बुधवार, 27 दिसंबर 2017

अगर ग्रामीण भारत मोदी सरकार से रुठ गया तो 2019 में बंटाधार


केसरिया रंग देश के राजनीतिक सत्ता की हकीकत हो चुकी है। 19 राज्य केसरिया रंग में रंगे जा चुके हैं। पर इसी केसरिया रंग की प्रयोगशाला गुजरात में सात जिले मोरबी , गिर , सोमनाथ , अमरेली , नर्मादा , तापी , डांग , अरवल्ली  में तो एक भी सीट बीजेपी को नहीं मिली । जबकि सुरेन्द्र नगर , पोरबंदर , जूनागढ , बोटाड , द्वारका , पाटण , महिसागर और छोटा उदयपुर में सिर्फ 8 सीटें ही जीत पायी। यानी गुजरात के 15 ग्रामीण जिले में बीजेपी को सिर्फ 8 सीट मीली। तो  क्या गुजरात एक ऐसा अक्स है, जिसमें बीजेपी का सियासी उफान संघ परिवार का सामाजिक ढलान हो चला है। ये सवाल  इसलिये क्योंकि ग्रामीण भारत में जड जमाये आरएसएस के ज्यादातर संगठनों को समझ नहीं आ रहा है कि उनकी संघ की उपयोगिता सरकार की चुनावी सफलता पर टिकी है या फिर खुद के कार्यों पर। और इसकी सबसे बडी वजह तो यही है कि  मोदी सरकार की नीतियों से संघ परिवार के पांच संगठनों में तालमेल नहीं है। मसलन -बीएमएस, किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच, विहिप और बजरंग दल खुद को ठगे महसूस कर रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि इन संगठनों का अपना कोई आधार नहीं है। बीएमएस के देशभर में 1 करोड 12 लाख सदस्य हैं। किसान संघ के 18 लाख सदस्य हैं। स्वदेशी जागरण मंच के 5 हजार पदाधिकारी हैं। जिनका दावा है कि डेढ करोड़ लोगों पर सीधा प्रभाव है। वही आर्थिक नीतियों पर बंटते शहरी और ग्रामीण भारत से परेशान संघ के इन संगठनों से इतर हिन्दुत्व के नाम पर विहिप-बंजरग दल को लगता है कि उन्हें ठगा जा रहा है। और  विहिप-बजरंग दल के देशभर में 40 लाख सदस्य है । और संयोग से 24 से 30 दिसबंर तक भुवनेश्वर में होनी वाली विहिप की बैठक में इन्हीं मुद्दों पर चर्चा होगी। जिसमें संघ के तमाम महत्वपूर्ण पदाधिकारियों की मौजूदगी होगी  । 

और 2014 के बाद पहली बार गुजरात चुनाव ने संघ के भीतर ही इस सवाल को जन्म दे दिया है कि बीजेपी की कमजोर जीत के पीछे मोदी सरकार की आर्थिक नीतियो को देखें या संघ के आंख मूंद लेने को। और ये सवाल बीजेपी के लिये भी महत्वपूर्ण है कि अगर ग्रामीण गुजरात की तर्ज पर देश का ग्रामीण समाज  भी बीजेपी से बिफरा तो 2019 में होगा क्या। क्योंकि देश में 26 करोड 11 लाख ग्रामीण किसान - मजदूर हैं। और 2014 के लोकसभा चुनाव का सच यही है कि 83 करोड वोटरों में से 2014 में बीजेपी को कुल वोट 17,14,36,400 मिले। यानी देश अगर राजनीतिक तौर पर ग्रामीण और शहरी मतदाता में बंट गया तो फिर ये बीजेपी के लिये ही नहीं बल्कि संघ परिवार के लिये भी खतरे की घंटी होगी। क्योंकि संघ की साख बीजेपी की चुनावी जीत-हार पर नहीं टिकी है और ये बात 2004 में शाइनिंग इंडिया तले वाजपेयी की हार के बाद भी उभरा था। पर अगला सवाल तो यही है कि क्या ग्रामीण भारत की तरफ मोदी सरकार की नीतियां देख भी रही है। क्योंकि ग्रामीण भारत को सिर्फ किसानों के नजरिये सेदेखने की भूल कमोवेश हर सरकार ने किया है जबकि सच तो यही है कि देश की इक्नामी में ग्रमीण बारत का योगदान करीब 48 फिसदी है। नेशनल अकाउंट स्टेटिक्स ने इसी बरस जो आंकडे जारी किये उसके मुताबिक खेती [96 फिसदी], पशुधन [ 95 फिसदी ] , खनन [53 फिसदी ], उत्पादन [51 फिसदी ], निर्माण [47 फिसदी ], गोदाम [ 40 पिसदी], रियल इस्टेट-रोजगार [39 फिसदी ], बिजली-पानी-गैस [33 फिसदी ], व्यापार- होटल [28 फिसदी],प्रशासन-डिफेन्स [19 फिसदी ], वित्तीय सेवा [13 फिसदी ] । ये ग्रामीण भारत का ऐसा सच है जो अक्सर सिर्फ किसानों तक ही गांव को सीमित कर छुपा दिया जाता है । नेशनल अंकाउंट स्टेटिक्स ने इसी बरस ग्रामीम भारत के इन आंकडों को जारी किया जो साफ तौर पर बताता है कि देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान करीब 48 फिसदी है। 

ग्रामीण भारत की लूट पर शहरी विकास का मॉडल जा टिका है जो बाजारवाद को बढावा दे रहा है और लगातार शहरी व ग्रामीण जीवन में अंतर बढ़ता ही जा रहा है। तो सवाल तीन हैं। पहला, सिर्फ किसानों की दुगनी आय के नारे से ग्रामीणों की गरीबी दूर नहीं होगी । दूसरा, ग्रामीण भारत को ध्यान में रखकर नीतियां नहीं बनायी गई तो देश और गरीब होगा । तीसरा , ग्रामीण भारत की लूट पर विकास की थ्योरी चल रही है । ये तीनो सवाल ही देश के हकीकत है । क्योंकि एक तरफ देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान 50 फिसदी है। दूसरी तरफ ग्रमीण भारत में प्रति व्यक्ति आय शहरी भारत से आधे से भी कम है । आलम है कितने बुरे ये इससे भी समझा जा सकता है कि शहर में प्रति दिन प्रति व्यक्ति आय 281 रुपये है। गांव में प्रति व्यक्ति प्रति आय 113 रुपये है। यानी गांव में प्रति व्यक्ति आय मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी से भी कम है। कागजों पर ही सही पर मनरेगा में सबसे कम 168 रुपये मजदूरी बिहार-झारखंड में मिलती है। तो हरियाणा में सबसे ज्यादा 277 रुपये मिलते है। तो कल्पना कीजिये ग्रामीण भारत से फलती बढती इक्नामी से ग्रामीण भारत को ही कौन अनदेखा कर रहा है। पर सवाल सिर्फ कम आय का नहीं है बल्कि ग्रामीण भारत की लूट का है, जो बाजार के जरीये देश की इक्नामी में चाहे चार चांद लगाती हो पर असल सच तो यही है कि खनिज संसाधनों से लेकर अनाज और बाकि माद्यमों से ग्रामीण भारत की इके्नामी पर ही देश की आधी भागेदारी टिकी है। और उसी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। फसल-ग्रमीण और शहरी सोशल इंडक्स में अंतर क्योंकि खुद सरकार की ही रिपोर्ट बताती है कि जबकि इन आंकडो का सच तो यही है कि कि देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान करीब 48 फिसदी है। तो क्या गरीब गुरबों और गांव-खेत का जिक्र करते करते ही मोदी सरकार इन्हीं के कटघरे में जा खड़ी हुई है। या फिर चुनावी जीत के चक्कर में खामोश संघ परिवार के भीतर की कुलबुलाहट पहली बार बताने लगी है कि अगर वह भी खामोश रही तो आरएसएस के शताब्दी बरस 2025 तक उसकी साख का बांटाधार हो जायेगा।
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मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

बीमार सरकारी इलाज और लूट पर टिका प्राइवेट इलाज ...

