गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

आवंटन के बाद लूट का खेल


मोटा माल तो चंदन बसु ने भी बनाया

कोयला मंत्रालय के दस्तावेजों में 58 कोयला ब्लाक कटघरे में हैं। इनमें 35 कोयला ब्लाक पायी निजी कंपनिया ऐसी हैं, जो या तो राजनीतिक नेताओं से जुड़ी हैं या फिर मंत्री, सांसदों या सीएम के कहने पर आंवटित की गई हैं। किसी की सिफारिश मोतीलाल वोहरा ने की। तो किसी की सिफारिश शिवराज सिंह चौहान ने । किसी की सिफारिश नवीन पटनायक ने की तो किसी की सुबोधकांत सहाय ने। लेकिन यह सच आवंटन के भारी भरकम कैग रिपोर्ट के पीछे दबा ही रह गया कि कोयले का असल खेल तो पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार के नाक तले ना सिर्फ शुरु हुआ बल्कि चंदन बसु ने अपने पिता ज्योति बसु की लीगेसी तले इस खेल में पहले सिर्फ हाथ डाला और आज की तारीख में गले तक मुनाफा बना कर पर्दे के पीछे हर राज्य सरकार के साथ मिलकर खेल खेल रही है।

यह खेल शुरु कैसे होता है इसलिये लिये दो दशक पीछे लौटना होगा। पीवी नरसिंह राव के दौर में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने ही 1992 में सबसे पहले कोल इंडिया को केन्द्र से मदद देने से मना किया और बकायदा पत्र लिखा गया कि कोल इंडिया अब अपना घाटा-मुनाफा खुद देखे। उसके तुरंत बाद 1993 में कोल इंडिया के कानूनों में बदलाव कर उन निजी कंपनियों को खादान देने पर सहमति बनायी गई जो कोल इंडिया से कोयला लेकर अपना काम चलाते लेकिन उन्हे कोल इंडिया की बाबूगिरी में परेशानी होती। 1993 में ही ईस्टर्न माइनिंग एंड ट्रेडिंग एंजेसी यानी इमटा नाम से बंगाल में एक कंपनी बनी। और 1993 में ही इमटा की पहल पर पहला कोयला खादान आरपीजी इंडस्ट्रीज को मिला। इमटा ने आरपीजी इंडस्ट्री को मिली खादान को आपरेशनल बनाने और डेवलप करने का जिम्मा लिया । और इसके बाद इमटा ही बंगाल के खादानों को अलग अलग निजी कंपनियों से लेकर पावर और माइनिंग की सरकारी कंपनियो दिलाने भी लगी और खादान का सारा काम करने भी लगी। उस दौर में हर बरस एक या दो ही खादान किसी कंपनी को मिलती और संयोग से हर बरस बंगाल का नंबर जरुर होता। 1995 में बंगाल राज्य बिजली बोर्ड तो 1996 में बंगाल के ही पावर डेवलपमेंट कारपोरेशन को खादान आवंटित हुई। और इस कतार में 2009 तक पश्चिम बंगाल में 27 कोयला खादान आंवटित की गई। हैरत इस बात को लेकर नहीं होगी की रश्मि सीमेंट से लेकर आधुनिक कारपोरेशन और विकास मेटल पावर से लेकर राजेश्वर लौह उघोग तक को कोयला खादान मिल गया। जिनका कोई अनुभव कोयला खादान या पावर या स्टील उघोग में खादान मिलने से पहले था ही नहीं। हैरत तो इस बात को लेकर है कि हर खादान का काम इमटा कर रहा है। हर परियोजना में इमटा साझीदार है। और इमटा नाम ही सिफारिश का सबसे महत्वपूर्ण वाला नाम बन गया। क्योंकि माना यही गया कि इसके पीछे और किसी का नहीं बल्कि ज्योति बसु के पुत्र चंदन बसु का नाम है और सामने रहने वाला नाम यूके उपाध्याय का है, जो इमटा के मैनेजंग डायरेक्टर है। वह इमटा बनाने से पहले कोल इंडिया के खादानों में बालू का ठेका लिया करते थे।

