रविवार, 31 मार्च 2019

साहेब का मेरठ...2014 में 1857 का गदर और 2019 में गालिब की 'सराब'

2 फरवरी 2014 और 28 मार्च 2019 का अंतर सिर्फ तारिख भर का नही है । बल्कि भारत जैसे देश में कोई सत्ता कैसे पांच बरस में हाफंने लगती है । कैसे पांच बरस में सपने जगाने का खेल खत्म होता है । पांच बरस में कैसे चेहरे की चमक गायब हो जाती है । पांच बरस बाद कैसे पांच बरस पहले का वातावरण बनाने के लिये कोई क्या क्या कहने लगता है । सबकुछ इन दो तारिखो में कैसे जा सिमटा है इसके लिये 2 फरवरी 2014 में लौट चलना होगा जब मेरठ के शताब्दी नगर के मैदान में विजय संकल्प रैली के साथ नरेन्द्र मोदी अपने प्रधानमंत्री बनने के लिये सफर की शुरुआत करते है । और प्रधानमंत्री बनने के लिये जो उत्साह जो उल्लास बतौर विपक्ष के नेता के तौर पर रहता है और जिस उम्मीद को जगा कर प्रधानमंत्री बनने के लिये बेताब शख्स सपने जगाता है । सबकुछ छलक रहा था । तब सपनो के आसरे जनता में खुद को लेकर भरोसा पैदा करने के लिये सिस्टम - सत्ताधारियो से गुस्सा दिखाया गया । गुस्सा लोगो के दिल को छू रहा था । नारे मोदी मोदी के लग रहे थे । तबकुछ स्वत:स्फूर्त हो रहा है तब मबसूस यही हुआ । लेकिन वही शख्स पांच बरस बाद 28 मार्च 2019 को  बतौर प्रधानमंत्री जब दोबारा उसी मेरठ में  पहुंचता है । और पाच बर पहले की तर्ज पर चुनावी रैली की मुनादी के लिये मेऱठ को ही चुनता है तो पांच बरस पहले उम्मीद से सराबोर शख्स पांच बरस बाद  डरा सहमा लगता है ।  उत्साह-उल्लास का मुखौटा लगाये होता है । किसान मजदूर का जिक्र करता है तो वह भी मुखौटा लगता है । जनता में उम्मीद और भरोसा जगाने के लिये सिस्टम या सत्ताधारियो के प्रति आक्रोष नहीं दिखाता बल्कि सपनो की ऐसी दुनिया को रचना चाहता है जहा सिर्फ वह खुद ही हो । वह खुद ही देश हो । खुद ही संविधान हो । खुद ही सिस्टम । खुद ही आदर्श हो । तो ऐसे में शब्द वाण सही गलत नही देखते बल्कि शबदो का ही चीरहरण कर नई नई परिभाषा गढ करने की मदहोशी में खो जाते है । उसी से निकलता है 'सराब' ।  तो कुछ भी कहने की ताकत प्रधानमंत्री पद में होती है ...लेकिन कुछ भी कहने की सोच कैसे बातो के खोखलापन को उभार देती है ये भी खुले तौर पर उभरता है । यानी 2014 में मेरठ से शुरु हुये चुनावी प्रचार की मुनादी में 1857 के प्रथम स्वतत्रका संग्राम के जरीये काग्रेस के स्वतंत्रता आंदोलन पर निसाना साधने का माद्दा नरेन्द्र मोदी रखते है । लेकिन 2019 में उनके सामने काग्रेस नहीं बल्कि सपा-आरएलडी-बसपा का गठबंधन है तो वह तीनो को मिलाकर "सराब" शब्द की रचना कर देते है । मौका मिले तो यू ट्यूब पर नरेन्द्र मोदी का 2 फरवरी 2014 का भाषण और 28 मार्च 2019 का भाषण जरुर सुनना चाहिये । क्योकि दोनो भाषण के जरीये मोदी ने लोकसभा चुनाव में भाषण देने की रैलियो से शुरुआत की । और किस तरह पांच बरस में मुद्दो को लेकर । शब्दो को लेकर । सोच को लेकर । विचार को लेकर । सिस्टम को लेकर । या फिर देश कैसा होना चाहिये इस सोच को परोसने में कितना दिवालियापन आ जाता है , इसकी कल्पना करने की जरुरत नहीं है । सिर्फ उन्ही के मेरठ रैली के  भाषणो को सुन कर आप ही को तय करना है । वैसे सराब शब्द शराब होती नहीं । लेकिन भाषण देते वक्त देश के प्रधानमंत्री मोदी को शायद इतिहास के पन्नो में झांकने की जरुरत होनी चाहिये या फिर उन्होने झांका तो जरुर होगा क्योकि 2014 के भाषण में वह 1857 के गदर का जिक्र कर गये थे तो 2019 में सराब शब्द से शायद उन्हे गालिब याद आ रहे होगें क्योकि गालिब तो 1857 में भी दिल्ली से मेरठ शराब लेने ही जाया करते थे । खैर इतिहास को देश के प्रधानमंत्री की तर्ज पर याद करने लगेगें तो फिर इताहिस भी कितना गड्डमगड्ड हो जायेगा इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है । और समझ के खोखलेपन की  कल्पना तो अब इस बात से भी की जा सकती है कि कैसे चौबिसो घंटे सातो दिन न्यूज चैनलो पर बीजेपी के प्रवक्ता या मोदी कैबिनेट के मंत्री क्या कुछ आकर कहते है । शब्दो की मर्यादा को प्रवक्ता भूल चुके है या फिर उनकी सत्ता का वातावरण ही उन्हे ऐसी सथिति में ले आया है जहा उनका चिल्लाना, झगडना, गाली गलौच करना , बिना सिरपैर के तर्क गढना , आंकडो का पहाड खडा कर मोदी से उस पर तिरगा फहरा देना । फिर सीमा की लकीर समाज - समुदाय के भीच खिंचकर शहादत के अंजाद में खुद को देशभक्त करार देना या फिर सामने वाले को देशद्रोही करार देते हुये खुद को देशभक्ति का तमगा दे देना । खोखले होते बैको तले देशहीत जोड देना । घटते उत्पादन और बढती बेरोजगारी से अपने इमानदार होने के कसीदे गढ लेना ।  जाहिर है जो लगातार कहा जा रहा है और जिस अंदाज में कहा जा रहा है वह सियासत की सस्कृति है या फिर वाकई देश को बीते पांच बरस में इतना बदल दिया गया है कि देश की सस्कृति ही गाली-गलौच वाली हो गई । लिचिंग से लेकर लाइन में खडे होने से मौत । गौ वध के नाम पर हत्या। आंतक-हिंसा को कानून व्यवस्था के फेल होने की जगह घर्म या समुदायो में जहर खोलने का हथियार । बिगडती इक्नामी से बेहाल उघोग त्रसदी में फंसे व्यापारी और काम ना मिलने से दो जून की रोटी के लिये भटकते किसान- मजदूर  के सामने भ्रष्ट्रचार मुक्त भारत के लिये उठाये कदम से तुलना करना । शिक्षा के गिरते स्तर को पश्चमी शिक्षा व्यवस्था से तुलना कर भारतीय सस्कृति का गान शुरु कर देना ।
जाहिर है जब सत्ता में है तो जनता ने चुना है के नाम पर किसी भी तरह की परिभाषा को गढा तो जा सकता है । और देश के सर्वौच्च संवैधानिक पदो पर बैठा शख्स संविधान को ढाल बनाकर पदो की महत्ता तले कुछ भी कहे सुनने वालो में भरोसा रहता है कि झूठ-फरेब तो ऐसे पदो पर बैठकर कोई कर नहीं सकता या कह नही सकता । लेकिन पांच बरस की सत्ता जब दोबारा उसी संवैधानिक पद पर चुने जाने के लिये चुनावी मैदान में "सराब" की परिभाषा तले खुद की महानता का बखान करें तो फिर अगला सवाल ये भी है कि क्या देश इतना बदल चुका है जहा बीजेपी के प्रवक्ता हो या दूसरी पार्टियो के नेता और इन सबके बीच एंकरो की फौज । जिन शब्दो के साथ जिस लहजे में ये सभी खुद को प्रस्तुत कर रहे है उसमें इनके अपने परिवार के भीतर ये मूखर्तापूर्ण चर्चा पर क्या जवाब देते होगें । बच्चे भी पढे लिख है और मां बाप ने भी अतित की उस राजनीति को देखा है जहा प्रधानमंत्री का भाषण सुन कर कुछ नया जानने या समझदार नेता पर गर्व करने की स्थितिया बनती थी । लेकिन जब कोई प्रधानमंत्री हरसेकेंड एक शब्द बोल रहा है । टीवी, अखबार, सोशल मीडिया , सभी जगह उसके कहे शब्द सुने-पढे जा रहे है । और पांच बरस के दौर में नौकरशाही या दरबारियो के तमाम आईडिया भी खप चुके है तो फिर भाषण होगा तो जुबां से "सराब" ही निकलेगा , जिसका अर्थ तो मृगतृष्णा है लेकिन पीएम ने कह दिया कि स और श मेंकोई अंतर नहीं होता फिर मान लिजिये  ' सराब ' असल में  ' शराब ' है । और याद कर लिजिये 1857 के मेरठ को जहा की गलियो में  दिल्ली से निकल कर गालिब पहुंचे है और गधे पर 'सराब' लाद ये गुनगुनाते हुये दिल्ली की तरफ रवाना हो चुके है ... आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक /  कौन जीता है तिरी जुल्फो के सर होने तक...
Punya Prasun Bajpai