खबर अच्छी है। दिल्ली के शालीमार बाग के जिस मैक्स हॉस्पीटल ने जीवित नवजात शिशुओं को मरा बता दिया था, उसका लाइसेंस दिल्ली सरकार ने रद्द कर दिया। और दो दिन पहले हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम के उस फोर्टिस हॉस्पीटल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी, जहां इलाज ना देकर लाखों की वसूली की  गई थी। और इंडियन मेडिकल एसोसियन ने बिना देर किये कह दिया कि ये तो गलत हो गया। क्योंकि गलती तो होती है और गलती होने पर लाइसेंस रद्द हो गया  तब तो देश के सभी सरकारी अस्पतालों को बंद करना पडेगा। यकीनन इंडियन मेडिकल एसोशियन ने सवाल तो जायज ही उठाया कि सरकारी अस्पतालों को सरकार  तब ठीक क्यों नहीं कर लेती। दो सवाल दो है। पहला, सरकार ने हेल्थ सर्विस से पल्ला क्यों झाड लिया है। दूसरा, भारत में हेल्थ सर्विस सबसे मुनाफे वाला धंधा कैसे बन गया। तो सरकार के नजरिये पर शर्म की जाये या फिर
जिन्दगी देने के नाम पर मुनाफा कमाने वाले निजी अस्पतालों पर शर्म की जाये। या मान लिया जाये कि जनता की चुनी हुई सरकारों ने ही जनता से पल्ला झाड़ कर पैसे वालों के हाथो में देश का भविष्य थमा दिया है। और उसमें हेल्थ  सर्विस अव्वल है। क्योकि देश में सरकारी हॉस्पीटल की तादाद 19817 है। वही प्राइवेट अस्पतालों की तादाद 80,671 है। यानी इलाज के लिये कैसे  समूचा देश ही प्राइवेट अस्पतालो पर टिका हुआ है। ये सिर्फ बड़े अस्पतालों की तादाद भर से ही नही समझा जा सकता बल्ति साढे छह लाख गांव वाले देश में  सरकारी प्राइमरी हेल्थ सेंटर और कम्युनिटी हेल्थ सेंटर की संख्या सिर्फ 29635 है। जबकि निजी हेल्थ सेंटरो की तादाद करीब दो लाख से ज्यादा है  । यानी जनता को इलाज चाहिये और सरकार इलाज देने की स्थिति में नहीं है। या कहें इलाज के लिये सरकार ने सबकुछ निजी हाथों में सौप दिया है। 

क्योंकि सरकार देश के नागरिकों पर हेल्थ सेक्टर के लिये खर्च कितना करती है। ये भी देख कर शर्म ही आयेगी। क्योंकि सरकार प्रति महीने प्रति व्यक्ति पर 92 रुपये 33 पैसे खर्च करती है। और राज्यों में सबसे बेहतर स्थिति हिमाचल की है जहा प्रति नागरिक प्रति महीने 166 रुपये 66 पैसे प्रति व्यक्ति प्रति  महीने खर्च करता है। तो ये कल्पना के परे है कि देश में चुनी हुई सरकारें अपने नागरिकों के लिये कोई जिम्मेदारी लेने की स्थिति में भी है कि नहीं।  क्योंकि भारत सरकार के बजट से दुगने से ज्यादा तो प्राइवेट हेल्थ सेक्टर मुनाफा कमा लेता है। हालात है क्या ये इससे भी समझा जा सकता है कि 2009  में सरकारी का बजट था 16,543 करोड करोड और प्राइवेट हेल्थ केयर का बजट रहा 1,43,000 करोड रुपये। फिर 2015 में सरकारी बजट हुआ 33150 करोड तो प्रईवेट हेल्थ केयर का बजट हो गया 5,26,500 करोड़ । 2017 में सरकार का  बजट है 48,878 करोड तो प्राइवेट हेल्थ केयर बढ़कर हो गया 6,50,000 करोड़ रुपये। और जब सरकार को ही ये कहने में कोई शर्म नहीं आती कि देश में इलाज का ठेका तो पूरी तरह प्राइवेट अस्पतालों पर है और आंकड़े बताते हैं कि 70 फिसदी से ज्यादा हिन्दुस्तान इलाज के लिये प्राइवेट अस्पतालों पर टिका है। और ये सब किस तेजी से बडा है ये इससे भी समझा जा सकता है कि प्राइवेट  और सरकारी सेक्टर के तहत 17 बरस पहले यानी 2000 में हिस्सेदारी 50-50 फिसदी थी। और सन 2000 में हेल्थ पर सरकारी बजट 2474 करोड था। तो  प्राईवेट हेल्थ सेक्टर का बजट 50 हजार करोड का था। यानी आज जो देश के सरकारी हेल्थ सर्विस का बजट 48 हजार करोड का है 17 बरस पहले ही प्राइवेट क्षेत्र मुनाफे के लिये हैल्थ सर्विस में पैसा झोंक चुका था। तो ऐसे में  मौजूदा हालात को समझें। देश के 10 नामचीन हॉस्पीटल्स चेन का टर्नओवर करीब 50 हजार करोड़ के आसापस है। यानी देश के कुल स्वास्थ्य बजट से भी ज्यादा।  तो अगला सवाल यही है कि हेल्थ सर्विस को धंधा माना जाये या फेल हो चुकी सरकारो तले जनता की त्रासदी। 

क्योंकि सरकार किस तरह के हेल्थ सर्विस को उपलब्ध कराती है। उसकी एक बानगी आईसीयू में पडे देश के किसी भी इलाके में किसी भी सरकारी अस्पतालो की देख लीजिये। कही अस्पताल में कुत्तों का झुंड तो कही स्टैचर तक नहीं। कही डॉक्टर के बदले प्यून ही टीका लगाते हुये। तो कही जमीन पर ही अस्पताल। कही पेड़ तले ही बच्चे को जनना। और सरकार की यही वह हेल्थ सेवा है जो हर उस शख्स को प्राइवेट अस्पतालों की तरफ ले जाती है,जिसकी जेब में जान बचाने के लिए थोड़ा भी पैसा है।और फिर शुरु होता है प्राइवेट अस्पतालों में मुनाफाखोरी का खेल क्योंकि फाइव स्टार सुविधाएं देते हुए अस्पताल सेवा भाव से कहीं आगे निकलकर लूट-खसोट  के खेल में शामिल हो चुके होते हैं,जहां डॉक्टरों को कारोबार का टारगेट दिया जाता है। छोटे अस्पतालों से मरीजों को खरीदा जाता है। यानी छोटे अस्पताल जो बडे अस्पातल के लिये रेफ्रर करते है वह भी मुनाफे का धंधा हो चुका है। फिर सस्ती दवाइयों को महंगे दाम में कई-कई बार बेचा जाता है। और जिन मरीजों का इंश्योरेंस है-उन्हें पूरा का पूरा सोखा जाता है। मुश्किल इतनी भर नहीं है कि जिीसकी जेब में पैसा है इलाज उसी के लिये है । मुश्किल तो ये भी है कि अब डाक्टरो को भी सरकारी सिस्टम पर भरोसा नहीं है। क्योंकि देश में 90 फिसदी डाक्टर प्राइवेट अस्पतालों में काम करते हैं।

इंडियन मेडिकल काउसिंल के मुताबिक देश में कुल 10,22,859 रजिस्टर्ड एलोपैथिक डाक्टर है । इनमें से सिर्फ 1,13,328 डाक्टर ही सरकारी अस्पतालों में हैं। तो फिर मरीजो को भी सरकारी अस्पतालो पर कितना भरोसा होगा। कौन भूल सकता है उड़ीसा के आदिवासी की उस तस्वीर को, जो कांधे पर पत्नी का शव लिये ही अस्पताल से निकल पड़ा। पर उस तस्वीर को याद कर विचलित होने से  पायदा नहीं क्योंकि सरकार के पास तो हेल्थ सर्विस के लिये अधन्नी भी नही। बीते 17 बरस में सरकारी हेल्थ बजट 2472 करोड से 48,878 करोड पहुंचा। इसी  दौर में प्राइवेट हेल्थ बजट 50 हजार करोड से साढ छह लाख करोड पहुंच गया ।यानी सरकारी सिस्टम बीमार कर दें और इलाज के लिये प्राईवेट अस्पताल  आपकी जेब के मुताबिक जिन्दा रखे। तो बिना शर्म के ये तो कहना ही पडेगा कि सरकार जिम्मेदारी मुक्त है और प्राईवेट हेल्थ सर्विस के लिये इलाज भी मुनाफा है और मौत भी मुनाफा है। क्योंकि दिल्ली के जिस मैक्स हास्पीटल का  लाइसेंस रद्द किया गया उस मैक्स ग्रुप का टर्न ओवर 17 हजार करोड पार कर चुका है। और सरकार के पास आम आदमी के सरकारी इलाज के लिये हर दिन का बजट सि 3 रुपये है।
(साभार )

