रविवार, 13 जुलाई 2014

क्या गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का कोई वजूद संभव है?

बीते लोकसभा चुनाव की बात है. प्रचार के लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी गुजरात के दाहोद लोकसभा क्षेत्र में पहुंचे थे. देवगढ़ बरिया नाम की एक जगह पर उनकी रैली थी. आयोजन शुरू हुआ. राहुल गांधी मंच पर बैठे थे. इससे थोड़ी ही दूर एक महिला एसपीजी से गुहार लगा रही थी कि उसे मंच पर जाने दिया जाए. वह सुरक्षाकर्मियों को बता रही थी कि उसका नाम  डॉ. प्रभा किशोर ताविआड़ है और वह दाहोद से कांग्रेस की लोकसभा प्रत्याशी है जिसके पक्ष में राहुल चुनाव प्रचार करने आए हैं. लेकिन एसपीजी ने महिला को मंच पर जाने नहीं दिया. रैली खत्म हुई. उसके बाद जब राहुल गांधी अपने हेलिकॉप्टर की तरफ बढ़ रहे थे तो प्रभा राहुल से मिलने के लिए दौड़ती हुईं उनकी ओर बढ़ीं. वे राहुल तक पहुंचतीं तब तक राहुल अपने उड़नखटोले में बैठ गए. प्रभा न राहुल से मिल पाईं और न राहुल यह जान पाए कि वे यहां दाहोद में किस प्रत्याशी के चुनाव प्रचार में आए थे.
यह एक छोटा-सा उदाहरण है, जो कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के बारे में बहुत कुछ बताता है. इससे पता चलता है कि कैसे लोकसभा चुनाव में जनता ने कांग्रेस को जो फैसला सुनाया है, वह उसकी सच्ची हकदार थी.
कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास की यह सबसे बड़ी हार है. 12 राज्यों में उसका खाता तक नहीं खुला. उसके 16 में से 13 कैबिनेट मंत्री चुनाव हार गए. किसी भी राज्य में पार्टी दहाई का आंकड़ा नहीं छू पाई. इस बार का 19.3 फीसदी उसे अब तक मिला सबसे कम मत प्रतिशत है. 1999 में 114 सीटों के साथ अपना तब तक का सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली पार्टी इस बार 44 सीटों पर सिमट गई.
चुनाव परिणाम आने के बाद से ही कांग्रेस पार्टी के भीतर घमासान मचा हुआ है. हर नेता के पास पार्टी की हार का अपना ‘सॉलिड’ कारण मौजूद है. हार के कारणों के लिए शुरू हुए निर्मम पोस्टमॉर्टम से गांधी परिवार भी बच नहीं पाया है. पार्टी के भीतर ही तमाम ऐसे लोग हैं जो गंभीरता के साथ कहते हैं कि इस बार की हार पहले गांधी परिवार की हार है, फिर पार्टी की. हार के लिए परिवार को जिम्मेदार मानने वालों का तर्क है कि पार्टी और सरकार, दोनों की कमान परिवार के हाथ में ही थी, उन छिटपुट मौकों के अलावा जब मनमोहन सिंह ने यह जताने की कोशिश की कि इस देश में प्रधानमंत्री है और वह 10 जनपथ के रिमोट से संचालित नहीं होता. यानी कुछेक अपवादों के इतर सरकार की पिछले 10 सालों की छवि ऐसी ही रही है कि वह गांधी परिवार की इच्छाओं से संचालित होती है. लोकसभा चुनाव प्रचार की कमान पूरी तरह से परिवार के हाथ में ही रही. प्रचार के दौरान जो भी पोस्टर लगे उसमें राहुल ही यह कहते दिखाई दिए कि ‘मैं नहीं हम’, लेकिन पोस्टर का भाव मैं और सिर्फ मैं वाला ही था. जिस सरकार के काम पर जनादेश मांगने कांग्रेस पार्टी चुनावों में जा रही थी उस सरकार के किसी भी मंत्री की तस्वीर चुनावी इश्तहारों में नहीं थी. सबकुछ राहुलमय ही था. जो प्रधानमंत्री पिछले 10 सालों से शासन कर रहा था उसने इस चुनाव में कहां-कहां प्रचार किया, यह पता करने के लिए पहले माथा खपाना पड़ेगा और उसके बाद रैलियों और सभाओं की संख्याओं को उंगलियों पर गिना जा सकेगा.