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

पकौड़ा रोजगार या बेरोजगारों के लिये पकौड़ा-चाय

1947 : डेढ आने का बेसन । एक आने का आलू-प्याज । एक आने का तेल । तीन पैसे का गोयठा । कहे तो गोबर के उबले । चंद सूखी लकड़ियां । और सड़क के किसी मुहाने पर बैठ कर पकौडा तलते हुये एक दिन में चार आने की कमाई।  2018 : 25 रुपये का बेसन । दस रुपये का आलू प्याज । 60 रुपये का सरसों तेल । सौ रुपये का गैस । या 80 रुपये का कैरोसिन तेल । और सड़क के किसी मुहाने पर ठेला लगाकर पकौड़ा तलते हुये दिन भर में 200 से तीन सौ रुपये की कमाई ।  करीब चार आने खर्च कर चार आने की कमाई जब होती थी तब हिन्दुस्तान आजादी की खुशबू से सराबोर था। करीब 31 करोड़ की जनसंख्या में 21 करोड़ खेती पर टिके थे। और पकौड़े या परचून के आसरे जीने वालो की तादाद 50 से 80 लाख परिवारों की थी । और अब ठेले के अलावे दो सौ रुपये लगाकार दो सौ रुपये की कमाई करने वाला मौजूदा हिन्दुस्तान विकास के अनूठे नारों से सराबोर है । सवा सौ करोड़ की जनसंख्यामें 50 करोड़ खेती पर टिके है। और पकौड़े या परचून के आसरे जीने वालों की तादाद 10 से 12 करोड़ परिवारों की है । तो आजादी के 71 वें बरस में बदला क्या या आजादी के 75 वें बरस यानी 2022 में बदलेगा क्या। नेहरु के आधी रात को सपना देखा। 

मौजूदा वक्त में दिन के उजाले में सपने पाले जा रहे हैं। क्योंकि संगठित क्षेत्र में सिर्फ 2 करोड़ 80 लाख रोजगार देकर देश विकसित होना चाहता है । जबकि 45 करोड़ से ज्यादा लोग असंगठित क्षेत्र में रोजगार से जुड़े है । जो भविष्य नहीं वर्तमान पर टिका है। इसमें भी 31 करोड़ दिहाड़ी पर जीते है । यानी भविष्य छोड़ दीजिये । कल ही का पता नहीं है क्या कमाई होगी । तो कमाई और रोजगार से जुझते हिन्दुस्तान में पकौड़ा संस्कृति को तोडने के लिये  मनरेगा लाया जाता है तो करोडों खेत-मजदूर से लेकर दिहाडी करने वालो में आस जगती है कि दो सौ रुपये लगाकर हर दिन दो सौ कमाने की पकौडा संसक्कृति से तो छूटकारा मिलेगा । पर मनरेगा में 100 दिन का रोजगार देना भी मुश्किल हो जाता है । और लाखो लोग दुबारा पकौडा संस्कृति पर लौटते है । ये है कि 25 करोड 16 लाख मनरेगा मजदूरो की तादाद में सिर्फ 39,91,169 लोगो को ही सौ दिन मनरेगा काम मिल पाता है । और सरकार के ही आंकडे कहते है 2017-18 में 40 दिन ही औसत काम मनरेगा मजदूर को मिल पाया । यानी 40 दिन के काम की कमाई में 365 दिन कोई परिवार कैसे जियेगा  । जबकि 40 दिन की कमाई 168 रुपये प्रतिदिन के लिहाज से हुये 6720 रुपये । यानी जिस मनरेगा का आसरे रोजगार को खुछ हदतक पक्का बनाने की सोच इसलिये विकसित हुई कि पकौडे रोजगार से इतर देश निर्माण में भी कुछ योगदान देश के मजदूर दे सके । औऱ उसमें भी  देश के 25 करोड से ज्यादा मनरेगा मजदूरों में काम मिला सिर्फ 7 करोड़ को। और सालाना कमाई हुई 6720 रपये । यानी 18 रुपये 41 पैसे की रोजाना कमाई पर टिका मनरेगा ठीक है । या फिर दो
सौ रुपये लगाकर दौ सौ रुपये की कमाई वाला पकौडा रोजगार । 