कोल इंडिया के दस्तावेज बताते हैं कि उज्ज्वल उपाध्याय यानी यूके उपाध्याय को सालाना 10 लाख तक का ठेका झरिया से लेकर आसनसोल तक के खादानो में बालू भरने का मिलता। लेकिन चंदन बसु के साथ मिलकर ईस्ट्रन माइनिंग एंड ट्रेडिंग एजेंसी यानी इमटा बनाने के बाद यू के उपाध्याय की उडान बंगाल से भी आगे जा पहुंची। चूंकि चंदन बसु का नाम ही काफी था तो कोलकत्ता से लेकर दिल्ली तक यह बताना जरुरी नहीं था कि इमटा का डायरेक्टर कौन है या इसके बोर्ड में कौन कौन हैं। और आज भी स्थिति बदली नहीं है। इंटरनेट पर कंपनी प्रोफाइल में हर राजय के साथ इमटा के धंधे का जिक्र है लेकिन एक्जक्यूटिव डाटा, बोर्ट के सदस्यो का नाम या फिर कमेटी के सदस्यों में किसी का नाम अभी भी नहीं लिखा गया है। जबकि कोयला खादानों के जरीये इमटा ने अपना धंधा बंगाल से बाहर भी फैला दिया।
सबसे पहले बंगाल इमटा कोल माइन्स बना तो उसके बाद झारखंड के लिये तेनूधाट इमटा । पंजाब के लिये पंजाब इमटा कोल माइन्स। कर्नाटक और महाराष्ट्र के लिये कर्नाटक इमटा कोल माइन्स। कर्नाटक में बेल्लारी खादानो में भी इमटा ने पनी पकड़ बनायी और बेल्लारी थर्मल पावर स्टेशन प्रोजेक्ट में ज्वाइंट वेन्चर के जरीये कर्नाटक इमटा कोल माइन्स कंपनी जुड़ी। इसी तरह झारखंड के पाकुड में पंजाब राज्य बिजली बिजली बोर्ड के नाम पर खादान लेकर पंजाब इमटा कोल माइन्स के तहत काम शुरु किया। मुनाफे में बराबर के साझीदार की भूमिका है। लेकिन इस कड़ी में पहली बार इमटा को 10 जुलाई 2009 को बंगाल के गौरांगडीह में हिमाचल इमटा पावर लि.के नाम से कोयला खादान आवंटित हुआ। यानी इससे पहले जो इमटा अपने नाम का इस्तेमाल कर करीब 30 से ज्यादा कोयला खादानों को आवंटित कराने से लेकर उसके मुनाफे में हिस्सदार रही। वहीं सीधे कोयला खादान लेकर अपने तरीके से काम शुरु करने ने इमटा के प्रोफाइल को भी बदल दिया। अब इमटा सिर्फ खादानों को आपरेशनल बनाने या डेवपल करने तक सीमित नहीं है बल्कि देश के अलग अलग हिस्सों में एक्सक्लूसिवली कोयला सप्लाई भी करता है। और यह कोयला बेल्लारी से लेकर हिमाचल के पावर प्रोजेक्ट तक जा रहा है। झारखंड और बंगाल में खादानों को लेकर इमटा की सामानांतर सरकार कैसे चलती है यह दामोदर वैली कारपोरेशन [डीवीसी] के सामानांतर डीवीसी इमटा कोल माइन्स के कामकाज के तरीके से समझा जा सकता है।