तो ऐसी स्थिति में जो चुनाव परिणाम आया है उसे अगर पार्टी के भीतर लोग तेरा तुझको अर्पण की तर्ज पर गांधी परिवार को समर्पित कर रहे हैं तो इसमें कुछ गलत दिखाई नहीं देता. लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिलने के बाद पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाने वाली ताकतों ने भी तेजी से सर उठाया है. इसे साहस कहें या बहुत लंबे समय से मन में पल रहा गुस्सा कि पार्टी के नेता यह बताने लगे हैं कि कमी कहां रह गई, किसने गलती की आदि. मिलिंद देवड़ा ने राहुल के सलाहकारों पर प्रश्न उठाकर एक तरह से राहुल पर ही सवाल खड़ा कर दिया तो दूसरी तरफ प्रिया दत्त ने भी पार्टी के प्रचार अभियान में नुक्स निकालने में कमी नहीं रखी. असम में पार्टी की करारी हार के बाद तरूण गोगोई ने सोनिया गांधी को इस्तीफा सौंपा जिसे सोनिया ने खारिज कर दिया. सोनिया के इस्तीफा खारिज करने संबंधी निर्णय का असम में पार्टी के कई विधायकों ने सरेआम विरोध किया. चुनाव के बाद से शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरा हो जिस दिन कांग्रेस के किसी नेता ने सार्वजनिक रूप से पार्टी की चुनावी रणनीति की आलोचना न की हो.
इसी से कुछ स्वाभाविक सवाल पैदा होते हैं. जब परिवार के कारण पार्टी की यह फजीहत हुई है तो फिर हार का ठीकरा परिवार के सिर क्यों न फोड़ा जाए? अगर पार्टी को इस चुनावी त्रासदी तक परिवार ने पहुंचाया है तो फिर पार्टी परिवार से खुद को अलग क्यों न कर ले? क्यों न वह एक ऐसी पार्टी बन जाए जो गांधी परिवार के रिमोट से संचालित नहीं होती?  क्या समय आ गया है जब पार्टी को परिवार से कह देना चाहिए कि अब बस, वह किसी गांधी के इशारे पर नहीं चलेगी? लोकतंत्र में नेता वही होता है जिसके साथ जनता हो. चुनाव नतीजों ने साफ किया है कि जनता कांग्रेस नेतृत्व के साथ नहीं है. तो क्या अब नेतृत्व के लिए कांग्रेस गांधी परिवार से बाहर देखने की कोशिश या हिम्मत करेगी?
साभार फोटोः आइएएनएस
साभार फोटोः आइएएनएस
इन सारे सवालों का जवाब एक सवाल में ही छिपा है. सवाल यह कि क्या गांधी परिवार से अलग कांग्रेस पार्टी का का कोई वजूद संभव है?
जानकारों का मानना है कि आज कांग्रेस पार्टी का जो ढांचा है उसे देखते हुए पार्टी को परिवार से अलग करना असंभव है. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘पार्टी से अगर आप सोनिया जी, राहुल जी को अलग करेंगे तो फिर उसके पास बचेगा क्या. वह बिखर जाएगी. यह प्रयोग पहले हो चुका है जब 1996 और 1998 के बीच पार्टी ने दो अध्यक्षों को हड़बड़ी में बदल दिया. उसका क्या नतीजा निकला सभी को पता है. पार्टी के लिए परिवार ऑक्सीजन की तरह है. ’
‘पार्टी अपने अस्तित्व के लिए परिवार पर निर्भर है. तो दूसरी तरफ परिवार भी अपने अस्तित्व के लिए पार्टी पर आश्रित है. साथ रहना दोनों की मजबूरी है’.’