रविवार, 12 नवंबर 2017

सियासी दलदल में पटेल-इंदिरा

तारीख और तवारीख के रिश्ते कभी-कभी कुछ पेचीदगियां गढ़ देते हैं।31 अक्तूबर को ही लीजिए। इस दिन आधुनिक भारत के निर्माता सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती है, तो हिन्दुस्तान की लौह महिला इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी। विवादों की आंच से स्वार्थों का तंदूर सुलगाने वाले राजनेता अक्सर ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के बारे में अधकचरे फैसले सुना देते हैं। यह इतिहास की मूल अवधारणा के साथ अन्याय है। जिस तरह तारीखें एक-दूसरे से बावस्ता होती हैं, वैसे ही महान व्यक्तित्वों में समानता के तमाम सूत्र पाए जाते हैं। 
पहले पटेल की बात 
सरदार वल्लभभाई पटेल को लेकर इधर किस्म-किस्म के विचार व्यक्त किए जा रहे हैं। कोई उन्हें नेहरू से महान साबित करने में जुटा है, तो किसी को ऐसे दावों पर आपत्ति है। जो लोग नेहरू और पटेल के बीच की चुनिंदा असहमतियों को विवाद का दर्जा देते हैं, उन्हें कुछ तथ्यों पर गौर फरमाना चाहिए। साल1947 की शुरुआत तक नेहरू, पटेल और तमाम अन्य नेताओं का रोल कमोबेश एक सा था। उनका मकसद समान था और लड़ाई का तरीका भी। वे ऐसे आंदोलन के अगुवा थे, जिसे देश के आमजन ने अपने खून-पसीने से सींचा था। इस जंग में शामिल होने के लिए जब उन्होंने अपने सुखद भविष्य को लात मारी थी, तब उन्हें इसका इलहाम नहीं था कि वे जीते जी अपना मकसद पूरा कर सकेंगे। 
बापू उनके सर्वमान्य नेता थे और कांग्रेस थोडे़ मत-मतांतरों के साथ समानता के सूत्र तलाशने में कामयाब रही थी, पर अगस्त आते-आते हालात बदल गए। नए उभरते लोकतंत्र को एक प्रधानमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद की आवश्यकता थी। कल तक जो लोग साथ लड़ रहे थे, उनमें से एक को नेतृत्व करना था और अन्यों को सहयोगी की भूमिका निभानी थी। अगर नेहरू की जगह पटेल अथवा राजगोपालाचारी या कोई और होता, तो कहानी के किरदार भले ही बदल गए होते, पर कहानी का ‘प्लॉट’ यही रहता। वे सियासी सहचरी के दिन थे, आज की तरह अनुचरी के नहीं।
इसीलिए कुछ मुद्दों पर अगर नेहरू और पटेल में हम असहमति की खतो-किताबत पाते हैं, तो उनमें सहमति की कशिश और परस्पर सम्मान के भाव भी नजर आते हैं। बाद के दिनों में भारत ने वंशवाद अथवा नेता विशेष की झंडाबरदारी को अपना लिया, इसलिए असहमतियां सार्वजनिक जीवन से नदारद हो गईं। क्या यह विचार का विषय नहीं कि असहमतियों के बावजूद हमारी पहली सरकार भारत के एकीकरण के साथ तमाम ऐसी संस्थाओं की स्थापना में कामयाब हो गई! वही संस्थाएं और परंपराएं आज तक हमारे लोकतंत्र की रक्षा कर रही हैं। 
नेहरू और पटेल के रिश्ते को समझने के लिए उन्हीं दिनों में लौटना होगा। मौजूदा अनुभवों के आधार पर अतीत को आंकना कभी-कभी खतरनाक साबित होता है। इसकी कीमत कोई और नहीं, बल्कि खुद सरदार पटेल चुका रहे हैं। वह अगर विवादप्रिय व्यक्ति होते, तो बिना खास खून-खराबे के 550 से अधिक रियासतों का भारतीय संघ में विलय कैसे करा पाते? यहां एक संयोग का जिक्र जरूरी है। पटेल की पहली चुनावी जंग और इंदिरा गांधी के जन्म का यह शताब्दी वर्ष है। जनवरी 1917 में सरदार ने अहमदाबाद म्युनिसपैलिटी का चुनाव जीता था। उन्हें महज एक वोट से वह चुनावी फतह हासिल हुई थी। 
सरदार वल्लभभाई पटेल के व्यक्तित्व को जानने के लिए हमें उनके कृतित्व को दो भागों में बांटना होगा- आजादी के पहले, स्वतंत्रता के पश्चात। उनके बारे में जब भी बात होती है, तो उन्हें भारतीय एकीकरण का नायक बताकर लोग रुखसत हो लेते हैं, जबकि 1928 के बारदोली सत्याग्रह ने न केवल उनकी संवेदनशील नेतृत्व क्षमता को उजागर किया, बल्कि उन्हें नई पहचान भी दी। बारदोली की महिलाओं ने ही उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि से नवाजा था। आप पूछेंगे, महिलाएं क्यों? बताता हूं।
यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि पटेल उन नेताओं में एक थे, जिन्होंने राजनीति में स्त्रियों के साथ भेदभाव का खुलकर विरोध किया था। सरदार ने ‘डिस्ट्रिक्ट म्युनिसिपल एक्ट’ से उस सेक्शन 15 (1) (सी) को खत्म करवाया, जो औरतों को चुनाव लड़ने से रोकता था। उनकी यह दलील थी कि निर्वाचित सदन से औरतों को बाहर रखने का मतलब अहमदाबाद की आधी आबादी के प्रतिनिधित्व को समाप्त करना है। इस नेक निर्णय के ठीक 40 बरस बाद यानी 1966 में इंदिरा गांधी ने बहैसियत प्रधानमंत्री हिन्दुस्तान की बागडोर सम्हाली थी।
पटेल के बरक्स इंदिरा गांधी वंशवाद की उपज थीं। उन्होंने समय गुजरने के साथ-साथ ‘एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति’ की परंपरा को बल दिया। 1975 में इंदिरा ने देश पर आपातकाल तक थोप दिया, परंतु इससे भारत को ताकतवर बनाने में उनका योगदान खत्म नहीं हो जाता। सिक्किम के हिन्दुस्तान में विलय और पाकिस्तान के विभाजन के जरिए उन्होंने साबित कर दिया कि देश की सीमाओं में बढ़ोतरी के साथ सुरक्षा मामलों में वह अद्वितीय हैं। सिर्फ यही दो कार्य उन्हें अमर करने के लिए पर्याप्त हैं, हालांकि उनके खाते में और भी बहुत कुछ है। पटेल ने देश का एकीकरण किया था और नेहरू ने जमींदारी प्रथा का खात्मा। इंदिरा गांधी ने ‘प्रिवी पर्स’ खत्म कर देश से राजा-महाराजा युग को सदा-सर्वदा के लिए विदा कर दिया। उन्होंने ऐसे तमाम काम किए, जो आम आदमी के हक-हुकूक के लिए जरूरी थे। इसीलिए आपातकाल और ऑपरेशन ब्लू स्टार के बावजूद इंदिरा गांधी एक जनप्रिय शासक साबित हुईं। जिन लोगों ने 31 अक्तूबर, 1984 को उनकी हत्या के बाद देश भर में लोगों को रोते हुए देखा था, वे इसकी हामी भरेंगे। 
कौन कहता है कि वह अलोकतांत्रिक थीं?
अगर मैं पटेल को आधुनिक भारत का निर्माता और इंदिरा गांधी को वर्तमान भारत की जननी कहूं, तो शायद कुछ लोगों को अच्छा न लगे, पर यह सच है कि इंदिरा के अलावा कोई अन्य प्रधानमंत्री आज तक न तो देश की सीमा को बढ़ा सका और न ही पाकिस्तान जैसे चिर शत्रु के टुकडे़ कर सका। रही बात उनसे जुड़े विवादों की, तो मैं इन्हें बुरा नहीं मानता। संसार के सबसे बडे़ लोकतंत्र को स्वस्थ ‘डिबेट’ का हक हासिल होना ही चाहिए। तकलीफ तब होती है, जब हम निजी छींटाकशी पर उतर आते हैं। थोथे तर्कों की यह कालिख न केवल हमारे पुरखों की मर्यादा को धूमिल करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर वैचारिक प्रदूषण का अभिशाप भी थोप देती है। इससे बचने के लिए हमें किसी पटेल या इंदिरा की समीक्षा की नहीं, बल्कि अपने अंदर झांकने की जरूरत है। इस नेक काम के लिए 31 अक्तूबर से अधिक बेहतर भला और कौन सा दिन हो सकता है?
【साभार】HT

बुधवार, 1 नवंबर 2017

उम्मीद बराबरी के लोकतंत्र की........