पहले तो थोड़ा बहुत था लेकिन डीवीसी की 11 वीं और 12 वीं योजना में तो सारा काम ही डीवीसी इमटा के हाथ में है। यानी कंपनी का विस्तार कैसे होता है अगर इंटरनेट पर देखे तो लग सकता है कि इमटा सरीखी हुनरमंद कंपनी को जरीये देश के 17 पावर प्लांट, 9 स्पांज आयरन उघोग और 27 कोयला खादानों को आपरेशनल बनाने मे इमटा का जवाब नहीं। लेकिन जब इंटरनेट से इतर तमाम योजनाओं की जमीन को देखेंगे तो कोयला खादान के आवंटन का खेल समझ में आयेगा जो कैसे चंदन बसु या कहे इमटा के नाम भर से होता है। असल में कोयला आवंटन करने वाली स्क्रीनिंग टीम के नाम भी लाभ पाने और लाभ पहुंचाने वाले ही है। मसलन एक वक्त कोल इंडिया के चेयरमैन रहे यू कुमार । रिटायरमेंट के बाद कोल इंडिया के प्रतिनिधी के तौर पर स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य भी रहे और इसी दौर में आदित्य बिरला उघोग में सलाहकार के तौर पर काम भी करते रहे। लेकिन कोयला खादान के खेल को नया आयाम रिलांयस ने दिया । सिंगरौली के साशन में सरकारी बिड के जरीये 4000 मेगावाट थर्मल पावर प्लाट का लाइसेंस मिला। फिर इसके लिये 12 मिलियन टन की कोयला खादान मिली । जहां से 40 बरस तक कोयला निकाला जा सकता है। लेकिन रिलायंस ने इसके सामांनातर चितरंजी में भी 4000 मेगावाट का निजी पावर प्लांट लगाने का ऐलान कर कहा कि वह बिजली खुले बाजार में बेचेगा। मगर कोयला साशन की उसी खादान से निकालेगा। यानी सरकारी पावर प्लांट के लिये मिले सरकारी खादान का कोयला निजी पावर प्लाट के उपयोग में लायेगा। यानी सरकारी बिड में महज एक रुपये 19 पैसे प्रति यूनिट बिजली दिखायी। और खुले बाजार में नौ रुपये तक प्रति यूनिट बेचने की तैयारी। इस पर टाटा ने आपत्ति की। यह मामला अदालत में भी गया। जिसके बाद चितरंजी के पावर प्लांट पर तो रोक लग गई है । लेकिन इस तरीके ने इन निजी पावर प्लांट को लेकर नये सवाल खड़े कर दिये कि आखिर बीते आढ बरस में कोई सरकारी पावर प्लांट बनकर तैयार हुआ क्यों नहीं जिनका लाइसेंस और ठेका निजी कंपनियों को दिया गया। जबकि निजी पावर प्लांट का काम कहीं तेजी से हो रहा है और कोयला खादानों से कोयला भी निजी पावर प्लांट के लिये निकाला जा रहा है। यानी सरकार का यह तर्क कितना खोखला है कि खादानों से जब कोयला निकाला ही नहीं गया तो घाटा और मुनाफे का सवाल ही कहां से आता है।
असल में झारखंड के 22 खादान, उडीसा के 9 खादान, मध्यप्रदेश के 11 और बंगाल के 9 कोयला खादानो में से बाकायदा कोयला निकाला जा रहा है। और सिगरैली के साशन में रिलायंस की खादान मोहरे एंड अमलोरी एक्सटेंसन ओपन कास्ट में भी 1 सिंतबर 2012 से कोयला निकलना शुरु हो गया। यानी कोयला खादान घोटाले ने अब झारखंड,छत्तीसगढ,मध्यप्रदेश और उडीसा,बंगाल में काम तो शुरु करवाया है। लेकिन खास बात यह भी है कि करीब 60 से ज्यादा कोयला खादानें ऐसी भी हैं, जिनका एंड यूज होगा क्या यह किसी को नहीं पता। इसलिये यह एक सवाल ही है कि दिल्ली में जो कई मंत्रालयों से मिलकर बनी कमेटी जांच कर रही है वह महज खाना-पूर्ती कर कुछ पर तलवार लटकायेगी या फिर खादानो के खेल का सच सामने लायेगी।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