कांग्रेस का इतिहास बताता है कि जब कभी वह कमजोर हुई, उसके नेताओं ने उसका साथ छोड़ने में देर नहीं की. 1988 में लोकसभा चुनावों से ठीक पहले वीपी सिंह पार्टी से बाहर निकल गए और उन्होंने जनता दल का गठन किया. 1991 से 96 के बीच जब नरसिम्हा राव कांग्रेस सरकार के मुखिया थे तो अर्जुन सिंह, एनडी तिवारी, माधवराव सिंधिया, चिदंबरम और ममता बनर्जी ने पार्टी से बाहर निकलकर अपनी अलग राजनीति की शुरुआत की. 1998 में सोनिया गांधी के अध्यक्ष पद संभालने के बाद 1999 में उनके विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर शरद पवार, तारिक अनवर और पीए संगमा जैसे नेताओं ने पार्टी से बाहर निकलकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया. पार्टी पर नजर रखने वाले इस बात की संभावना जरूर जताते हैं कि आने वाले समय में कुछ लोग कांग्रेस का दामन छोड़ सकते हैं. लेकिन पार्टी में अब ऐसे कद्दावर नेता न के बराबर बचे हैं जो बाहर निकलकर अपनी अलग राजनीतिक शुरुआत कर सकें. ऐसे में ये नेता दूसरे दलों का रुख जरूर कर सकते हैं.
सोनिया गांधी ने अपने बाद राहुल गांधी के लिए नेतृत्व का रास्ता तैयार करने की कोशिश की, लेकिन राहुल राजनीति में पूरी तरह से नाकामयाब होते दिखते हैं
पार्टी के नेता पार्टी के लिए परिवार के महत्व की चर्चा करते हुए कहते हैं कि जब-जब कांग्रेस परिवार से दूर हुई है, वह खत्म होने के करीब होती गई है. वे उदाहरण देते हैं कि कैसे सीताराम केसरी के जमाने में पार्टी बिखराव की स्थिति में पहुंच गई थी और कैसे सोनिया ने आकर पार्टी को संभाला था. नहीं तो पार्टी खत्म हो गई होती. खैर, इस तरह पार्टी और परिवार के संबंधों पर पार्टी के अंदर और बाहर लोगों से चर्चा करने पर यह बात निकल कर आती है कि कैसे परिवार के साथ बने रहना ही कांग्रेस के हित में है. तो सवाल उठता है कि जब पार्टी के पास परिवार से दूर जाने का कोई विकल्प नहीं है तो फिर भविष्य में खुद को स्थापित करने के लिए उसके पास विकल्प क्या बचता है.
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि यही कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. हार तो अस्थाई है, लेकिन पार्टी के सामने नेतृत्व की जो समस्या खड़ी है उसे उसका कोई स्थायी समाधान दिखाई नहीं देता. दिक्कत इसलिए भी है क्योंकि कांग्रेस का नेतृत्व गांधी परिवार के दायरे में ही निर्धारित होना है.
यह प्रश्न गंभीर इसलिए हो जाता है क्योंकि सोनिया गांधी ने अपने बाद राहुल गांधी के लिए नेतृत्व का रास्ता तैयार करने की कोशिश की, लेकिन वे चुनावी राजनीति में पूरी तरह से नाकामयाब होते दिखाई देते हैं. हाल के लोकसभा चुनाव परिणामों के अलावा पूर्व में कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में हुई पार्टी की हार ने राहुल के नेतृत्व और उनकी क्षमताओं पर गंभीर प्रश्न खड़ा किया है. राहुल के बारे में कहा जाने लगा है कि उन्हें राजनीति में रुचि नहीं है. वे एक अनिच्छुक राजनेता हैं. नीरजा कहती हैं, ‘राहुल के राजनीतिक करियर को देखने से पता चलता है जैसे उनसे कोई जबर्दस्ती राजनीति करा रहा है. वे बेमन से काम करते हुए दिखाई देते हैं.’
