उनसे जुड़े विवादों की, तो मैं इन्हें बुरा नहीं मानता। संसार के सबसे बडे़ लोकतंत्र को स्वस्थ ‘डिबेट’ का हक हासिल होना ही चाहिए। तकलीफ तब होती है, जब हम निजी छींटाकशी पर उतर आते हैं। थोथे तर्कों की यह कालिख न केवल हमारे पुरखों की मर्यादा को धूमिल करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर वैचारिक प्रदूषण का अभिशाप भी थोप देती है। इससे बचने के लिए हमें किसी पटेल या इंदिरा की समीक्षा की नहीं, बल्कि अपने अंदर झांकने की जरूरत है। इस नेक काम के लिए 31 अक्तूबर से अधिक बेहतर भला और कौन सा दिन हो सकता है?
【साभार】HT
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