सबसे खतरनाक है सियासी सपनों का सौदा

देश में सपनों की कमी नहीं और 2014 के लोकसभा चुनाव को लेकर हर राजनेता सपने बेचने को तैयार है। यहां तक की प्रधानमंत्री की रेस में शामिल कद्दावर राजनेता भी सपनों को बेचने निकले हैं और अपने सपनों को मरने देना नहीं चाहते। नरेन्द्र मोदी का सपना है बंगाल में केसरिया लहराये। मोदी को लगने लगा है कि 2014 में 272 के आंकड़े को छूना है तो फिर बंगाल में इतिहास रचना होगा। 42 सीटों वाले बंगाल में सिर्फ बीजेपी के पास एक सीट है। 2009 में जसंवत सिह गोरखालैंड वाली जमीन से जीते थे। विधानसभा में तो बीजेपी का खाता भी नहीं खुला। तो सवाल पश्चिम बंगाल में सेंध लगाने का नहीं बल्कि कोलकाता में 5 फरवरी को जो भीड मोदी को सुनने आयी, उसे वोट में बदल कर लाल बंगाल को केसरिये में बदलने का ख्वाब मोदी ने पाला है। इसालिये बेखौफ मोदी यह कहने से नहीं चूके कि दिल्ली की सत्ता पर बैठकर भी बंगाल को बदला जा सकता है। यूं बंगाल में कभी केसरिया जमीन बनी ही नहीं तो बीजेपी खड़ी होती कहां।

2011 के विधानसभा चुनाव सभी 294 सीटो पर चुनाव लड़कर भी केसरिया का सच शून्य ही रहा। 2006 में तीन दर्जन सीटो पर बीजेपी ने अपने उम्मीदवारों को खड़ा करने का सपना पाला और वह भी शून्य में सिमट गया। लेकिन अब मोदी है और मोदी ने लालकिले का सपना देखा है। तो फिर बंगाल को अधूरा कैसे छोड़ सकते हैं। वैसे सपना तो मुलायम, नीतिश कुमार, जयललिता और नवीन पटनायक की चौकड़ी ने भी देखा है। किसी ने तीसरे मोर्चे का सपना देखा है तो किसी ने तीसरे मोर्चे के जरिये पीएम बनने का सपना। और इसकी पहली आहट 5 फरवरी को ही संसद में तब दिखायी दी जब 11 राजनीतिक दलों ने हाथ मिलाकर कहा कि चुनाव के लिये जनता को लुभाने वाली मनमोहन सरकार की नीतियों को अब संसद से सड़क पर जाने नहीं देंगे। और यही गांठ 2014 के चुनाव में तीसरे मोर्चे की दस्तक है। तो तीसरे मोर्चे के सपनों पर ध्यान दें तो वामपंथी गठबंदन की अगुवाई करते प्रकाश करात के पास चार दल हैं लेकिन लोकसभा की महज 24 सीट हैं। इसी तरह मुलायम के पास 22, नीतीश कुमार के पास 19, नवीन पटनायक के पास 14, जयललिता के पास 9, बाबूलाल मंराडी के पास 2, देवेगौडा के पास 1 और मंहत के पास भी एक ही सांसद है। यानी इनकी जमीन कितनी पोपली है इसका अंदाजा इसी से लग सकता है हर चेहरे का वजूद उसके अपने राज्य में सिमटा हुआ है और जयलिलता और नवीन पटनायक को छोड दें तो कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो अपने राज्य में ही नंबर एक पर हो। लेकिन सपने हैं तो उड़ान भरी जा रही है। और फिलहाल इनके पास 543 में से महज 92 सीटे हैं।