जो 60 साल में नहीं हुआ वह 60 महीने में होगा। कुछ इसी उम्मीद के आसरे मई 2014 की शुरुआत हुई थी। और 40 महीने बीतने के बाद अक्टूबर 2017 में राहुल गांधी गुजरात को जब चुनावी तौर पर नाप रहे हैं तो अंदाज वही है जो  2013-14 में मोदी का था। तो क्या इसी उम्मीद के आसरे गुजरात में दिसंबर 2017 की शुरुआत होगी, जैसे 2014 मई में मोदी सरकार की शुरुआत हुई थी। तो फिर भारत कितना बदल चुका है। बदल रहा है या अब न्यू इंडिया के नारे  तले युवा भारत स्वर्णिम भविष्य देख रहा है। यानी हर चुनावी दौर में सत्ता के खिलाफ विपक्ष का नारा चाहे अनचाहे फैज की नज्म याद करा ही देता है ..सब ताज उछाले जाएंगे...सब तख्त गिराए जाएंगे..हम देखेंगे। तो क्या  विरोध और विद्रोह की ये अवाज चुनाव के वक्त अच्छी लगती है। क्योंकि सत्ता से उम्मीद खत्म होती है तो विपक्ष जनता बनकर सत्ता पर काबिज होने की मश्क्कत करती है। और चुनाव प्रक्रिया लोकतंत्र का राग बाखूबी जी लेती है। तो क्या चुनाव सत्ता-सियासत -राजनीति से खत्म होती जनता की उम्मीदों को बरकरार रखने का एक तरीका मात्र है। संसद से भरोसा ना डिगे। लोकतंत्र काराग बरकरार रहे। ये सारे सवाल इसलिये क्योकि श्रम व रोजगार मंत्रालय की  2016 की रिपोर्ट कहती है देश में 4,85,00,000 युवा बेरोजगार हैं। बेरोजगारी दर 12.90 फिसदी हो चुकी है। देश में सिर्फ 2,96,50,000 लोगों के पास रोजगार है। 9,26,76,000 किसान परिवारों की आय देश की औसत आय से  आधी से भी कम है। 11,90,98.000 मजदूर परिवारों की आय किसानो की औसत आय के आधे से कम है। यानी कौन सा भारत किस चुनावी उम्मीद और आस के साथ बनाया  जा रहा है। ये सवाल हर चुनाव को जीने के बाद देश के सामने कहीं ज्यादा बड़ा क्यों हो जाता है। जबकि चुनावी लोकतंत्र का अनूठा सच तो यही है कि हर  पांच बरस में देश और गरीब होता है। नेता रईस होते हैं। चुनावी खर्च बढ़ते चले जाता है। राजनीतिक पार्टियों का खजाना भरता चला जाता है।

यानी दुनिया में सबसे ज्यादा भूखे लोगों के देश में चुनाव पर सबसे ज्यादा रईसी के साथ खर्च कैसे किया जाता है और देश ही राजनीतिक सत्ता की हथेलियों पर नाचता हुआ दिखायी क्यों देता है जरा इसे चुनाव आयोग के अपने आंकडों से ही समझ लें। देश के पहले आम चुनाव 1951-52 में 10 करोड 45 लाख रुपये खर्च हुये। आर्थिक सुधार से एन पहले 1991 के आम चुनाव में 3 अरब 59 करोड 10 लाख रुपये खर्च हुये। 2004 के चुनाव में 13 अरब 20 करोड 55 लाख रुपयेखर्च हुये। और पिछले चुनाव यानी 2014 के चुनाव में 34 अरब 26 करोड 10 लाख रुपये खर्च हुये। यानी ये कल्पना के परे है कि देश की इक्नामी  में जितना उछाल आया। लोगों की आय में जितनी बढोतरी हुई। मजदूर-किसान को दो जून की रोटी के लिये जितना मिला, उससे हजार से कई लाख गुना ज्यादा की बढोतरी देश में चुनावी लोकतंत्र को जीने में खर्च हो गई। और इस तंत्र को  जीने के लिये अब हिमाचल और गुजरात तैयार हैं। जहां चुनाव कराने में जो भी खर्चा होगा उससे विकास की कितनी झडी लग जाती इस दिशा में ना भी सोचे तो भी 19 करोड भूखे नागरिको का पेट तो भरा ही जा सकता है । क्योंकि सिर्फ गुजरात में ही चुनाव कराने में ढाई अरब रुपये से ज्यादा देश के खर्च होगें । और चुनाव प्रचार में जब हर उम्मीदवार को 28 लाख रुपये खर्च करने इजाजत है तो दो अरब से ज्यादा सिर्फ उम्मीदवार अपने प्रचार में खपा देगें । क्योकि गुजरात की प्रति सीट पर अगर चार उम्मीदवारो के 28-28 लाख खर्च को जोडकर अगर चार उम्मीदवारो को ही माने तो एक करोड 12 लाख रुपये हो जाते है । और 182 सीट का मतलब है 2 अरब तीन करोड से ज्यादा ।

तो क्या वाकई चुनावी तंत्र इतना मजबूत हो चुका है कि वह लोकतंत्र पर हावी है या फिर लोकतंत्र के असल मिजाज को खारिज कर चुनाव को ही जानबूझ कर लोकतंत्र करार दिया गया है। क्योंकि सत्ता परिवर्तन की ताकत को ही लोकतंत्र मान लिया गया है। और बराबरी के वोट को ही गैर बराबरी की रोटी से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण मान लिया गया है ।
(साभार)

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

न कोई सरोकार, न कोई नीति फिर भी कहा "अन्नदाता सुखी भव"

बीते 25 बरस का सच तो यही है कि देश में सत्ता किसी की रही हो लेकिन किसान की खुदकुशी रुकी नहीं। और हर सत्ता के खिलाफ किसान का मुद्दा ही सबसे बड़ा मुद्दा होकर उभरा। तो क्या ये मान लिया जाये कि विपक्ष के लिये किसान की त्रासदी सत्ता पाने का सबसे धारधार हथियार है और सत्ता के लिये किसान पर खामोशी बरतना ही सबसे शानदार सियासत। क्योंकि राहुल गांधी तो विपक्ष की राजनीति करते हुये मंदसौर पहुंचे लेकिन पीएम खामोशी बरस कजाकस्तान चले गये। कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह दिल्ली छोड़ मंदसौर जाने के बदले बिहार चले गये। बाब रामदेव के साथ मोतीहारी में योग करने  लगे और किसानों के हालात पर बोलने की जगह योग पर ही बोलने लगे। तो क्या ये कहा जा सकता है कि राजनीति अपना काम कर रही है और किसान की त्रासदी जस की तस। यानी एक तरफ सत्ता योग कर रही है तो दूसरी तरफ विपक्ष सियासी स्टंट हो रहा है । दरअसल राजनीति के इसी मिजाज को समझने की जरुरत है क्योंकि किसान की फसल बर्बाद हो जाये तो मुआवजे के लाले पड़ जाते हैं।