बीते चुनाव में ही राहुल की सक्रियता को लेकर तमाम सवाल उठाए गए. पार्टी के अंदर के नेताओं का यह कहना था कि उन्हें खुद नहीं पता होता था कि राहुल कब देश में हंै और कब विदेश में. चुनाव प्रचार के दौरान भी उनकी विदेश यात्राएं जारी रहीं. राहुल के संसदीय रिकॉर्ड पर नजर डालें तो पता चलता है कि पिछली लोकसभा में सदन में उनकी उपस्थिति सांसदों के औसत 70 फीसदी की तुलना में 43 फीसदी थी. पूरे कार्यकाल में राहुल ने कोई प्रश्न नहीं पूछा था.
राहुल की सीमाओं की चर्चा करते हुए रशीद कहते हैं, ‘राहुल को उपाध्यक्ष बनाकर और अपने बाद पार्टी की बागडोर संभालने वाले का संदेश देकर सोनिया गांधी ने भी गलती की. राहुल क्या हैं? उनकी क्षमताएं क्या हैं ? यह किसी को पता नहीं था. सोनिया को उन्हें यूपीए 2 में मंत्री बनाना चाहिए था. लेकिन दिक्कत यह रही कि पार्टी में सत्ता को लेकर सभी सोनिया की तरह ही त्यागी हो गए. जिम्मेदारी के बगैर सत्ता का स्वाद चखने की बीमारी फैल गई. 2009 में खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राहुल को मंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया था जिसे राहुल ने नकार दिया.’
पार्टी के एक राज्य सभा सदस्य कहते हैं, ‘ मंत्री बनकर  अगर राहुल ने प्रशासनिक और नेतृत्व क्षमता हासिल कर ली होती और तब वे कुछ कहते तो लोगों को उनकी बातों पर भरोसा होता. लेकिन वे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाई दिए जिसका अनुभव धेले के बराबर नहीं है, लेकिन बातें वह बड़ी-बड़ी करता है’.
ऊपर से लेकर नीचे तक पार्टी में कई नेता हैं जो कुछ यही बात कहते हैं. उत्तर प्रदेश के हरदोई में पार्टी के शहर अध्यक्ष शशिभूषण शुक्ला उर्फ शोले कहते हैं, ‘दिक्क्त अब यह है कि कि पार्टी कार्यकर्ता भी राहुल जी को परिपक्व नहीं मानता. पार्टी में सक्रिय होने के बाद से उन्होंने जो भी फैसले लिए हैं उनमें से किसी एक भी फैसले से पार्टी का भला नहीं हुआ. एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस में उन्होंने ऐसा परिवर्तन किया कि दोनों संगठन अखाड़ा बन गए. लोग वहां एक दूसरे से सिरफुटौव्वल कर रहे हैं.’ मई, 2011 में भट्टा परसौल में किसान आंदोलन, 2012 के यूपी विधानसभा चुनावों में सक्रियता के साथ प्रचार, दलितों के घर खाना खाने जाना, ओडिशा के नियामगिरी में जाकर आदिवासियों से यह कहना कि मैं आपका सिपाही हूं, ये कुछ ऐसे गिने चुने तारे हैं जिनसे राहुल के 10 साल के राजनीतिक करियर का अंधकार में डूबा आकाश कुछ चमक देख पाता है. यह भी उल्लेखनीय है कि भले ही 10 साल के अपने कार्यकाल में राहुल कुछ उल्लेखनीय न कर पाए हों लेकिन पार्टी में उनका कद बढ़ता चला गया.