सपनो की इस सियासत में ममता बनर्जी भी शामिल हो जायें, इसकी कवायद शुरु हो गयी है। यह सपना इसलिये क्योंकि वाम के साथ ममता कैसे खड़ी होंगी, यह भी किसी सपने से कम नहीं। इसके सामानांतर अनूठा सवाल तो यह है कि बंगाल की 42 में से 31 सीट ऐसी है, जहां मोदी के विकास के मंत्र पर गुजरात की प्रयोगशाला भारी पड़ेगी। और देश में इसी चेहरे को विस्तार मिल जाये तो 543 में से 218 सीटो पर गुजरात की प्रयोगशाला मोदी के विकास के मंत्र पर भारी पड़ेगी। लेकिन मोदी 2014 की नब्ज को 272 की तर्ज पर पकडना चाह रहे हैं तो भाषणों में मोदी की मुनादी भी बदलाव की हवा को तेज करने वाली ही होती जा रही है। सपनों की इस सियासत में कांग्रेस भी पीछे रहना नहीं चाहती है तो सपनो की सियासत को और तेज उड़ान खांटी कांग्रेसी जनार्दन दिवेदी ने दे दी है। मनमोहन सरकार ने जिस तरह सरकारी शासन पानी को कैश ट्रांसफर तक के हालात में वोट बैंक के लिये ला खड़ा किया। और विकास की लकीरों के जरीये समाज में असमानता चरम पर पहुंचा दी, उसमें पहली बार कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने आरक्षण का सवाल गरीबी के साथ जोड़कर अपने हाथ को आम आदमी के साथ खड़ा करने का सपना फिर पाला है। तो जो होना चाहिये उसे सपना बनाया जा रहा है या फिर सपनो के घोडे पर सवार होकर सियासी उड़ान भरने की मंशा अब कांग्रेस ने भी पाल ली है। लेकिन संयोग ऐसा है कि नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के सपनो का सच उनकी अपनी बनायी सियासी जमीन पर ही टिकी है। एक ने गुजरात को प्रयोगशाला बनाया तो दूसरे ने देश को। अंतर सिर्फ इतना है कि राहुल गांधी को देश में अपनी बनायी प्रयोगशाला की जमीन पर खडे होकर ही सपने बेचने हैं। लेकिन मोदी को गुजरात से निकलकर हर राज्य में अलह अलग सपने बेचने हैं। बंगाल की जमीन पर नरेन्द्र मोदी के निशाने पर वामपंथी आ जाते है और वामपंथियों के मुद्दे को चुरा कर कांग्रेसी जातीय आधार पर टिके वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है। खुले तौर पर आर्थिक आधार पर आरक्षण का सवाल जनार्दन उठाते हैं और उसके बाद सोनिया गांधी बयान के जरीये साफ करती है कि आरक्षण पर काग्रेस का नजरिया बदला नहीं है, जातीय आधार तो बरकरार रहे लेकिन 2009 के चुनावी मैनिफैस्टो में तो आर्थिक तौर पर कमजोर तबको को आरक्षण देने की बात कांग्रेस ने कही ही थी।

सवाल सिर्फ इतना है कि कांग्रेस को यह सब कहने की जरुरत क्यों पड़ रही है। जबकि बीते 9 बरस 9 महीनो में मनमोहन सरकार ने सिर्फ सपने ही बेचे है। और सपनों को बेचते बेचते आज जब कांग्रेस ढलान पर है तो वह अपने सपनों से देश के सपनों को जोड़ने का सपना देख रही है। लेकिन जातीय आधार पर टिके आरक्षण का सपना भी चूर चूर तो नहीं हो रहा। क्योंकि यूपी में मुलायम और मायावती, बिहार में लालू यादव और नीतीश कुमार ऐसे बडे खिलाड़ी हैं जो आरक्षण के जरिये जातीय विकास के सपने बेचते रहे लेकिन राज्य का विकास सपनो की उडान से ही गुफ्तगू करता रहा। और आरक्षण पाकर भी जातीय समीकरण की राजनीति ने हाशिये पर पड़े तबकों की जिन्दगी ही उडन-छू कर दी। इसलिये एक बार फिर आरक्षण का मंत्र भी बदल कर खुद का टेस्ट कांग्रेस कर रही है। गुजरात को लेकर कांग्रेस की सतही सियासत तो और ही गुल खिला रही है। क्योंकि मोदी देश में घूम घूमकर राहुल गांधी की सियासत को आइना दिखा रहे हैं तो अब राहुल गांधी मोदी की जमीन पर जा कर चुनौती देने का मन बना रहे हैं। 8 फरवरी को गुजरात के बरदोली में राहुल गांधी विकास खोज यात्रा की अगुवाई करेंगे। माना यही जा रहा है कि गुजरात के सीएम देश भर में घूम घूम कर जिस गुजरात मॉडल का बखान कर रहे हैं, उसी मॉडल की हवा निकालने के लिये राहुल गांघी आदिवासी बहुल इलाके बरदोली जा रहे हैं। लेकिन सपनों की सियासत का ताना बाना बुनने वाले कांग्रेसियों के लिये राहुल की गुजरात उढान का राजनीतिक सच कुछ और है।