जाहिर है पकौड़ा रोजगार में सरकार हर जिम्मेदारी से मुक्त है । लेकिन पकौडा रोजगार का अनूठा सच ये है कि शहरी गरीब लोगों के बीच पकौड़े बेच कर ज्यादा कमाई होती है । और जो नजारा देश के कमोवेश हर राज्य में बेरोजगारी का नजर आ रहा है उसके मुताबिक रोजगार दफ्तरो में रजिस्टर्ड बेरोजगार की तादाद सवा करोड पार कर गई है । और शहर दर शहर भटकते इन बेरोजगार युवाओं की जेब में इतने ही पैसे होते है । कि वह सडक किनारे पकौड़े और चाय के आसरे दिन काट दें । मसलन देश के सबसे ज्यादा शहरी मिजाज वाले महाराष्ट्र के आधुनिकतम पुणे, नागपुर , औरगाबाद समेत बारह शहरो में एक लाख से ज्यादा बेरोजगार छात्र
सडक पर निकल आये क्योकि  हर हाथ में डिग्री है पर काम कुछ भी नहीं । उस पर राज्य  राज्य पब्लिक सर्विस कमीशन ने सिर्फ 69 वैकेसी निकाली तो आवेदन करने वाले दो लाख से ज्यादा छात्रो में आक्रोश फैल गया । छात्रो में गुस्सा है क्योकि पिछले बरस  377 वैकसी की तुलना में इस बार सिर्फ 69 वैकसी निकाली गई । जबकि अलग अलग विभागों में 6 हजार से ज्यादा पद रिक्त है । यूं राज्य में करीब 20 लाख रजिस्ट्रड बेरोजगार है । और डिग्रीधारी बेरोजगार छात्रों के अलावे राज्य में 27 लाख 44 छात्र बेरोजगार ऐसे है जो तकनीकी तौर पर काम करने में सक्षम है पर इनके पास काम नहीं है । तो चाय-पकौडे पर कमोवेश हर हर बेरोजगार की सुबह-शाम कट जाती है । तो देश किस हालात को सच माने । 2 करोड 80 लाख संगठित क्षेत्र के रोजगार को देखकर या फिर 45 नकरोड से ज्यादा अंसगठित क्षेत्र में रोजगार करते लोगो को देखकर । क्योंकि अब तो  दो सौ रुपये पकौडे की कमाई से इतर पहली बार सरकार ने 1650 करोड रुपये स्कालरो को फेलोशिप देने के लिये मुहर लगा दी है । यानी फेलोशीप के तहत जो स्कालर चुने जायेगें उन्हे हर महीने 70 से 80 हजार रुपये दिये जायेगें । तो क्या अब सरकार जागी है जो उसे लग रहा है कि पढे लिखे छात्रो को स्कॉलरशीप देकर देश में रोका जा सकता है । क्योंकि देश का अनूठा सच तो यही है कि हर बरस 5 लाख छात्र उच्च शिक्षा के लिये विदेश चले जाते है । और देश का दूसरा अनूठा सच यही है कि सरकार का उच्च शिक्षा का बजट है 35 हजार करोड । जिसके तहत देश में साढे तीन करोड छात्र पढाई करते है । और जो पांच लाख बच्चे दूसरे देशो में पढने चले जाते है वह फीस के तौर पर 1 लाख 20 हजार करोड देते है । यानी दुनिया में पढाई के लिये जितना छात्रो से वसूला जाता है उस तुलना में सरकार देश में ही शिक्षा पर बेहद कम खर्च करती है । वजह भी यही है भारतीय शिक्षा संस्धानो का स्तर लगातार नीचे जा रहा है । इसी साल  आईआईटी बॉम्बे,आईआईटी मद्रास और इंडीयन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की रैकिंग तक गिर गई । यानी विदेश का अपना मोह है। और इस मोह को फेलोशिप के बरक्स नहीं तोला जा सकता। क्योंकि सवाल सिर्फ छात्रों का नहीं है । बीते बरस भारत के 7000 अति अमीरों ने दूसरे देश की नागरिकता ले ली। 2016 में यह आकंड़ा 6000 का था । और बीते 5 बरस का अनूठा सच ये भी है कि 90 फीसदी अप्रवासी भारतीय वापस लौटते नहीं हैं । तो क्या माना जाये पकौडा रोजगार वैसा ही मजाक है जैसे शिक्षा देने की व्यवस्था।
साभार-(PP वाजपेई)

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

अगर ग्रामीण भारत मोदी सरकार से रुठ गया तो 2019 में बंटाधार


केसरिया रंग देश के राजनीतिक सत्ता की हकीकत हो चुकी है। 19 राज्य केसरिया रंग में रंगे जा चुके हैं। पर इसी केसरिया रंग की प्रयोगशाला गुजरात में सात जिले मोरबी , गिर , सोमनाथ , अमरेली , नर्मादा , तापी , डांग , अरवल्ली  में तो एक भी सीट बीजेपी को नहीं मिली । जबकि सुरेन्द्र नगर , पोरबंदर , जूनागढ , बोटाड , द्वारका , पाटण , महिसागर और छोटा उदयपुर में सिर्फ 8 सीटें ही जीत पायी। यानी गुजरात के 15 ग्रामीण जिले में बीजेपी को सिर्फ 8 सीट मीली। तो  क्या गुजरात एक ऐसा अक्स है, जिसमें बीजेपी का सियासी उफान संघ परिवार का सामाजिक ढलान हो चला है। ये सवाल  इसलिये क्योंकि ग्रामीण भारत में जड जमाये आरएसएस के ज्यादातर संगठनों को समझ नहीं आ रहा है कि उनकी संघ की उपयोगिता सरकार की चुनावी सफलता पर टिकी है या फिर खुद के कार्यों पर। और इसकी सबसे बडी वजह तो यही है कि  मोदी सरकार की नीतियों से संघ परिवार के पांच संगठनों में तालमेल नहीं है। मसलन -बीएमएस, किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच, विहिप और बजरंग दल खुद को ठगे महसूस कर रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि इन संगठनों का अपना कोई आधार नहीं है। बीएमएस के देशभर में 1 करोड 12 लाख सदस्य हैं। किसान संघ के 18 लाख सदस्य हैं। स्वदेशी जागरण मंच के 5 हजार पदाधिकारी हैं। जिनका दावा है कि डेढ करोड़ लोगों पर सीधा प्रभाव है। वही आर्थिक नीतियों पर बंटते शहरी और ग्रामीण भारत से परेशान संघ के इन संगठनों से इतर हिन्दुत्व के नाम पर विहिप-बंजरग दल को लगता है कि उन्हें ठगा जा रहा है। और  विहिप-बजरंग दल के देशभर में 40 लाख सदस्य है । और संयोग से 24 से 30 दिसबंर तक भुवनेश्वर में होनी वाली विहिप की बैठक में इन्हीं मुद्दों पर चर्चा होगी। जिसमें संघ के तमाम महत्वपूर्ण पदाधिकारियों की मौजूदगी होगी  । 

और 2014 के बाद पहली बार गुजरात चुनाव ने संघ के भीतर ही इस सवाल को जन्म दे दिया है कि बीजेपी की कमजोर जीत के पीछे मोदी सरकार की आर्थिक नीतियो को देखें या संघ के आंख मूंद लेने को। और ये सवाल बीजेपी के लिये भी महत्वपूर्ण है कि अगर ग्रामीण गुजरात की तर्ज पर देश का ग्रामीण समाज  भी बीजेपी से बिफरा तो 2019 में होगा क्या। क्योंकि देश में 26 करोड 11 लाख ग्रामीण किसान - मजदूर हैं। और 2014 के लोकसभा चुनाव का सच यही है कि 83 करोड वोटरों में से 2014 में बीजेपी को कुल वोट 17,14,36,400 मिले। यानी देश अगर राजनीतिक तौर पर ग्रामीण और शहरी मतदाता में बंट गया तो फिर ये बीजेपी के लिये ही नहीं बल्कि संघ परिवार के लिये भी खतरे की घंटी होगी। क्योंकि संघ की साख बीजेपी की चुनावी जीत-हार पर नहीं टिकी है और ये बात 2004 में शाइनिंग इंडिया तले वाजपेयी की हार के बाद भी उभरा था। पर अगला सवाल तो यही है कि क्या ग्रामीण भारत की तरफ मोदी सरकार की नीतियां देख भी रही है। क्योंकि ग्रामीण भारत को सिर्फ किसानों के नजरिये सेदेखने की भूल कमोवेश हर सरकार ने किया है जबकि सच तो यही है कि देश की इक्नामी में ग्रमीण बारत का योगदान करीब 48 फिसदी है। नेशनल अकाउंट स्टेटिक्स ने इसी बरस जो आंकडे जारी किये उसके मुताबिक खेती [96 फिसदी], पशुधन [ 95 फिसदी ] , खनन [53 फिसदी ], उत्पादन [51 फिसदी ], निर्माण [47 फिसदी ], गोदाम [ 40 पिसदी], रियल इस्टेट-रोजगार [39 फिसदी ], बिजली-पानी-गैस [33 फिसदी ], व्यापार- होटल [28 फिसदी],प्रशासन-डिफेन्स [19 फिसदी ], वित्तीय सेवा [13 फिसदी ] । ये ग्रामीण भारत का ऐसा सच है जो अक्सर सिर्फ किसानों तक ही गांव को सीमित कर छुपा दिया जाता है । नेशनल अंकाउंट स्टेटिक्स ने इसी बरस ग्रामीम भारत के इन आंकडों को जारी किया जो साफ तौर पर बताता है कि देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान करीब 48 फिसदी है। 