कर्ज में डूब वह खुदकुशी कर लेता है लेकिन भारत में विधायक-सांसद चुनाव हार कर भी विशेषाधिकार पाये रहता है। हर पूर्व विधायक सांसद को भी किसान की आय से 300 से 400 गुना ज्यादा कम से कम मिलता ही है। देश में किसान की औसत महीने की आय 6241 रुपये है लेकिन विधायक सांसद को पेंशन-सुविधा के  नाम पर हर महीने 2 से ढाई लाख मिलते हैं। तो नेताओं के सरोकार किसान के साथ कैसे हो सकते हैं और संसद के भीतर याद कीजिये तो किसानों को लेकर किसी भी बहस को देख लीजिये संकट कोरम पूरा करने तक का आ जाता है। यानी 15 फिसदी  संसद में किसानों की समस्या पर चर्चा में शामिल नहीं होते। तो फिर किसानों का नाम लेकर राजनीति साधने या सत्ता चलाने का मतलब होता क्या है। क्योंकि राजनीति कर सत्ता पाने के लिये हर राजनीतिक दल को चंदा लेने की छूट है। और चंदा संयोग से ज्यादातर वही कारपोरेट और औघोगिक घराने देते हैं, जिनका  मुनाफा सरकार की उन नीतियो पर टिका होता है जो किसानों के हक में नहीं होती। मसलन खनन से लेकर सीमेंट-स्टील प्लांट की ज्यादातर जमीन खेती की जमीन पर या उसके बगल में होती है। 

लेकिन मुश्किल इतनी भर नहीं है। राजनीति कैसे सांसद विधायक के सरोकार किसान-मजदूर से खत्म कर सिर्फ पार्टी के लिये हो जाते है ये एंटी डिफेक्शन बिल के जरीये समझा जा सकता है । मसलन मंदसौर की घटना पर मंदसौर के ही बीजेपी सांसद किसानों पर संसद में वोटिंग होने पर अपनी पार्टी के खिलाफ वोट नहीं दे सकते। यानी मंदसौर के किसान अगर एकजुट होकर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशो को लागू कराने पर  अड जाये तो मंदसौर का ही सांसद क्या करेगा। व्हिप जारी होने पर पार्टी का साथ देना होगा । क्योंकि याद कीजिये बीजेपी ने भी 2014 के चुनावी  घोषणापत्र में 50 फीसदी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया। लेकिन 21 फरवरी 2015 को कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा कि 50 फीसदी न्यूनतम  समर्थन मूल्य बढ़ाना संभव नहीं है। क्योंकि ऐसा करने से बाजार पर विपरित प्रभाव होगा । यानी चुनावी घोषणापत्र जैसे दस्तावेज में किए वादे का भी  कोई मतलब नहीं। तो फिर चुनावी घोषमापत्र और सरकारो के होने का मतलब ही किसानो के लिये क्या है। क्योंकि महाराष्ट्र में तो बकायदा पीएम और सीएम दोनो ने ही लागत से पचास फिसदी ज्यादा देने का वादा किया था । यानी नेताओं  के सरोकार जब सामाजिक और आर्थिक तौर पर किसानों के साथ होते नहीं है तो  पिर किसानों की बात करने वाला विपक्ष हो किसानों के बदले योग करते हुये कृषि मंत्री हैं। किसानों के जीवन पर फर्क पड़ेगा कैसे। क्योंकि देश की अर्थव्यस्था में किसानी कही टिकती नहीं मसलन देश के ही सच को परख लें।  किसानो पर कुल कर्ज है 12 लाख साठ हजार करोड का है जिसमें फसली कर्ज 7 लाख 70 हजार करोड का है तो टर्म लोन यानी खाद बीज का लोन 4 लाख 85 हजार  करोड का है। और उसके नीचे की लकीर बताती है कि देश के 50 कॉरपोरेट का चार लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए का कर्ज संकटग्रस्त है यानी बैंक मान चुकी  है कि वापस आने की संभावना बहुत कम है। कॉरपोरेट को चिंता नहीं कि संकटग्रस्त कर्ज चुकाएगा नहीं तो क्या होगा क्योंकि उसे एनपीए मानने से लेकर री-स्ट्रक्चर करने की जिम्मेदारी सरकार की है। और एनपीए का आलम ये है कि वह 6 लाख 70 हजार करोड़ का हो चुका है । और इन सब के बीच बीते तीन बरस में केन्द्र सरकार ने देश के ओघोगिक घरानों को 17 लाख 14 हजार 461 करोड़ की रियायत टैक्स इंसेटिव के तौर पर दे दी है। तो देश में कभी एनपीए, टैक्स माफी या सकंटग्रस्त तर्ज पर बहस नहीं होती। हंगामा होता है तो किसानों के सवाल पर । क्योंकि देस में 26 करोड पचास लाख परिवार किसानी से जुडे है । तो फिर राजनीति तो किसानी के नाम पर ही होगी । और बाजार इक्नामी के साये तले किसान की अर्थव्यवस्था कहा मायने रखती है। और शायद यही से सवाल खडा होता है कि कर्जमाफी से भी किसान का जीवन बदलता क्यों नहीं।  

ये सवाल इसलिए क्योंकि कर्ज माफी तात्कालिक उपाय से ज्यादा कुछ नहीं-लेकिन किसानों के दर्द पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हुए राजनेताओं ने इसी उपाय को केंद्रीय उपाय करार दे डाला है। सच तो यह है कि 70 बरस में ऐसी व्यवस्था नहीं हो पाई कि किसान खुद अपने पैर पर खड़ा हो सके। सिर्फ किसान ही क्यो पूंजी से पूंजी बनाने के खेल में जो नहीं है उसके लिये आगे बढने का या कहे जिन्दगी बेहतर बनाने को कोई इक्नामी प्लानिंग देश में हुई ही नहीं है । मसलन यूपी की दो तस्वीरों को याद कर लीजिये। राहुल गांधी की खाट सभा में लोग तीस सौ रुपये की खाट लूटने में ही लग गये और योगी की सभा के बाद लोग 40 रुपये का डस्टबीन लूटने में ही लग गये। जबकि दोनों ही किसान-मजदूर। सिस्टम को बेहतर बनाने की बात कर रहे थे। यानी देश में किसानों की जो माली हालत है, उसमें सुधार कैसे आये और किसान भी गर्व से सीना चौडा कर खेती करें, क्या ऐसे हालात देश में आ सकते है। ये सवाल इसलिये क्योंकि किसानी को बेहतर करने के लिए जो इंतजाम किए जाने चाहिए थे-वो तो हुए नहीं अलबत्ता दर्द से कराहते किसानों को कर्जमाफी के रुप में लॉलीपॉप थमाया गया। तो एक सवाल अब है कि क्या राज्य सरकारें किसानों का कर्ज माफ कर सकती हैं और क्या ऐसा करने से किसानों की दशा सुधरेगी। तो दोनों सवालों का जवाब है कि ये आसान नहीं। क्योंकि कई राज्यों का वित्तीय घाटा जीडीपी के 5 फीसदी से 10 फीसदी तक पहुंच गया है, जबकि नियम के मुताबिक कोई भी राज्य अपने जीडीपी के 3 फीसदी तक ही कर्ज ले सकता है । यानी पहले से खस्ता माली हालत के बीच किसानों की कर्ज माफी का उपाय आसान नहीं है क्योंकि राज्यों के पास पैसा है ही नहीं और विरोध प्रदर्शन के बीच कर्ज माफी का ऐलान हो जाए, बैंक कर्ज माफ भी कर दें तो भी साहूकारों से लिया लोन माफ हो नहीं सकता ।-किसान कर्ज माफी के बाद भी बैंक से कर्ज लेंगे और एक फसल खराब होते ही उनके सामने जीने-मरने का संकट खड़ा हो जाता है,जिससे उबारने का कोई सिस्टम है नहीं । फसल बीमा योजना अभी मकसद में नाकाम साबित हुई है । और कर्ज माफी की संभावनाओं के बीच भी किसान की मुश्किलें बढ़ती ही हैं,क्योंकि वो कर्ज चुकाना नहीं चाहता या चुका सकता अलबत्ता नए कर्ज मिलने की संभावना बिलकुल खत्म हो जाती है। तो सवाल कर्ज माफी का नहीं,सिस्टम का है। और सिस्टम का मतलब ही जब राजनीतिक सत्ता हो जाये तो कोई करें क्या  । तो होगा यही कि आलू दो रुपये किलो होगा और आलू चिस्प 400 रुपये किलो । टमाटर 5 रुपये होगा और टमौटो कैचअप 200 रुपये किलो । और संसद की कैंटीन में चिप्स है, कैचअप है । और पीएम भी कैंटीन की डायरी में लिख देते है, अन्नदाता सुखी भव ।
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रविवार, 15 अक्टूबर 2017