दरअसल कांग्रेस की राजनीतिक जीत गुजरात में आदिवासी बहुल इलाकों में ही ज्यादा रही है। लेकिन बीते विधानसभा चुनाव में मोदी ने कांग्रेस के वर्चस्व वाले आदिवासी इलाके में भी सेंध लगा दी। 2009 में आदिवासी बहुल 5 सीटो में से कांग्रेस ने 3 सीट जीती थी। 2012 के विधानसभा चुनाव में इन 3 लोकसभा सीट के तहत आने वाली 22 में से 13 सीट मोदी ने जीत ली। असल में मोदी ने आदिवासियो के लिये तीन लोकलुभावन काम कर दिये। पहला हर आदिवासी को घर, दूसरा ,खेती की जमीन पर मालिकाना हक,और तीसरा कल्याण योजना के जरीये आर्थिक मदद। तो असल में राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि अगर 2014 के लोकसभा सीट में काग्रेस आदिवासी बहुल इलाको में भी जीत नहीं पायेगी तो यह कांग्रेस की हार से कही ज्यादा बड़ी मोदी की जीत होगी। क्योंकि सत्ता कभी भी पलटी हो लेकिन कांग्रेस ने कभी आदिवासी बहुल इलाको में सीटे गंवायी नहीं। तो राहुल की राजनीति का नायाब सच एक तीर से दो निशाना साधना है। एक तरफ सीटों को बचाना और दूसरी तरफ सीटों को बचाने के लिये विकास खोजो यात्रा के जरीये मोदी को घेरना। ऐसे में एक सपना दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नायक ने भी देखा है । इस सपने में हर दागी खारिज है और तीसरे मोर्चे की बात हो या मोदी या राहुल की सपना यही देखा गया है कि कोई भी संसद की चारदीवारी को छू भी नहीं पाये। जी, यह सपना देखा है अरविन्द केजरीवाल ने। दिल्ली की सत्ता आम आदमी की सत्ता है और देश की संसद भी आम आदमी की ससंद हो सकती है लेकिन क्या वाकई यह देश इस सपने को उड़ान भरने देगा। या फिर 2014 की हर कवायद सपने में बदलेगी और चुनाव बाद लोकतंत्र का नारा लगाते हुये एक नये तरीके का गठबंधन देश की जनता को ही चिढ़ाकर सत्ता पर काबिज हो जायेगा। और नारा लगेगा। लोकतंत्र जीत गया। या फिर सबसे खतरनाक है सपनो का सौदा करना।