ग्रामीण भारत की लूट पर शहरी विकास का मॉडल जा टिका है जो बाजारवाद को बढावा दे रहा है और लगातार शहरी व ग्रामीण जीवन में अंतर बढ़ता ही जा रहा है। तो सवाल तीन हैं। पहला, सिर्फ किसानों की दुगनी आय के नारे से ग्रामीणों की गरीबी दूर नहीं होगी । दूसरा, ग्रामीण भारत को ध्यान में रखकर नीतियां नहीं बनायी गई तो देश और गरीब होगा । तीसरा , ग्रामीण भारत की लूट पर विकास की थ्योरी चल रही है । ये तीनो सवाल ही देश के हकीकत है । क्योंकि एक तरफ देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान 50 फिसदी है। दूसरी तरफ ग्रमीण भारत में प्रति व्यक्ति आय शहरी भारत से आधे से भी कम है । आलम है कितने बुरे ये इससे भी समझा जा सकता है कि शहर में प्रति दिन प्रति व्यक्ति आय 281 रुपये है। गांव में प्रति व्यक्ति प्रति आय 113 रुपये है। यानी गांव में प्रति व्यक्ति आय मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी से भी कम है। कागजों पर ही सही पर मनरेगा में सबसे कम 168 रुपये मजदूरी बिहार-झारखंड में मिलती है। तो हरियाणा में सबसे ज्यादा 277 रुपये मिलते है। तो कल्पना कीजिये ग्रामीण भारत से फलती बढती इक्नामी से ग्रामीण भारत को ही कौन अनदेखा कर रहा है। पर सवाल सिर्फ कम आय का नहीं है बल्कि ग्रामीण भारत की लूट का है, जो बाजार के जरीये देश की इक्नामी में चाहे चार चांद लगाती हो पर असल सच तो यही है कि खनिज संसाधनों से लेकर अनाज और बाकि माद्यमों से ग्रामीण भारत की इके्नामी पर ही देश की आधी भागेदारी टिकी है। और उसी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। फसल-ग्रमीण और शहरी सोशल इंडक्स में अंतर क्योंकि खुद सरकार की ही रिपोर्ट बताती है कि जबकि इन आंकडो का सच तो यही है कि कि देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान करीब 48 फिसदी है। तो क्या गरीब गुरबों और गांव-खेत का जिक्र करते करते ही मोदी सरकार इन्हीं के कटघरे में जा खड़ी हुई है। या फिर चुनावी जीत के चक्कर में खामोश संघ परिवार के भीतर की कुलबुलाहट पहली बार बताने लगी है कि अगर वह भी खामोश रही तो आरएसएस के शताब्दी बरस 2025 तक उसकी साख का बांटाधार हो जायेगा।
pp vjpyee

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

बीमार सरकारी इलाज और लूट पर टिका प्राइवेट इलाज ...

खबर अच्छी है। दिल्ली के शालीमार बाग के जिस मैक्स हॉस्पीटल ने जीवित नवजात शिशुओं को मरा बता दिया था, उसका लाइसेंस दिल्ली सरकार ने रद्द कर दिया। और दो दिन पहले हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम के उस फोर्टिस हॉस्पीटल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी, जहां इलाज ना देकर लाखों की वसूली की  गई थी। और इंडियन मेडिकल एसोसियन ने बिना देर किये कह दिया कि ये तो गलत हो गया। क्योंकि गलती तो होती है और गलती होने पर लाइसेंस रद्द हो गया  तब तो देश के सभी सरकारी अस्पतालों को बंद करना पडेगा। यकीनन इंडियन मेडिकल एसोशियन ने सवाल तो जायज ही उठाया कि सरकारी अस्पतालों को सरकार  तब ठीक क्यों नहीं कर लेती। दो सवाल दो है। पहला, सरकार ने हेल्थ सर्विस से पल्ला क्यों झाड लिया है। दूसरा, भारत में हेल्थ सर्विस सबसे मुनाफे वाला धंधा कैसे बन गया। तो सरकार के नजरिये पर शर्म की जाये या फिर
जिन्दगी देने के नाम पर मुनाफा कमाने वाले निजी अस्पतालों पर शर्म की जाये। या मान लिया जाये कि जनता की चुनी हुई सरकारों ने ही जनता से पल्ला झाड़ कर पैसे वालों के हाथो में देश का भविष्य थमा दिया है। और उसमें हेल्थ  सर्विस अव्वल है। क्योकि देश में सरकारी हॉस्पीटल की तादाद 19817 है। वही प्राइवेट अस्पतालों की तादाद 80,671 है। यानी इलाज के लिये कैसे  समूचा देश ही प्राइवेट अस्पतालो पर टिका हुआ है। ये सिर्फ बड़े अस्पतालों की तादाद भर से ही नही समझा जा सकता बल्ति साढे छह लाख गांव वाले देश में  सरकारी प्राइमरी हेल्थ सेंटर और कम्युनिटी हेल्थ सेंटर की संख्या सिर्फ 29635 है। जबकि निजी हेल्थ सेंटरो की तादाद करीब दो लाख से ज्यादा है  । यानी जनता को इलाज चाहिये और सरकार इलाज देने की स्थिति में नहीं है। या कहें इलाज के लिये सरकार ने सबकुछ निजी हाथों में सौप दिया है। 

