गुरुवार, 6 मार्च 2014

अजय माकन जबसे मीडिया प्रभारी बने हैं तब से उनका ज्यादा समय अपनी ही पार्टी के नेताओं के बयान से से पार्टी का पीछा छुड़ाने में लग रहा है. कभी आफ रिकार्ड तो कभी आन रिकार्ड. एक बयान पर सफाई दे राहत की सांस लेते हैं तब तक दूसरा बयान विवाद खड़ा कर चुका होता है. बयानबाजी का आलम ये है कि राहुल गांधी को चेतावनी देनी पड़ी कि नेता एक सुर में बोलें औऱ पार्टी लाईन पर बोले. लेकिन उसका भी असर इन बयान बहादुर नेताओं पर पड़ते दिख नही रहा. उदाहरण है भूख औऱ गरीबी पर चल रही ताजा बयानबाजी.


राशिद मसूद कहते हैं कि दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में 5 रूपये में एक वक्त का खाना मिलता है. तो राज बब्बर साहब का बयान आता है कि मुंबई में 12 रूपये में खाना मिलता है. ये दोनों ही बयान न सिर्फ गरीबी औऱ भूख का मजाक उड़ाते दिखते हैं बल्कि मज़ाक से आगे बढ़ क्रूरता की हद भी पार कर जाते हैं. लेकिन कांग्रेस को इस बयान से होने वाला नफा नुकसान 24 घंटे बाद समझ में आया औऱ तभी उसकी संवेदनशीलता भी जागी.
एक बार फिर अजय माकन सफाई देते नज़र आये. कांग्रेस ने अपने दो नेताओं रशीद मसूद औऱ राज बब्बर के बयान से किनारा कर लिया. कहा कि ये उनके निजी विचार हैं. तो थोड़ी ही देर में राज बब्बर का माफीनामा आ गया. कहा कि नही चाहता कि मेरे बयान की वजह से पार्टी को कोई नुकसान हो और साथ ही अपने बयान पर खेद जताया. उन लोगों से माफी मांगी जिन्हें उनके इस बयान से ठेस पहुंचा हो.
लेकिन कांग्रेस औऱ राज बब्बर दोनों को ये समझना पड़ेगा कि बयान पर माफी मांग लेने या किनारा कर लेने से ये बात खत्म नही होती. क्योंकि जहां देश की एक बड़ी आबादी गरीबी औऱ भूख से हर रोज जूझती है वहां इस तरह की बयानबाजी? ये बयान साफ करते हैं कि ये नेता कितने जमीन पर है. जनता की दुख दर्द के कितने करीब हैं. ये जानते हुए भी कि पांच रूपये में दिल्ली में कहीं एक वक्त का खाना नही मिलेगा फिर भी हमने जामा मस्जिद इलाके में जानने की कोशिश की कि पांच रूपये में क्या वाकई खाना मिलता है.
एक दिलचस्प जवाब मिला कि पांच रूपये में खाना तो नही लेकिन पेट भर कर दुआ मिलेगी. मसूद साहब जामा मस्जिद इलाके में पांच रूपये में खाना मिलता होगा लेकिन वो तब जब आप जनता से रूबरू रहे होंगे, उसके बीच रहे होंगे. याद कीजिए आखिरी बार आप कब गए थे इस इलाके में खाना खाने, तो फिर शायद आपको अपने बयान की सच्चाई खुद समझ में आ जाएगी. आपकी पार्टी के आफिस में भी पांच रूपये में खाना नही मिलता, कभी वहीं तशरीफ ले जाते चीजों की कीमत पता चल जाती. एकबारगी यकीन नही होता कि ये नेता जमीनी हकीकत से इतने दूर हैं.
दरअसल इस पूरी बयानबाजी की शुरूआत हुई योजना आयोग के उस आंकड़े से जिसमें ये दावा किया गया कि देश में गरीबी कम हो गयी है. इसके मुताबिक देश में गरीबों का अनुपात 2004-5 के 37.2 फीसदी से गिरकर 2011-12 में 21.9 फीसदी हो गया हैं. गरीबी की सीमा रेखा शहरी इलाके के लिए प्रति व्यक्ति 1000 रूपये की आमदनी औऱ ग्रामीण इलाके के लिए 816 रूपये मानी गयी.
ये मानक तेंदुलकर कमेटी की पद्धति के आधार पर तय हैं जो पिछले साल काफी विवादों में रहा. क्यूंकि इसमें एक व्यक्ति के लिए ग्रामीण इलाके में 27.20 और शहरी इलाके में 33.33 रूपये प्रतिदिन की आमदनी को आधार माना गया. जिसके बाद नई पद्धति तय करने के लिए डाक्टर सी रंगराजन की अध्यक्षता में एक्सपर्ट कमेटी बनायी गयी जो अगले साल अपनी रिपोर्ट देगी. लेकिन जबतक नई पद्धति के तहत नए मानक तय नही हो जाते तब तक योजना आयोग ने पुराने मानक के आधार पर ही ये आंकड़े जारी किए.
जाहिर है जहां कांग्रेस का हाथ गरीब के साथ का नारा देने वाली पार्टी इसका श्रेय लेने में जुटी तो वहीं विपक्ष इसे चुनाव के मद्देनज़र यूपीए का परफार्मेंस सुधराने की साजिश करार देने में. योजना आयोग के इन आंकड़ों को सही ठहरा इसे यूपीए सरकार की सफलता का ताज बनाने की होड़ में कांग्रेस के नेता बयानबाजी करते चले गए. अपनी ही पार्टी औऱ सरकार की बार बार दोहराई इस सच्चाई को भी सीधे नज़रअंदाज कर दिया कि महंगाई एक चिंता का विषय है.
इस साल के अंत तक में होने वाले विधानसभा चुनाव औऱ फिर अगले साल लोकसभा चुनाव की चिंता यूपीए सरकार के सर चढ़कर बोल रही है. देश के आर्थिक हालात, गिरता रूपया, बढ़ती कीमतें औऱ घटती नौकरी ने मध्यम वर्ग को पहले ही  यूपीए के प्रति सशंकित कर दिया है. सरकार के हालिया आर्थिक फैसलों को जिसे दूर करने की कोशिश के तौर पर पर देखा जा सकता है.
इसके साथ ही कांग्रेस औऱ यूपीए सरकार को लगता है कि गरीबी कम करने का तमगा लेकर शायद वो आर्थिक मोर्चे पर इंक्लूसिव ग्रोथ वाला अपना चेहरा सामने करे तो फायदे में रहेगी. फूड सिक्योरिटी आर्डिनेंस हो या एफडीआई का फैसला कांग्रेस ने प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी ही पीठ जमकर थपथपायी, पार्टी के बड़े नेता औऱ मंत्री इसपर बहस में उतरे. मकसद ये कि यूपीए के कार्यक्रमों औऱ योजनाओं का प्रचार प्रसार हो लेकिन दिक्कत ये है कि चर्चा औऱ विवाद का केन्द्र बन रहे हैं उसके अपने ही नेताओं के इस तरह के बेतुके बयान.

साहेब का मेरठ...2014 में 1857 का गदर और 2019 में गालिब की 'सराब'

2 फरवरी 2014 और 28 मार्च 2019 का अंतर सिर्फ तारिख भर का नही है । बल्कि भारत जैसे देश में कोई सत्ता कैसे पांच बरस में हाफंने लगती है । कैस...