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

1 लाख 76 हजार करोड़ का 2 जी स्कैम, 1 लाख 85 हजार करोड़ का कोयला घोटाला और अब करीब सवा लाख करोड़ का गैस घोटाला। 2जी घोटाले के खेल में 6 कॉरपोरेट घरानों के नाम आये। कोयला घोटाले में 27 कॉरपोरेट और 19 कंपनियों के नाम आये। और गैस घोटाले में रिलायंस इंडस्ट्री का नाम आया। 2जी घोटाला 2008 में हुआ। कोयला घोटाला 1998 से शुरु हुआ और 2010 तक जारी रहा। गैस घोटाले की शुरुआत 2004 में हुई। यानी 2जी घोटाला मनमोहन सिंह के दौर में हुआ तो कोयला घोटाला वाजपेयी के दौर से शुरु होकर मनमोहन सिंह के दौर में ज्यादा तेजी से होने लगा। और गैस के घोटाले पर हस्ताक्षर तो मनमोहन सिंह के दौर में हुये लेकिन केजी बेसिन को मुकेश अंबानी के हवाले 2002 में वाजपेयी सरकार के दौर में ही किया गया। और इन तीनों की कीमत जिस औने पौने दाम में कॉरपोरेट को दी गयी और उससे जो मुनाफा कॉरपोरेट ने कमाया उसे अगर सीएजी के दायरे में देखें तो देश को 2जी, कोयला और प्रकृतिक गैस के घोटाले से 4 लाख 86 हजार 591 करोड का चूना लगा दिया गया। तो देश को चूना लगाने वाली इस रकम यानी 486591 करोड़ रपये के मायने भी समझ लें। मौजूदा वक्त में अगर यह रकम रसोई गैस और पेट्रोल डीजल में राहत के लिये जोड़ दी जाये। यानी तमाम लूट के बाद भी जो कीमत आम जनता से सरकार वसूल रही है अगर उसमें 4 लाख 86 हजार करोड की सब्सिडी मिलने लगे तो महंगाई में तीन सौ फीसदी की कमी आ जायेगी। क्योंकि तब पेट्रोल औसतन 70 रुपये लीटर से घटकर 36 रुपये लीटर पर आ जायेगा। डीजल में 60 फीसदी प्रति लीटर की कमी हो जायेगी। और रसोई गैस प्रति सिलेन्डर आम जनता को 250 रुपये में मिलने लगेगा।

यू महंगाई का सवाल इस लिये भी इन तीनों से जुड़ा है क्योंकि इन तीनों पर कॉरपोरेट का सीधा कब्जा है। यानी सरकार चाहे तो भी इनकी कीमत तय नहीं कर सकती है और जिन कॉरपोरेट के हाथ में इसका लाइसेंस होगा वह अपने मुनाफे को आंक कर ही कीमत तय करेगा। तो इन कीमतो से पड़ने वाले सीधे असर को समझें तो औघोगिक उत्पाद,खेती और सफर के महंगे होने में इन तीनो की भूमिका सबसे बड़ी है। क्योंकि इसी की वजह से गैस के पावर प्लांट से लेकर खाद तक की कीमतें बढ़ीं। जो 1 अप्रेल से और ज्यादा बढ़ेंगी। और इस लकीर पर संयोग से 2जी के घोटाले ने संचार व्यवस्था को भी लूटतंत्र में बदला है तो आधुनिक होते भारत में सिर्फ वहीं सुकून से जी सकता है, जिसकी जेब भरी हो या फिर औसतन कमाई हर महीने कम से कम 52 हजार जरुर हों। यानी जिस देश में सालाना कमाई ही औसतन 50 हजार बतायी जाती हो। और इस 50 हजार रुपये सालाना औसतन कमाई का सच यह हो कि देश की 80 फीसदी आबादी की सालाना कमाई महज 4 हजार रुपये से कम हो तो कल्पना कीजिये कि देश में असमानता का पैमाना कितना तीखा है और कारपोरेट की कमाई कितनी ज्यादा है। कारपोरेट-सरकार नैक्सैस के खेल में देश के ही संसाधनों की कीमत कैसे तय होती होगी यह भी अब खुले तौर पर सामने लगा है।