ठेके पर चल रही है देश की हायर एजुकेशन

दिल्ली यूनिवर्सिटी के 45 कालेजों में 1734 पद खाली पड़े हैं। इसके लिये बकायदा 10 जून से लेकर 15 जुलाई 2017 के बीच विज्ञप्ति निकालकर बताया भी किया कि रिक्त पद भरे जायेंगे। कमोवेश हर विषय या कहें फैकल्टी के साथ रिक्त पदों का जिक्र किया गया  । यानी देश की टॉप  यूनिवर्सिटी में शुमार दिल्ली यूनिवर्सिटी का जब ये आलम है तो देश की बाकी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में क्या हो सकता है ये सोचकर आपकी रुह कांप जायेगी। क्योंकि हायर एजुकेशन को लेकर  बकायदा हर राज्य में सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी बनायी गई । और अव्वल नंबर पर जेएनयू का जिक्र बार बार बार होता है। और देश के आईआईटी, आईबीएम और एनआईटी को बेहतरीन .यूनिवर्सिटी माना जाता है । पर हालात कितने बदतर हैं जरा ये भी देख लिजिये । पहले देश के टॉप दस सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी, जहा 70 फीसदी से ज्यादा पद रिक्त हैं। तो सिलसिलेवार समझें। सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा में 87.1 फिसदी पद रिक्त पड़े हैं तो सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ तमिलनाडु में 87.1 फिसदी। और इसी तरह सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ ओडिशा में 85 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ बिहार में 84.4 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ पंजाब में 80.7 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ केरल में 78.6 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ कश्मीर में 75.6 फिसदी । इंदिरा गांधी नेशनल  ट्राइबल यूनिवर्सिटी [ मध्यप्रेदश } में 75.4 फिसदी ।सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ हिमाचल में 73.4 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ सिक्किम में 72.1 पिसदी पद रिक्त है । यूं यूनिवर्सिटी की फेहरिस्त में जेएनयू और बीएचयू में छात्रो का हंगामा तो हर किसी को याद है । सियासत भी खूब हुई । 


मसलन आप भूले नहीं होंगे जेएनयू में आजादी के नारे । पर इन नारों से इतर किसी ने नहीं पूछा कि जेएनयू में कितने पद रिक्त पडे हैं।  सरकार की रिपोर्ट कहती है 323 पद खाली पड़े हैं । भरे क्यों नहीं गये । तो कोई बोलने को तैयार नहीं । और जो बीएचयू फिल्हाल बिना वीसी के है और छात्राओं पर पुलिस ने डंडे क्यो बरसाये, ये सवाल अब भी बार बार गूंज रहा है और छात्राओं के सवाल अब भी कानो में गूंज रहे होंगे कि बीएचयू कैसे बिगड़ गया । उसे बचाना होगा तो  मदनमोहन मालवीय जी के बीएचयू का हाल ये है कि बीएचयू में 896 रिक्त पद है । यानी  सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के कुल 15862 पदों में से 5958 पद रिक्त पडे हैं । इसीलिये दुनियाभर में टाप यूनिवर्सिटी में अक्सर चर्चा होती है कि नौ छात्रो पर एक शिक्षक होना चाहिये । पर भारत में 23 छात्रों पर एक शिक्षक है । और देश में जिस आईआईटी, आईबीएम और  एनआईटी को बेहतरीन यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया जाता है । वहां का हाल ये है कि  6000 से ज्याद पद रिक्त पडे है । और इसके अलावे सिर्फ देशभर के इंजीनियरिंग कालेजों को परख लें तो सरकारी आंकडे ही कहते हैं कि इंजीनिंयरिंग कालेजो के 4 लाख 2 हजार पदो में से एक लाख 22 हजार पद रिक्त पडे है । यानी मुश्किल इतनी भर नहीं है कि सरकार रिक्त पदो पर भर्ती क्यो नहीं करती मुस्किल तो ये भी है कि जिस यूजीसी के मातहत सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आती है । उस यूजीसी के पास कोई परमानेंट चेयरमैन तक नहीं है । एडहाक चैयरमैन है ।  वाइस चैयरमैन का पद भी खाली पडा है । फाइनेनसियल एडवाइजर ही सचिव का काम देख रहा है । 

तो हायर एजूकेशन के लिये यूजीसी से लेकर सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी  जब एडहॉक चैयरमैन से लेकर एडहॉक प्रोफेसर पर  निर्भर होगी तो होगा क्या । हो ये रहा है कि बडी तादाद में हायर एजुकेशन के लिये देश के बच्चे दूसरे देशों में जा रहे हैं। और कल्पना कीजिये हायर एजुकेशन को लेकर देश का बजट 33323 करोड रुपये है । जबकि हर बरस दूसरे देसो में पढने जा रहे बच्चो के मां-बाप एक लाख 20 हजार करोड से ज्यादा की रकम खर्च कर रहे है । एसोचैम की रिपोर्ट कहती है 2012 में ही 6 लाख बच्चे हर बरस देओश छोड कर बाहर पढाई के लिये चले जाते थे । तो बीते पांच बरस में इसमें कितना इजाफा हो गया होगा और उनके लिये देश में हायर एजूकेशन की कोई व्यवस्था क्यों नहीं है । ये अपने आप में सवाल है ।
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बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

जन-जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर जन-भागीदारी की मांग करती राजनीति सत्ता

खुली अर्थव्यवस्था की जो लकीर पीवी नरसिंह राव ने जो लकीर 1991 में खींची,  उसी लकीर पर वाजपेयी चले, मनमोहन सिंह चले और अब मोदी भी चल रहे हैं । और खुली इक्नामी की इस लकीर का मतलब यही था कि रोजगार हो या शिक्षा । इलाज हो या घर । या फिर सुरक्षा । जब सब कुछ प्राइवेट सेक्टर के हाथों में इस तरह सौंपा गया कि सरकार या तो हर जिम्मेदारी से मुक्त हो गई। या फिर सरकार खुद ही कमीशन लेकर काम देने की स्थिति में आ गई । क्योंकि प्राईवेट सेक्टर को काम करना है और मुनाफा कमाना है । या कहें मुनाफा कमाना है तो कोई भी काम करना है । इन दोनो हालातों के बीच ही जनता के चुने हुए नुमाइन्दों की राजनीतिक सत्ता कैसे चलती है, अब इस सवाल को समझने की भी जरुरत है। क्योंकि सिलसिलेवार तरीके से जब हालात को परखें तो फिर जनभागेदारी कैसे सरकार के साथ होगी । जिसकी मांग स्वच्छता को लेकर 2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री ने की ये भी सवाल होगा । मसलन सरकारी नौकरी की तुलना में कई गुना ज्यादा प्राइवेट सेक्टर में नौकरी है। मसलन 1 करोड़ 72 लाख 71 हजार नौकरी सरकारी क्षेत्र में है । तो प्राइवेट सेक्टर में 1,14,22,000 है तो असंगठित क्षेत्र में 43 करोड 70  लाख नौकरियां हैं। तो फिर जनता रोजगार के लिये सरकार की तरफ क्यों देखेगी । और पांच साल के लिये चुनी हुई किसी भी सत्ता के पांच बरस के दौर में 8 हजार से ज्यादा सरकारी नौकरियों का आवेदन नहीं निकलता। तो सरकारी नौकरी है नहीं। 