क्योंकि सरकार देश के नागरिकों पर हेल्थ सेक्टर के लिये खर्च कितना करती है। ये भी देख कर शर्म ही आयेगी। क्योंकि सरकार प्रति महीने प्रति व्यक्ति पर 92 रुपये 33 पैसे खर्च करती है। और राज्यों में सबसे बेहतर स्थिति हिमाचल की है जहा प्रति नागरिक प्रति महीने 166 रुपये 66 पैसे प्रति व्यक्ति प्रति  महीने खर्च करता है। तो ये कल्पना के परे है कि देश में चुनी हुई सरकारें अपने नागरिकों के लिये कोई जिम्मेदारी लेने की स्थिति में भी है कि नहीं।  क्योंकि भारत सरकार के बजट से दुगने से ज्यादा तो प्राइवेट हेल्थ सेक्टर मुनाफा कमा लेता है। हालात है क्या ये इससे भी समझा जा सकता है कि 2009  में सरकारी का बजट था 16,543 करोड करोड और प्राइवेट हेल्थ केयर का बजट रहा 1,43,000 करोड रुपये। फिर 2015 में सरकारी बजट हुआ 33150 करोड तो प्रईवेट हेल्थ केयर का बजट हो गया 5,26,500 करोड़ । 2017 में सरकार का  बजट है 48,878 करोड तो प्राइवेट हेल्थ केयर बढ़कर हो गया 6,50,000 करोड़ रुपये। और जब सरकार को ही ये कहने में कोई शर्म नहीं आती कि देश में इलाज का ठेका तो पूरी तरह प्राइवेट अस्पतालों पर है और आंकड़े बताते हैं कि 70 फिसदी से ज्यादा हिन्दुस्तान इलाज के लिये प्राइवेट अस्पतालों पर टिका है। और ये सब किस तेजी से बडा है ये इससे भी समझा जा सकता है कि प्राइवेट  और सरकारी सेक्टर के तहत 17 बरस पहले यानी 2000 में हिस्सेदारी 50-50 फिसदी थी। और सन 2000 में हेल्थ पर सरकारी बजट 2474 करोड था। तो  प्राईवेट हेल्थ सेक्टर का बजट 50 हजार करोड का था। यानी आज जो देश के सरकारी हेल्थ सर्विस का बजट 48 हजार करोड का है 17 बरस पहले ही प्राइवेट क्षेत्र मुनाफे के लिये हैल्थ सर्विस में पैसा झोंक चुका था। तो ऐसे में  मौजूदा हालात को समझें। देश के 10 नामचीन हॉस्पीटल्स चेन का टर्नओवर करीब 50 हजार करोड़ के आसापस है। यानी देश के कुल स्वास्थ्य बजट से भी ज्यादा।  तो अगला सवाल यही है कि हेल्थ सर्विस को धंधा माना जाये या फेल हो चुकी सरकारो तले जनता की त्रासदी। 

क्योंकि सरकार किस तरह के हेल्थ सर्विस को उपलब्ध कराती है। उसकी एक बानगी आईसीयू में पडे देश के किसी भी इलाके में किसी भी सरकारी अस्पतालो की देख लीजिये। कही अस्पताल में कुत्तों का झुंड तो कही स्टैचर तक नहीं। कही डॉक्टर के बदले प्यून ही टीका लगाते हुये। तो कही जमीन पर ही अस्पताल। कही पेड़ तले ही बच्चे को जनना। और सरकार की यही वह हेल्थ सेवा है जो हर उस शख्स को प्राइवेट अस्पतालों की तरफ ले जाती है,जिसकी जेब में जान बचाने के लिए थोड़ा भी पैसा है।और फिर शुरु होता है प्राइवेट अस्पतालों में मुनाफाखोरी का खेल क्योंकि फाइव स्टार सुविधाएं देते हुए अस्पताल सेवा भाव से कहीं आगे निकलकर लूट-खसोट  के खेल में शामिल हो चुके होते हैं,जहां डॉक्टरों को कारोबार का टारगेट दिया जाता है। छोटे अस्पतालों से मरीजों को खरीदा जाता है। यानी छोटे अस्पताल जो बडे अस्पातल के लिये रेफ्रर करते है वह भी मुनाफे का धंधा हो चुका है। फिर सस्ती दवाइयों को महंगे दाम में कई-कई बार बेचा जाता है। और जिन मरीजों का इंश्योरेंस है-उन्हें पूरा का पूरा सोखा जाता है। मुश्किल इतनी भर नहीं है कि जिीसकी जेब में पैसा है इलाज उसी के लिये है । मुश्किल तो ये भी है कि अब डाक्टरो को भी सरकारी सिस्टम पर भरोसा नहीं है। क्योंकि देश में 90 फिसदी डाक्टर प्राइवेट अस्पतालों में काम करते हैं।

इंडियन मेडिकल काउसिंल के मुताबिक देश में कुल 10,22,859 रजिस्टर्ड एलोपैथिक डाक्टर है । इनमें से सिर्फ 1,13,328 डाक्टर ही सरकारी अस्पतालों में हैं। तो फिर मरीजो को भी सरकारी अस्पतालो पर कितना भरोसा होगा। कौन भूल सकता है उड़ीसा के आदिवासी की उस तस्वीर को, जो कांधे पर पत्नी का शव लिये ही अस्पताल से निकल पड़ा। पर उस तस्वीर को याद कर विचलित होने से  पायदा नहीं क्योंकि सरकार के पास तो हेल्थ सर्विस के लिये अधन्नी भी नही। बीते 17 बरस में सरकारी हेल्थ बजट 2472 करोड से 48,878 करोड पहुंचा। इसी  दौर में प्राइवेट हेल्थ बजट 50 हजार करोड से साढ छह लाख करोड पहुंच गया ।यानी सरकारी सिस्टम बीमार कर दें और इलाज के लिये प्राईवेट अस्पताल  आपकी जेब के मुताबिक जिन्दा रखे। तो बिना शर्म के ये तो कहना ही पडेगा कि सरकार जिम्मेदारी मुक्त है और प्राईवेट हेल्थ सर्विस के लिये इलाज भी मुनाफा है और मौत भी मुनाफा है। क्योंकि दिल्ली के जिस मैक्स हास्पीटल का  लाइसेंस रद्द किया गया उस मैक्स ग्रुप का टर्न ओवर 17 हजार करोड पार कर चुका है। और सरकार के पास आम आदमी के सरकारी इलाज के लिये हर दिन का बजट सि 3 रुपये है।
(साभार )