‘राहुल को नुकसान पहुंचाने में प्रियंका की भी भूमिका रही है. बाहर आकर प्रियंका ने अपने भाई को मजबूत करने की जगह और कमजोर किया है’
हालांकि पार्टी के कुछ नेता याद दिलाते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जो 21 सीटें मिलीं थीं उसमें राहुल गांधी का भी बड़ा योगदान है. उत्तर प्रदेश में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री कहते हैं, ‘राहुल के बारे में बात करते समय लोग इस तथ्य को भूल जाते हैं कि उन्होंने यूपी के चुनावों में कितना पसीना बहाया. कितनी कड़ी मेहनत की थी. परिणाम उसके अनुरूप नहीं आए, लेकिन आप उनकी मेहनत पर प्रश्न नहीं उठा सकते’
कुछ समय पहले दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में कांग्रेस का एक सम्मेलन था. उसमें राहुल गांधी के भाषण की काफी चर्चा हुई थी. लेकिन राहुल अपने बारे मंे उस तरह की चर्चा को आगे नहीं बढ़ा सके. हां, वे अपने अजीबोगरीब बयानों के कारण जरूर चर्चा में रहे. चाहे गरीबी को मानसिक अवस्था बताने वाली बात हो या फिर यूपी चुनावों में सैम पित्रौदा को बढ़ई बताने वाला बयान हो या भारत को मधुमक्खी का छत्ता बताने संबंधी उनका कथन, उनकी ज्यादातर बातों पर विरोधी चुटकी लेते देखे गए.
राहुल की सीमाओं की चर्चा करते हुए बोस कहते हैं, ‘राहुल की सबसे बड़ी दिक्कत यह रही है कि उनकी राजनीतिक शुरुआत ही पार्टी के सत्ता में रहने के दौर में हुई. दूसरी बात यह कि वे लगातार सत्ता में रहे, लेकिन हमेशा कहते रहे कि पूरी व्यवस्था खराब है, सब बदलना होगा जबकि उनकी अपनी पार्टी की सरकार थी. बहुत से ऐसे मौके आए जब वे आम जनता और युवाओं से जुड़ सकते थे, लेकिन वे पीछे रहे. जैसे अन्ना आंदोलन और निर्भया बलात्कार प्रकरण के समय जब युवा सड़कों पर थे तो राहुल गांधी कहीं दिखाई नहीं दिए. निर्भया के समय यह नारा भी चला था कि सारे युवा यहां हैं, राहुल गांधी कहां है.’ कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘आम कांग्रेसी राहुल के नेतृत्व में भरोसा खो चुका है. लेकिन सोनिया जी अगर पुत्रमोह में उन्हें मौका देना चाहती हैं तो फिर कांग्रेस का भगवान ही मालिक है.  राहुल ईमानदार हैं. उनकी स्वच्छ छवि है, लेकिन बुद्धि, विवेक और नेतृत्व क्षमता भी तो कोई चीज होती है. इसके बिना आदमी घर का नेतृत्व नहीं कर सकता देश का क्या करेगा. स्थिति यह है कि फोर्ब्स पत्रिका ने लिखा है कि राहुल गांधी भारत के पूर्व भविष्य के प्रधानमंत्री हैं.’