और सरकारी नीतियों से अगर प्राईवेट सेक्टर की नौकरी कम होगी तो फिर नौकरी का संकट तो गहरायेगा ही जैसे अभी गहरा रहा है । इसी तरह शिक्षा, हेल्थ , घर और सुरक्षा को लेकर भी जनता सरकार की तरफ क्यों देखे । जब शिक्षा को लेकर सरकार का बजट 46,356  करोड हो और निजी क्षेत्र का बजट 7,80,000 करोड का है । जब हेल्थ सर्विस का सरकारी बजट 48,878 करोड का है और प्राईवेट क्षेत्र के हेल्थ सर्विस का बजट साढे छह लाख करोड़ का हो चुका हो । जो 2020 तक 18 लाख करोड का हो जायेगा । तो फिर सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम का मतलब बची क्या । इसी तरह घरों को लेकर भी हालात को समझे तो पिछले ढाई बरस में एक लाख तीन हजार सरकारी घर बने तो 4 लाख 71 हजार प्राइवेट घर बनकर  खाली पडे है । प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 2022 तक 4 करोड 30 लाख घर बनाने का लक्ष्य है । चुनाव 2019 में होने है । पहले ढाई बरस में लक्ष्य का सिर्फ 7 पिसदी घर बना है तो सरकार की तरफ किस नजर से जनता देखेगी । और इस कडी में जब पुलिस का जिक्र होगा तो समझना ये भी होगा निजी सुरक्षाकर्मियों की तादाद पुलिसकर्मियों से ज्यादा हो गई है । हालत ये है कि देश में पुलिस की संख्या 14 लाख है । जबकि निजी सुरक्षाकर्मियों की संख्या 70 लाख है। पूरे देश की पुलिस को लेकर बजट करीब 54 हजार करोड़ का है । पर दूसरी तरफ निजी सुरक्षाकर्मियों को लेकर प्राइवेट सेक्टर का बजट 60 हजार करोड़ पार कर चुका है । जो अगले दो बरस में 80 हजार करोड़ हो जायेगा। लेकिन पुलिस सुधार और सुधार के लिये बजट की रफ्तार बताती है कि अगले दो बरस में पुलिस बजट में 5 हजार करोड़ से ज्यादा की बढोतरी हो नहीं सकती है ।  तो फिर चुनी हुई सरकारो का मतलब सिवाय प्राइवेट सेक्टर अनुशासन में काम करें उसके अलावे । 

प्राइवेट सेक्टर में किसे कितना लाभ मिले ये नये सिस्टम बिल्ट-आपरेट-ट्रासफंर  सिस्टम यानी बीओटी से भी समझा जा सकता है । जिसमें सरकार निजी सेक्टर को लाइसेंस देती है । जिस क्षेत्र का काम  दिया जाता है उससे मुनाफा कमाकर वापस उसे सरकार को सौपा जाता है । मसलन सडक और  पुल कोई प्राईवेट सेक्टर बनाता है  उससे मुनाफा कमाता है । पिर सरकार को दे देता है । तो क्या सरकारे इसीलिये पेल हो रही है या फिर जनता का भरोसा धीरे धीरे सरकार से ही उठने लगा है । ये सवाल हर उस परिस्थिति से जोडा जा सकता है जिन परिस्थितियो में जनभागीदारी का सवाल सरकार उठाती  है । याद किजिये 2006 में मनमोहन सरकार ने पीपीपी मॉडल शुरु किया । जनता ने जमीन दी । सरकार ने मुआवजा दिया । पर देश में रोजगार या कमाई के लिये कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर है ही नहीं तो मुआवजा लेकर भी जमता फक्कड हो गई। और  अब जब मोदी स्वच्छता के लिये जनभागीदारी का जिक्र कर गये तो उसके पीछे के इस सच को भी हर किसी ने देखा कि 60 हजार करोड स्वच्छता के प्रचार प्रसार में कैसे खर्च हो गये । धन जनता का । या कहे देश का । स्वच्छता देश की । पर प्रचार प्रसार राजनीतिक लाभ के लिये और काम की सफलता का सरकारी आंकडा ही तीस फिसदी का ।तो जो गलती पीपीपी मॉडल को लेकर मनमोहन कर रहे थे । क्या वही गलती जनभागीदारी के नाम पर मोदी कर रहे हैं । क्योकि राजनीतिक लाभ के लिये राजनीतिक सत्ता का कामकाज पांच बरस चलता है यह आखिरी सच हो चला है। इसलिये सरकारी योजनाये वक्त से पहले दम तोड रही है । आलम ये कि बीते साल 6000 नए स्टार्टअप शुरु हुए थे, जिनकी संख्या इस साल सितंबर के महीने तक घटकर 800 पर आ गई है। और आईबीएम इंस्टीट्यूट फॉर बिजनेस वैल्यू एंड ऑक्सफोर्ड इक्नोमिक्स की रिपोर्ट कहती है कि देश के 90 फीसदी स्टार्टअप शुरु होने के पांच साल में बंद हो जाएंगे क्योंकि उनमें कोई नवीनता और खास बिजनेस मॉडल ही नहीं है । और तो और पांच बरस की सफलता दिखाने का ही तरीका नोटबंदी-जीएसटी तो नहीं । क्योकि कपड़ा मंत्रालय के आंकड़े कह रहे हैं कि तीन साल में 67 टैक्सटाइल यूनिट बंद हो गई, जिनसे 17600 लोगों की नौकरी चली गई । ज्यादातर नौकरी तीसरे साल गई । तो ये आकंड़ा संगठित क्षेत्र का है, और असंगठित क्षेत्र की लघु कपड़ा इकाइयां  कितनी बंद हो गई-इसका किसी को अता पता नहीं है अलबत्ता सीएमआईई का सर्वे कहता है कि नोटबंदी के बाद असंगठित क्षेत्र में 15 लाख लोगों की नौकरी गई । और हालात धीरे धीरे कैसे बिगड़ रहे हैं-इसका अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि कपड़ा, धातु, चमड़े, रत्न एवं आभूषण, आईटी एवं बीपीओ, ट्रांसपोर्ट, ऑटोमोबाइल्स और हतकरघा जैसे संगठित क्षेत्रों में रोज़गार निर्माण में तेज गिरावट आई है । उधर, कॉरपोरेट सेक्टर का हाल भी बिगड़ा हुआ है। एलएंडटी जैसी कंपनी ने 2017 की पहली दो तिमाही में 14000 लोगों की छंटनी की । एचडीएफसी बैंक ने 3230 लोगों को निकाल दिया । इस वित्तीय साल की पहली तिमाही में ही पांच में तीन बड़ी आईटी कंपनियों ने करीब 5000  लोगों को निकाल दिया । तो सरकार अगर जिम्मेदारी से पल्ला झाड कर प्राईवेट सेक्टर पर टिक जाये । और वोट की नीतियो से अगर निजी क्षेत्र में भी नौकरी खत्म होने लगे तो फिर 'एमबिट कैपिटल’ की नयी रिसर्च रिपोर्ट को समझना चाहिये जो कहती है कि , " देश में बढ़ती बेरोजगारी से न केवल असमानता बढ़ेगी बल्कि अपराधों में तेजी और सामाजिक तनाव मे भी बढ़ोतरी हो सकती है"
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मंगलवार, 19 सितंबर 2017

एक करोड़ खाली पदों को सरकार भर्ती क्यों नहीं?

रोजगार ना होने का संकट या बेरोजगारी की त्रासदी से जुझते देश का असल संकट ये भी है केन्द्र और राज्य सरकारों ने स्वीकृत पदो पर भी नियुक्ति नहीं की हैं। एक जानकारी के मुताबिक करीब एक करोड़ से ज्यादा पद देश में खाली पड़े हैं। जी ये सरकारी पद हैं। जो देश के अलग अलग विभागों से जुड़े हैं । दो महीने पहले ही जब राज्यसभा में सवाल उठा तो कैबिनेट राज्य मंत्री जितेन्द्र प्रसाद ने जवाब दिया। केन्द्र सरकार के कुल 4,20,547 पद खाली पड़े हैं। और महत्वपूर्ण ये भी है केन्द्र के जिन विभागो में पद खाली पड़े हैं, उनमें 55,000 पद सेना से जुड़े हैं। जिसमें करीब 10 हजार पद आफिसर्स कैटेगरी के हैं। इसी तरह सीबीआई में 22 फीसदी पद खाली हैं। तो प्रत्यर्पण विभाग यानी ईडी में 64 फीसदी पद खाली हैं। इतना ही नहीं शिक्षा और स्वास्थ्य सरीखे आम लोगो की जरुरतों से जुडे विभागों में 20 ले 50 फीसदी तक पद खाली हैं। तो क्या सरकार पद खाली इसलिये रखे हुये हैं कि काबिल लोग नहीं मिल रहे। या फिर वेतन देने की दिक्कत है । या फिर नियुक्ति का सिस्टम फेल है । हो जो भी लेकिन जब सवाल रोजगार ना होने का देश में उठ रहा है तो केन्द्र सरकार ही नहीं बल्कि राज्य सरकारों के तहत आने वाले लाखों पद खाली पडे हैं। आलम ये है कि देश भर में 10 लाख प्राइमरी-अपर प्राइमरी स्कूल में टीचर के पद खाली पड़े हैं। 5,49,025 पद पुलिस विभाग में खाली पडे हैं। और जिस राज्य में कानून व्यवस्था सबसे चौपट है यानी यूपी। वहां पर आधे से ज्यादा पुलिस के पद खाली पड़े हैं। यूपी में 3,63,000 पुलिस के स्वीकृत पदो में से 1,82,000 पद खाली पड़े हैं। जाहिर है सरकारों के पास खाली पदो पर नियुक्ति करने का कोई सिस्टम ही नहीं है। इसीलिये मुश्किल इतनी भर नहीं कि देश में एजुकेशन के प्रीमियर इंस्टीट्यूशन तक में पद खाली पड़े हैं। मसलन 1,22,000 पद इंजीनियरिंग कालेजो में खाली पडे है। 6,000 पद आईआईटी, आईआईएम और एनआईटी में खाली पड़े हैं।