रविवार, 12 नवंबर 2017

सियासी दलदल में पटेल-इंदिरा

तारीख और तवारीख के रिश्ते कभी-कभी कुछ पेचीदगियां गढ़ देते हैं।31 अक्तूबर को ही लीजिए। इस दिन आधुनिक भारत के निर्माता सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती है, तो हिन्दुस्तान की लौह महिला इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी। विवादों की आंच से स्वार्थों का तंदूर सुलगाने वाले राजनेता अक्सर ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के बारे में अधकचरे फैसले सुना देते हैं। यह इतिहास की मूल अवधारणा के साथ अन्याय है। जिस तरह तारीखें एक-दूसरे से बावस्ता होती हैं, वैसे ही महान व्यक्तित्वों में समानता के तमाम सूत्र पाए जाते हैं। 
पहले पटेल की बात 
सरदार वल्लभभाई पटेल को लेकर इधर किस्म-किस्म के विचार व्यक्त किए जा रहे हैं। कोई उन्हें नेहरू से महान साबित करने में जुटा है, तो किसी को ऐसे दावों पर आपत्ति है। जो लोग नेहरू और पटेल के बीच की चुनिंदा असहमतियों को विवाद का दर्जा देते हैं, उन्हें कुछ तथ्यों पर गौर फरमाना चाहिए। साल1947 की शुरुआत तक नेहरू, पटेल और तमाम अन्य नेताओं का रोल कमोबेश एक सा था। उनका मकसद समान था और लड़ाई का तरीका भी। वे ऐसे आंदोलन के अगुवा थे, जिसे देश के आमजन ने अपने खून-पसीने से सींचा था। इस जंग में शामिल होने के लिए जब उन्होंने अपने सुखद भविष्य को लात मारी थी, तब उन्हें इसका इलहाम नहीं था कि वे जीते जी अपना मकसद पूरा कर सकेंगे। 
बापू उनके सर्वमान्य नेता थे और कांग्रेस थोडे़ मत-मतांतरों के साथ समानता के सूत्र तलाशने में कामयाब रही थी, पर अगस्त आते-आते हालात बदल गए। नए उभरते लोकतंत्र को एक प्रधानमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद की आवश्यकता थी। कल तक जो लोग साथ लड़ रहे थे, उनमें से एक को नेतृत्व करना था और अन्यों को सहयोगी की भूमिका निभानी थी। अगर नेहरू की जगह पटेल अथवा राजगोपालाचारी या कोई और होता, तो कहानी के किरदार भले ही बदल गए होते, पर कहानी का ‘प्लॉट’ यही रहता। वे सियासी सहचरी के दिन थे, आज की तरह अनुचरी के नहीं।
इसीलिए कुछ मुद्दों पर अगर नेहरू और पटेल में हम असहमति की खतो-किताबत पाते हैं, तो उनमें सहमति की कशिश और परस्पर सम्मान के भाव भी नजर आते हैं। बाद के दिनों में भारत ने वंशवाद अथवा नेता विशेष की झंडाबरदारी को अपना लिया, इसलिए असहमतियां सार्वजनिक जीवन से नदारद हो गईं। क्या यह विचार का विषय नहीं कि असहमतियों के बावजूद हमारी पहली सरकार भारत के एकीकरण के साथ तमाम ऐसी संस्थाओं की स्थापना में कामयाब हो गई! वही संस्थाएं और परंपराएं आज तक हमारे लोकतंत्र की रक्षा कर रही हैं। 
नेहरू और पटेल के रिश्ते को समझने के लिए उन्हीं दिनों में लौटना होगा। मौजूदा अनुभवों के आधार पर अतीत को आंकना कभी-कभी खतरनाक साबित होता है। इसकी कीमत कोई और नहीं, बल्कि खुद सरदार पटेल चुका रहे हैं। वह अगर विवादप्रिय व्यक्ति होते, तो बिना खास खून-खराबे के 550 से अधिक रियासतों का भारतीय संघ में विलय कैसे करा पाते? यहां एक संयोग का जिक्र जरूरी है। पटेल की पहली चुनावी जंग और इंदिरा गांधी के जन्म का यह शताब्दी वर्ष है। जनवरी 1917 में सरदार ने अहमदाबाद म्युनिसपैलिटी का चुनाव जीता था। उन्हें महज एक वोट से वह चुनावी फतह हासिल हुई थी। 
सरदार वल्लभभाई पटेल के व्यक्तित्व को जानने के लिए हमें उनके कृतित्व को दो भागों में बांटना होगा- आजादी के पहले, स्वतंत्रता के पश्चात। उनके बारे में जब भी बात होती है, तो उन्हें भारतीय एकीकरण का नायक बताकर लोग रुखसत हो लेते हैं, जबकि 1928 के बारदोली सत्याग्रह ने न केवल उनकी संवेदनशील नेतृत्व क्षमता को उजागर किया, बल्कि उन्हें नई पहचान भी दी। बारदोली की महिलाओं ने ही उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि से नवाजा था। आप पूछेंगे, महिलाएं क्यों? बताता हूं।
यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि पटेल उन नेताओं में एक थे, जिन्होंने राजनीति में स्त्रियों के साथ भेदभाव का खुलकर विरोध किया था। सरदार ने ‘डिस्ट्रिक्ट म्युनिसिपल एक्ट’ से उस सेक्शन 15 (1) (सी) को खत्म करवाया, जो औरतों को चुनाव लड़ने से रोकता था। उनकी यह दलील थी कि निर्वाचित सदन से औरतों को बाहर रखने का मतलब अहमदाबाद की आधी आबादी के प्रतिनिधित्व को समाप्त करना है। इस नेक निर्णय के ठीक 40 बरस बाद यानी 1966 में इंदिरा गांधी ने बहैसियत प्रधानमंत्री हिन्दुस्तान की बागडोर सम्हाली थी।
पटेल के बरक्स इंदिरा गांधी वंशवाद की उपज थीं। उन्होंने समय गुजरने के साथ-साथ ‘एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति’ की परंपरा को बल दिया। 1975 में इंदिरा ने देश पर आपातकाल तक थोप दिया, परंतु इससे भारत को ताकतवर बनाने में उनका योगदान खत्म नहीं हो जाता। सिक्किम के हिन्दुस्तान में विलय और पाकिस्तान के विभाजन के जरिए उन्होंने साबित कर दिया कि देश की सीमाओं में बढ़ोतरी के साथ सुरक्षा मामलों में वह अद्वितीय हैं। सिर्फ यही दो कार्य उन्हें अमर करने के लिए पर्याप्त हैं, हालांकि उनके खाते में और भी बहुत कुछ है। पटेल ने देश का एकीकरण किया था और नेहरू ने जमींदारी प्रथा का खात्मा। इंदिरा गांधी ने ‘प्रिवी पर्स’ खत्म कर देश से राजा-महाराजा युग को सदा-सर्वदा के लिए विदा कर दिया। उन्होंने ऐसे तमाम काम किए, जो आम आदमी के हक-हुकूक के लिए जरूरी थे। इसीलिए आपातकाल और ऑपरेशन ब्लू स्टार के बावजूद इंदिरा गांधी एक जनप्रिय शासक साबित हुईं। जिन लोगों ने 31 अक्तूबर, 1984 को उनकी हत्या के बाद देश भर में लोगों को रोते हुए देखा था, वे इसकी हामी भरेंगे। 
कौन कहता है कि वह अलोकतांत्रिक थीं?
अगर मैं पटेल को आधुनिक भारत का निर्माता और इंदिरा गांधी को वर्तमान भारत की जननी कहूं, तो शायद कुछ लोगों को अच्छा न लगे, पर यह सच है कि इंदिरा के अलावा कोई अन्य प्रधानमंत्री आज तक न तो देश की सीमा को बढ़ा सका और न ही पाकिस्तान जैसे चिर शत्रु के टुकडे़ कर सका। रही बात उनसे जुड़े विवादों की, तो मैं इन्हें बुरा नहीं मानता। संसार के सबसे बडे़ लोकतंत्र को स्वस्थ ‘डिबेट’ का हक हासिल होना ही चाहिए। तकलीफ तब होती है, जब हम निजी छींटाकशी पर उतर आते हैं। थोथे तर्कों की यह कालिख न केवल हमारे पुरखों की मर्यादा को धूमिल करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर वैचारिक प्रदूषण का अभिशाप भी थोप देती है। इससे बचने के लिए हमें किसी पटेल या इंदिरा की समीक्षा की नहीं, बल्कि अपने अंदर झांकने की जरूरत है। इस नेक काम के लिए 31 अक्तूबर से अधिक बेहतर भला और कौन सा दिन हो सकता है?
【साभार】HT

बुधवार, 1 नवंबर 2017

उम्मीद बराबरी के लोकतंत्र की........