  भाजपा ने मोदी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाकर छोड़ दिया होता तो क्या वे उतना ही असर डालते जितना उन्होंने पीएम प्रत्याशी बनने के बाद डाला. जनता को पता था कि वह किसे किस पद के लिए चुन रही है. लेकिन इधर राहुल को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने छोड़ दिया. पार्टी खुद अनिर्णय की स्थिति में थी कि राहुल को पीएम पद के लिए प्रोजेक्ट करे या नहीं. राहुल पर खुद उसे ही भरोसा नहीं था तो फिर वह जनता से कैसे निर्णय की उम्मीद कर सकती थी. राहुल पर फैसला तब दिया जा सकता था जब राहुल के नाम पर चुनाव लड़ा गया होता ’
कांग्रेस के भीतर ही राहुल की कोर टीम को लेकर किस तरह का गुस्सा उबल रहा था यह चुनाव के बाद नेताओं के बयानों से सामने आ गया. इन नेताओं के बयानों को अगर ध्यान से देखें तो समझ में आता है कि उनकी नाराजगी का असली निशाना राहुल गांधी ही हैं. मिलिंद ने कहा कि सलाह देने वाले पार्टी की बुरी गत के लिए जिम्मेदार हैं ही, साथ में वे भी उतना ही इस हार के लिए जिम्मेदार हैं जो इनसे सलाह ले रहे थे.’ पार्टी के तमाम नेता आज पार्टी के उन तमाम गैरराजनीतिक लोगों को कोस रहे हैं जो राहुल गांधी को सलाह देने का काम किया करते थे.  कार्यकर्ता राहुल और उनकी टीम को कैसे देखता है उसकी एक बानगी देखिए, शशिभूषण कहते हैं, ‘राहुल जी को जनता अपरिपक्व मानती है. उनके सलाहकार भी वैसे ही हैं. जिन लोगों को राजनीतिक का क, ख, ग, घ नहीं आता उन्होंने फैसला लेना शुरु कर दिया. ’ पार्टी के एक वरिष्ठ नेता राहुल गांधी पर चुटकी लेते हुए कहते हैं, ‘पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम सामने आने के बाद राहुल ने कहा था कि वे पार्टी को कुछ ऐसे बदलेंगे कि जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते. उन्होंने लोकसभा में यह करके दिखा दिया.’
रशीद कहते हैं, ‘दिक्कत यह भी रही कि राहुल जयराम रमेश और अपनी टीम के साथ मिलकर चुनाव लड़ने और जीतने की जगह संस्थाएं मजबूत करने के कार्य में लग गए थे. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘राहुल जी एक्सपेरिमेंट करने लगे. वे ऐसे सलाहकारों से घिर गए जिनका जमीनी राजनीति से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था. मोहन गोपाल, जयराम रमेश, मधुसूदन मिस्त्री, कनिष्क सिंह, दीप पॉल जैसे लोगों ने उन्हें गुमराह करने का काम किया. राहुल को हरा चश्मा पहनाकर वे कहते रहे कि देखिए, चारों तरफ हरा ही हरा है. जिस प्राइमरी चुनाव की शुरुआत राहुल ने की उसके माध्यम से चुने गए सारे प्रत्याशी चुनाव हार गए. स्थिति यह थी कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को राहुल से मिलने के लिए टीम के नए लड़कों से समय लेना पड़ता था. उन्होंने पार्टी को एक ट्रेनिंग ग्राउंड बना दिया.’
राहुल पर कांग्रेस के नेता ही कथनी और करनी में भेद करने का आरोप लगाते हैं. पार्टी के एक पूर्व सांसद कहते हैं, ‘आप राहुल जी के कामों को ध्यान से देखेंगे तो आपको कथनी और करनी का भेद पता चल जाएगा. जैसे पहले उन्होंने कहा कि दूसरी पार्टी से आने वालों को कांग्रेसी कार्यकर्ताओं पर तवज्जो नहीं दी जाएगी.  लेकिन छत्तीसगढ़ में चुनाव से 10 दिन पहले पार्टी में आई करुणा शुक्ला को पार्टी ने टिकट दे दिया. मध्य प्रदेश में भाजपा मंत्री विजय शाह के भाई अजय शाह प्रत्याशी नामित होने के बाद पार्टी में आए. राहुल ने भ्रष्ट नेताओं को बचाने वाला अध्यादेश फाड़कर पहले प्रधानमंत्री को अपमानित किया और फिर लालू प्रसाद यादव से हाथ मिला लिया. भ्रष्टों का विरोध करते रहे लेकिन अशोक च्वहाण को टिकट देने से नहीं चूके.’