6,000 पद देश के 47 सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में खाली पड़े हैं। यानी कितना ध्यान सरकारों को शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर हो सकता है, ये इससे भी समझा जा सकता है कि दुनिया में भारत अपनी तरह का अकेला देश है जहा स्कूल-कालेजों से लेकर अस्पतालो तक में स्वीकृत पद आधे से ज्यादा खाली पड़े है । आलम ये है कि 63,000 पद देश के 363 राज्य विश्वविघालय में खाली पडे हैं। 2 लाख से ज्यादा पद देश के 36 हजार सरकारी अस्पतालों में खाली पडे हैं। बुधवार को ही यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्दार्थ नाथ सिंह ने माना कि यूपी के सरकारी अस्पतालों में 7328 खाली पड़े पदो में से 2 हजार पदों पर जल्द भर्ती करेंगे। लेकिन खाली पदो से आगे की गंभीरता तो इस सच के साथ जुडी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि कम से कम एक हजार मरीज पर एक डाक्टर होना ही चाहिये । लेकिन भारत में 1560 मरीज पर एक डाक्टर है । इस लिहाज से 5 लाख डाक्टर तो देश में तुरंत चाहिये । लेकिन इस दिशा में सरकारे जाये तब तो बात ही अलग है । पहली प्रथमिकता तो यही है कि जो पद स्वीकृत है । इनको ही भर लिया जाये । अन्यथा समझना ये भी होगा कि स्वास्थय व कल्याण मंत्रालय का ही कहना है कि फिलहाल देश में 3500 मनोचिकित्सक हैं जबकि 11,500 मनोचिकित्सक और चाहिये ।

और जब सेना के लिये जब सरकार देश में ही हथियार बनाने के लिये नीतियां बना रही है और विदेशी निवेश के लिये हथियार सेक्टर भी खोल रही है तो सच ये भी है कि आर्डिनेंस फैक्ट्री में 14 फीसदी टैक्निकल पद तो 44 फिसदी नॉन-टेक्नीकल पद खाली पडे हैं।

यानी सवाल ये नहीं है कि रोजगार पैदा होंगे कैसे । सवाल तो ये है कि जिन जगहो पर पहले से पद स्वीकृत हैं, सरकार उन्हीं पदों को भरने की स्थिति में क्यों नहीं है। ये हालात देश के लिये खतरे की घंटी इसलिये है क्योंकि एक तरफ खाली पदों को भरने की स्थिति में सरकार नहीं है तो दूसरी तरफ बेरोजगारी का आलम ये है कि यूनाइटेड नेशन की रिपोर्ट कहती है कि 2016 में भारत में 1 करोड 77 लाख बेरोजगार थे । जो 2017 में एक करोड 78 लाख हो चुके हैं और अगले बरस 1 करोड 80 पार कर जायेंगे। लेकिन भारत सरकार की सांख्यिकी मंत्रालय की ही रिपोर्ट को परखे तो देश में 15 से 29 बरस के युवाओ करी तादाद 33,33,65,000 है । और ओईसीडी यानी आरगनाइजेशन फार इक्नामिक को-ओपरेशन एंड डेवलेपंमेंट की रिपोरट कहती है कि इन युवा तादाद के तीस पिसदी ने तो किसी नौकरी को कर रहे है ना ही पढाई कर रहे है । यानी करीब देश के 10 करोड युवा मुफलिसी में है । जो हालात किसी भी देश के लिये विस्पोटक है । लेकिन जब शिक्षा के क्षेत्र में भी केन्द्र और राज्य सरकारे खाली पद को भर नहीं रही है तो समझना ये बी होगा कि देश में 18 से 23 बरस के युवाओं की तादाद 14 करोड से ज्यादा है । इसमें 3,42,11,000 छात्र कालेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। और ये सभी ये देख समझ रहे है कि दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटी की कतार में भारतीय विश्वविधालय पिछड चुके है । रोजगार ना पाने के हालात ये है कि 80 फीसदी इंजीनियर और 90 फिसदी मैनेजमेंट ग्रेजुएट नौकरी लायक नही है । आईटी सेक्टर में रोजगार की मंदी के साथ आटोमेशन के बाद बेरोजगारी की स्थिति से छात्र डरे हुये हैं। यानी कहीं ना कहीं छात्रों के सामने ये संकेट तो है कि युवा भारत के सपने राजनीति की उसी चौखट पर दम तोड रहे है जो राजनीति भारत के युवा होने पर गर्व कर रही है । और एक करोड़ खाली सरकारी पदों को भरने का कोई सिस्टम या राजनीतिक जिम्मेदारी किसी सत्ता ने अपने ऊपर ली नहीं है।
(साभार)

रविवार, 3 सितंबर 2017

मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार के मायने
      पिछले 3 सालों से अगर देखें तो मोदी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में एक बात बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वर्तमान पार्टी नेताओं पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है  पिछले प्रत्येक मंत्रिमंडल विस्तार में एक बात जो कॉमन रही है वह यह है कि भाजपा में ऐसा लगता है कि नेताओं की कमी सी हो गई है क्योंकि पिछले मंत्रिमंडल विस्तार में या इस मंत्रिमंडल विस्तार में अगर देखें तो आपको पता चल जाएगा कि किस तरह से बिना किसी सदन के सदस्य होते हुए भी बाहरी लोग मंत्री बनाए गए और भाजपा के छह छह बार के सांसद मंत्री पद की लालसा लिए रह गए यह नरेंद्र मोदी की न्यू इंडिया की स्टाइल है मंत्रिमंडल विस्तार में मंत्री बनाए गए आर के सिंह हो हरदीप पुरी हूं या फिर अल्फांसो कन्नन तीनों के पास कोई खास राजनीतिक अनुभव नहीं है लेकिन फिर भी उन्हें मंत्री बनाया गया वही सरकार में काम कर रहे राजीव प्रताप रूडी और बंडारू दत्तात्रेय जैसे सीनियर नेताओं को हटाया गया राजीव प्रताप रूडी एविएशन फील्ड के मास्टर है लेकिन लेकिन सरकार उनका पूरी तरह से उपयोग नहीं कर पाई और उन्हें कम महत्व के मंत्रालयों में भेजकर और बाद में काम ना करने का आरोप लगाकर मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया जबकि जानकार बताते हैं कि राजीव प्रताप रूडी एक बेहद लगनशील व्यक्तित्व है वही गिरिराज सिंह जैसे एक बेहद विवादास्पद मंत्री का पद बिना काम किए भी बरकरार रह गया और तरक्की भी पा गया इससे स्पष्ट है की सरकार में वही लोग काम करेंगे जीन की भूमिका विवादास्पद हो और वे ध्रुवीकरण की राजनीति कर सकें

साहेब का मेरठ...2014 में 1857 का गदर और 2019 में गालिब की 'सराब'

2 फरवरी 2014 और 28 मार्च 2019 का अंतर सिर्फ तारिख भर का नही है । बल्कि भारत जैसे देश में कोई सत्ता कैसे पांच बरस में हाफंने लगती है । कैस...