जो 60 साल में नहीं हुआ वह 60 महीने में होगा। कुछ इसी उम्मीद के आसरे मई 2014 की शुरुआत हुई थी। और 40 महीने बीतने के बाद अक्टूबर 2017 में राहुल गांधी गुजरात को जब चुनावी तौर पर नाप रहे हैं तो अंदाज वही है जो  2013-14 में मोदी का था। तो क्या इसी उम्मीद के आसरे गुजरात में दिसंबर 2017 की शुरुआत होगी, जैसे 2014 मई में मोदी सरकार की शुरुआत हुई थी। तो फिर भारत कितना बदल चुका है। बदल रहा है या अब न्यू इंडिया के नारे  तले युवा भारत स्वर्णिम भविष्य देख रहा है। यानी हर चुनावी दौर में सत्ता के खिलाफ विपक्ष का नारा चाहे अनचाहे फैज की नज्म याद करा ही देता है ..सब ताज उछाले जाएंगे...सब तख्त गिराए जाएंगे..हम देखेंगे। तो क्या  विरोध और विद्रोह की ये अवाज चुनाव के वक्त अच्छी लगती है। क्योंकि सत्ता से उम्मीद खत्म होती है तो विपक्ष जनता बनकर सत्ता पर काबिज होने की मश्क्कत करती है। और चुनाव प्रक्रिया लोकतंत्र का राग बाखूबी जी लेती है। तो क्या चुनाव सत्ता-सियासत -राजनीति से खत्म होती जनता की उम्मीदों को बरकरार रखने का एक तरीका मात्र है। संसद से भरोसा ना डिगे। लोकतंत्र काराग बरकरार रहे। ये सारे सवाल इसलिये क्योकि श्रम व रोजगार मंत्रालय की  2016 की रिपोर्ट कहती है देश में 4,85,00,000 युवा बेरोजगार हैं। बेरोजगारी दर 12.90 फिसदी हो चुकी है। देश में सिर्फ 2,96,50,000 लोगों के पास रोजगार है। 9,26,76,000 किसान परिवारों की आय देश की औसत आय से  आधी से भी कम है। 11,90,98.000 मजदूर परिवारों की आय किसानो की औसत आय के आधे से कम है। यानी कौन सा भारत किस चुनावी उम्मीद और आस के साथ बनाया  जा रहा है। ये सवाल हर चुनाव को जीने के बाद देश के सामने कहीं ज्यादा बड़ा क्यों हो जाता है। जबकि चुनावी लोकतंत्र का अनूठा सच तो यही है कि हर  पांच बरस में देश और गरीब होता है। नेता रईस होते हैं। चुनावी खर्च बढ़ते चले जाता है। राजनीतिक पार्टियों का खजाना भरता चला जाता है।

यानी दुनिया में सबसे ज्यादा भूखे लोगों के देश में चुनाव पर सबसे ज्यादा रईसी के साथ खर्च कैसे किया जाता है और देश ही राजनीतिक सत्ता की हथेलियों पर नाचता हुआ दिखायी क्यों देता है जरा इसे चुनाव आयोग के अपने आंकडों से ही समझ लें। देश के पहले आम चुनाव 1951-52 में 10 करोड 45 लाख रुपये खर्च हुये। आर्थिक सुधार से एन पहले 1991 के आम चुनाव में 3 अरब 59 करोड 10 लाख रुपये खर्च हुये। 2004 के चुनाव में 13 अरब 20 करोड 55 लाख रुपयेखर्च हुये। और पिछले चुनाव यानी 2014 के चुनाव में 34 अरब 26 करोड 10 लाख रुपये खर्च हुये। यानी ये कल्पना के परे है कि देश की इक्नामी  में जितना उछाल आया। लोगों की आय में जितनी बढोतरी हुई। मजदूर-किसान को दो जून की रोटी के लिये जितना मिला, उससे हजार से कई लाख गुना ज्यादा की बढोतरी देश में चुनावी लोकतंत्र को जीने में खर्च हो गई। और इस तंत्र को  जीने के लिये अब हिमाचल और गुजरात तैयार हैं। जहां चुनाव कराने में जो भी खर्चा होगा उससे विकास की कितनी झडी लग जाती इस दिशा में ना भी सोचे तो भी 19 करोड भूखे नागरिको का पेट तो भरा ही जा सकता है । क्योंकि सिर्फ गुजरात में ही चुनाव कराने में ढाई अरब रुपये से ज्यादा देश के खर्च होगें । और चुनाव प्रचार में जब हर उम्मीदवार को 28 लाख रुपये खर्च करने इजाजत है तो दो अरब से ज्यादा सिर्फ उम्मीदवार अपने प्रचार में खपा देगें । क्योकि गुजरात की प्रति सीट पर अगर चार उम्मीदवारो के 28-28 लाख खर्च को जोडकर अगर चार उम्मीदवारो को ही माने तो एक करोड 12 लाख रुपये हो जाते है । और 182 सीट का मतलब है 2 अरब तीन करोड से ज्यादा ।

तो क्या वाकई चुनावी तंत्र इतना मजबूत हो चुका है कि वह लोकतंत्र पर हावी है या फिर लोकतंत्र के असल मिजाज को खारिज कर चुनाव को ही जानबूझ कर लोकतंत्र करार दिया गया है। क्योंकि सत्ता परिवर्तन की ताकत को ही लोकतंत्र मान लिया गया है। और बराबरी के वोट को ही गैर बराबरी की रोटी से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण मान लिया गया है ।
(साभार)

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

न कोई सरोकार, न कोई नीति फिर भी कहा "अन्नदाता सुखी भव"

बीते 25 बरस का सच तो यही है कि देश में सत्ता किसी की रही हो लेकिन किसान की खुदकुशी रुकी नहीं। और हर सत्ता के खिलाफ किसान का मुद्दा ही सबसे बड़ा मुद्दा होकर उभरा। तो क्या ये मान लिया जाये कि विपक्ष के लिये किसान की त्रासदी सत्ता पाने का सबसे धारधार हथियार है और सत्ता के लिये किसान पर खामोशी बरतना ही सबसे शानदार सियासत। क्योंकि राहुल गांधी तो विपक्ष की राजनीति करते हुये मंदसौर पहुंचे लेकिन पीएम खामोशी बरस कजाकस्तान चले गये। कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह दिल्ली छोड़ मंदसौर जाने के बदले बिहार चले गये। बाब रामदेव के साथ मोतीहारी में योग करने  लगे और किसानों के हालात पर बोलने की जगह योग पर ही बोलने लगे। तो क्या ये कहा जा सकता है कि राजनीति अपना काम कर रही है और किसान की त्रासदी जस की तस। यानी एक तरफ सत्ता योग कर रही है तो दूसरी तरफ विपक्ष सियासी स्टंट हो रहा है । दरअसल राजनीति के इसी मिजाज को समझने की जरुरत है क्योंकि किसान की फसल बर्बाद हो जाये तो मुआवजे के लाले पड़ जाते हैं।


कर्ज में डूब वह खुदकुशी कर लेता है लेकिन भारत में विधायक-सांसद चुनाव हार कर भी विशेषाधिकार पाये रहता है। हर पूर्व विधायक सांसद को भी किसान की आय से 300 से 400 गुना ज्यादा कम से कम मिलता ही है। देश में किसान की औसत महीने की आय 6241 रुपये है लेकिन विधायक सांसद को पेंशन-सुविधा के  नाम पर हर महीने 2 से ढाई लाख मिलते हैं। तो नेताओं के सरोकार किसान के साथ कैसे हो सकते हैं और संसद के भीतर याद कीजिये तो किसानों को लेकर किसी भी बहस को देख लीजिये संकट कोरम पूरा करने तक का आ जाता है। यानी 15 फिसदी  संसद में किसानों की समस्या पर चर्चा में शामिल नहीं होते। तो फिर किसानों का नाम लेकर राजनीति साधने या सत्ता चलाने का मतलब होता क्या है। क्योंकि राजनीति कर सत्ता पाने के लिये हर राजनीतिक दल को चंदा लेने की छूट है। और चंदा संयोग से ज्यादातर वही कारपोरेट और औघोगिक घराने देते हैं, जिनका  मुनाफा सरकार की उन नीतियो पर टिका होता है जो किसानों के हक में नहीं होती। मसलन खनन से लेकर सीमेंट-स्टील प्लांट की ज्यादातर जमीन खेती की जमीन पर या उसके बगल में होती है। 