दरअसल, सवाल सिर्फ कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए का नहीं है, यह बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए का भी है। मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडिया लिमिटेड को को बारह बरस पहले वाजपेयी सरकार ने प्रकृतिक गैस निकालने के लिये केजी बेसिन सौपा। और वाजपेयी सरकार के जाने के बाद 2004 में मनमोहन सरकार ने मुकेश अंबानी के साथ गैस खरीदने का सौदा किया। दरअसल दिल्ली सरकार ने जिन दो केन्द्रीय मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले में एपआईआर दर्ज की है उसकी वजह उन्हीं के पेट्रोलियम मंत्री रहते हुये मुकेश अंबानी की हर शर्त मानने का आरोप है। मसलन 2004 में पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर थे और 2006 में मणिशंकर अय्यर को तब पेट्रोलियम मंत्री पद से हटा दिया गया जब रिलांयस ने खर्च करने की आधिकतम निर्धारित रकम 2.39 बिलियन डालर से बढाकर 8.8 बिलियन डालर करने की मांग की। साथ ही प्रति यूनिट गैस की कीमत 2.34 डालर से बढ़ाकर 4.2 डालर करने की मांग की । अय्यर नहीं माने तो मनमोहन सिंह ने मंत्रिमंडल में परिवर्तन कर मुरली देवडा को पेट्रोलियम मंत्री बना दिया और देवडा ने रिलायंस की तमाम शर्तो पर सहमति दी, जिस पर कैबिनेट ने मुहर लगा दी। इसी तरह रिलांयस ने अगला खेल 2012 में किया। उस वक्त जयराल रेड्डी पेट्रोलियम मंत्री थे और रिलांयस ने प्रति यूनिट गैस 4.2 डॉलर से बढ़ाकर 14.2 डालर प्रति यूनिट करने की मांग की। जयपाल रेड्डी नहीं माने तो मनमोहन सिंह ने मंत्रिमंडल में परिवर्तन कर वीरप्पा मोइली को पेट्रोलियम मंत्री बना दिया। और मंत्री बदलते ही समझौता हो गया। तय यही हुआ कि 1 अप्रैल 2014 से प्रति यूनिट गैस की किमत 8.4 डालर प्रति यूनिट होगी।

दरअसल, गैस के इस खेल को बेहद बारिकी से अंजाम दिया गया। क्योंकि जब सरकार ने गैस के खरीद मूल्य को बढ़ाने से इंकार किया तो कई वजहो को बताते हुये गैस के उत्पादन में कमी कर दी गयी। उसके बाद जो रिपोर्ट सरकार के सामने आयी वह भी कम दिल्चस्प नहीं है। बताया गया कि मुकेश अंबानी से समझौता कर लें तो रिलायंस को 43000 करोड़ का लाभ होगा। और रिलायंस ने उत्पादन कम कर दिया है और विदेशी बाजार से गैस खरीदना पड़ रहा है तो सरकार पर 53000 करोड का बोझ पड़ रहा है। तो रिलायंस के आगे मनमोहन सरकार झुक गयी। और इसी मामले को सीपीआई सांसद गुरुदास दास गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में भी उठाया। और सीएजी ने भी अपनी रिपोर्ट में करीब एक लाख 25 हजार करोड का मुनाफा रिलायंस को देने का आरोप भी लगाया। लेकिन इन सब के बाद अब दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने इस पूरे मामले को ही आपराधिक मामले करार दे दिया है। और दिल्ली के एंटी करप्शन ब्यूरो को एफआईआर दर्ज करने के आदेश दे दिये है। उसके बाद कई सवाल खड़े हो गये हैं। एफआईआर दर्ज करने के बाद एंटी करप्शन ब्यूरो क्या आरोपियों को गिरफ्तार करेगा। क्या गिरफ्तारी से बचने के लिये अब आरोपी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटायेंगे। क्या खनिज संपदा को लेकर रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट को ही आधार बना लिया जायेगा। क्या सुप्रीम कोर्ट अब तेजी से काम करेगा और कोई फैसला जल्द सुना देगा। बड़ा सवाल कि 1 अप्रैल 2014 से गैस की कीमत क्या होगी। लेकिन सिस्टम का मतलब क्रोनी कैपटिलिज्म हो चुका है यह तो मान लीजिये।

साहेब का मेरठ...2014 में 1857 का गदर और 2019 में गालिब की 'सराब'

2 फरवरी 2014 और 28 मार्च 2019 का अंतर सिर्फ तारिख भर का नही है । बल्कि भारत जैसे देश में कोई सत्ता कैसे पांच बरस में हाफंने लगती है । कैस...