लेकिन मुश्किल इतनी भर नहीं है। राजनीति कैसे सांसद विधायक के सरोकार किसान-मजदूर से खत्म कर सिर्फ पार्टी के लिये हो जाते है ये एंटी डिफेक्शन बिल के जरीये समझा जा सकता है । मसलन मंदसौर की घटना पर मंदसौर के ही बीजेपी सांसद किसानों पर संसद में वोटिंग होने पर अपनी पार्टी के खिलाफ वोट नहीं दे सकते। यानी मंदसौर के किसान अगर एकजुट होकर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशो को लागू कराने पर  अड जाये तो मंदसौर का ही सांसद क्या करेगा। व्हिप जारी होने पर पार्टी का साथ देना होगा । क्योंकि याद कीजिये बीजेपी ने भी 2014 के चुनावी  घोषणापत्र में 50 फीसदी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया। लेकिन 21 फरवरी 2015 को कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा कि 50 फीसदी न्यूनतम  समर्थन मूल्य बढ़ाना संभव नहीं है। क्योंकि ऐसा करने से बाजार पर विपरित प्रभाव होगा । यानी चुनावी घोषणापत्र जैसे दस्तावेज में किए वादे का भी  कोई मतलब नहीं। तो फिर चुनावी घोषमापत्र और सरकारो के होने का मतलब ही किसानो के लिये क्या है। क्योंकि महाराष्ट्र में तो बकायदा पीएम और सीएम दोनो ने ही लागत से पचास फिसदी ज्यादा देने का वादा किया था । यानी नेताओं  के सरोकार जब सामाजिक और आर्थिक तौर पर किसानों के साथ होते नहीं है तो  पिर किसानों की बात करने वाला विपक्ष हो किसानों के बदले योग करते हुये कृषि मंत्री हैं। किसानों के जीवन पर फर्क पड़ेगा कैसे। क्योंकि देश की अर्थव्यस्था में किसानी कही टिकती नहीं मसलन देश के ही सच को परख लें।  किसानो पर कुल कर्ज है 12 लाख साठ हजार करोड का है जिसमें फसली कर्ज 7 लाख 70 हजार करोड का है तो टर्म लोन यानी खाद बीज का लोन 4 लाख 85 हजार  करोड का है। और उसके नीचे की लकीर बताती है कि देश के 50 कॉरपोरेट का चार लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए का कर्ज संकटग्रस्त है यानी बैंक मान चुकी  है कि वापस आने की संभावना बहुत कम है। कॉरपोरेट को चिंता नहीं कि संकटग्रस्त कर्ज चुकाएगा नहीं तो क्या होगा क्योंकि उसे एनपीए मानने से लेकर री-स्ट्रक्चर करने की जिम्मेदारी सरकार की है। और एनपीए का आलम ये है कि वह 6 लाख 70 हजार करोड़ का हो चुका है । और इन सब के बीच बीते तीन बरस में केन्द्र सरकार ने देश के ओघोगिक घरानों को 17 लाख 14 हजार 461 करोड़ की रियायत टैक्स इंसेटिव के तौर पर दे दी है। तो देश में कभी एनपीए, टैक्स माफी या सकंटग्रस्त तर्ज पर बहस नहीं होती। हंगामा होता है तो किसानों के सवाल पर । क्योंकि देस में 26 करोड पचास लाख परिवार किसानी से जुडे है । तो फिर राजनीति तो किसानी के नाम पर ही होगी । और बाजार इक्नामी के साये तले किसान की अर्थव्यवस्था कहा मायने रखती है। और शायद यही से सवाल खडा होता है कि कर्जमाफी से भी किसान का जीवन बदलता क्यों नहीं।  

ये सवाल इसलिए क्योंकि कर्ज माफी तात्कालिक उपाय से ज्यादा कुछ नहीं-लेकिन किसानों के दर्द पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हुए राजनेताओं ने इसी उपाय को केंद्रीय उपाय करार दे डाला है। सच तो यह है कि 70 बरस में ऐसी व्यवस्था नहीं हो पाई कि किसान खुद अपने पैर पर खड़ा हो सके। सिर्फ किसान ही क्यो पूंजी से पूंजी बनाने के खेल में जो नहीं है उसके लिये आगे बढने का या कहे जिन्दगी बेहतर बनाने को कोई इक्नामी प्लानिंग देश में हुई ही नहीं है । मसलन यूपी की दो तस्वीरों को याद कर लीजिये। राहुल गांधी की खाट सभा में लोग तीस सौ रुपये की खाट लूटने में ही लग गये और योगी की सभा के बाद लोग 40 रुपये का डस्टबीन लूटने में ही लग गये। जबकि दोनों ही किसान-मजदूर। सिस्टम को बेहतर बनाने की बात कर रहे थे। यानी देश में किसानों की जो माली हालत है, उसमें सुधार कैसे आये और किसान भी गर्व से सीना चौडा कर खेती करें, क्या ऐसे हालात देश में आ सकते है। ये सवाल इसलिये क्योंकि किसानी को बेहतर करने के लिए जो इंतजाम किए जाने चाहिए थे-वो तो हुए नहीं अलबत्ता दर्द से कराहते किसानों को कर्जमाफी के रुप में लॉलीपॉप थमाया गया। तो एक सवाल अब है कि क्या राज्य सरकारें किसानों का कर्ज माफ कर सकती हैं और क्या ऐसा करने से किसानों की दशा सुधरेगी। तो दोनों सवालों का जवाब है कि ये आसान नहीं। क्योंकि कई राज्यों का वित्तीय घाटा जीडीपी के 5 फीसदी से 10 फीसदी तक पहुंच गया है, जबकि नियम के मुताबिक कोई भी राज्य अपने जीडीपी के 3 फीसदी तक ही कर्ज ले सकता है । यानी पहले से खस्ता माली हालत के बीच किसानों की कर्ज माफी का उपाय आसान नहीं है क्योंकि राज्यों के पास पैसा है ही नहीं और विरोध प्रदर्शन के बीच कर्ज माफी का ऐलान हो जाए, बैंक कर्ज माफ भी कर दें तो भी साहूकारों से लिया लोन माफ हो नहीं सकता ।-किसान कर्ज माफी के बाद भी बैंक से कर्ज लेंगे और एक फसल खराब होते ही उनके सामने जीने-मरने का संकट खड़ा हो जाता है,जिससे उबारने का कोई सिस्टम है नहीं । फसल बीमा योजना अभी मकसद में नाकाम साबित हुई है । और कर्ज माफी की संभावनाओं के बीच भी किसान की मुश्किलें बढ़ती ही हैं,क्योंकि वो कर्ज चुकाना नहीं चाहता या चुका सकता अलबत्ता नए कर्ज मिलने की संभावना बिलकुल खत्म हो जाती है। तो सवाल कर्ज माफी का नहीं,सिस्टम का है। और सिस्टम का मतलब ही जब राजनीतिक सत्ता हो जाये तो कोई करें क्या  । तो होगा यही कि आलू दो रुपये किलो होगा और आलू चिस्प 400 रुपये किलो । टमाटर 5 रुपये होगा और टमौटो कैचअप 200 रुपये किलो । और संसद की कैंटीन में चिप्स है, कैचअप है । और पीएम भी कैंटीन की डायरी में लिख देते है, अन्नदाता सुखी भव ।
(साभार)

साहेब का मेरठ...2014 में 1857 का गदर और 2019 में गालिब की 'सराब'

2 फरवरी 2014 और 28 मार्च 2019 का अंतर सिर्फ तारिख भर का नही है । बल्कि भारत जैसे देश में कोई सत्ता कैसे पांच बरस में हाफंने लगती है । कैस...