रशीद कहते हैं, ‘स्थिति यह हो गई कि पार्टी बीच में कहीं फंसी दिखाई देने लगी. न राहुल के कारण पार्टी में कोई बदलाव आया. न कोई नयापन महसूस हुआ और न ही पार्टी पारंपरिक राजनीति के रास्ते पर ही आगे बढ़ सकी.’ जानकार बताते हैं कि नेतृत्व के दो केंद्रों के कारण भी पार्टी का कबाड़ा हुआ. एक तरफ सोनिया गांधी की कांग्रेस थी तो दूसरी तरफ हर चीज में बदलाव को आतुर राहुल गांधी थे.
‘न राहुल के कारण पार्टी में कोई बदलाव आया. न कोई नयापन महसूस हुआ और न ही पार्टी पारंपरिक राजनीति के रास्ते पर ही आगे बढ़ सकी’
रशीद कहते हैं, ‘सोनिया कांग्रेस और राहुल कांग्रेस के बीच का अंतर ही वर्तमान में कांग्रेस की असल समस्या है. दोनों के काम करने में बहुत अंतर है. दोनों समूहों में रस्साकशी जारी है. उन्हें तय करना होगा कि आगे की राह सोनिया कांग्रेस के नेतृत्व में तय करनी है या राहुल कांग्रेस के. दोनों मां-बेटे के बीच वैसे तो सब ठीक है लेकिन दोनों के बीच कार्यात्मक संबंध ठीक नहीं है. ठीक ऐसा ही यूपी में अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव और पंजाब में बड़े बादल और छोटे बादल के बीच है.’ पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘राहुल जी को सोनिया जी से राजनीति सीखनी होगी. वे कोई भी निर्णय लेने से पहले पार्टी के सभी बुजुर्ग से लेकर युवा नेताओं तक का ख्याल रखती थीं. यह नहीं कि आप सीनियर हैं तो अब आपकी पार्टी में कोई जरूरत नहीं है. खाली युवा जोश से कुछ नहीं होगा. होश भी चाहिए तभी काम बनेगा.’
कांग्रेस की आंतरिक राजनीति को करीब से जानने वाले बताते हैं कि कैसे जबसे राहुल गांधी ने पार्टी में आमूलचूल बदलाव लाने संबंधी अपने प्रयोग शुरु किए तभी से वे पार्टी के पुराने नेताओं के निशाने पर हैं. यूथ कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, ‘पुराने नेताओं के भीतर राहुल जी के प्रयोग से हमेशा डर समाया रहता है. उन्हें लगता है कि यह आदमी कोई ऐसा प्रयोग न कर दे कि वही लोग बाहर हो जाएं.’ गिरिजाशंकर कहते हैं, ‘राहुल पार्टी में सालों से बने यथास्थितिवाद को बदलना चाहते हैं. यही कारण है कि पुराने नेता उनसे खार खाए बैठे हैं.’
जानकारों का एक वर्ग मानता है कि राहुल के खिलाफ कुछ उसी तरह का सिंडिकेट काम कर रहा है जो इंदिरा गांधी के समय में उनके खिलाफ पार्टी में रहते हुए षड़यंत्र रचता था. यह तबका नहीं चाहता कि राहुल सफल हों. लेकिन वे सिंडिकेट है कौन?  गिरिजाशंकर कहते हैं, ‘यह सिंडिकेट वही हैं जो सोनिया के साथ वाले हैं. सोनिया यथास्थितिवाद को बदलना नहीं चाहती हैं इसलिए वे इनसे खुश हंै लेकिन राहुल से असहज हैं.’
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तो सवाल उठता है कि अगर राहुल गांधी का नेतृत्व पार्टी को कहीं आगे ले जाता नहीं दिखता तो फिर पार्टी के पास विकल्प क्या बचता है?
पिछले कुछ सालों में जितनी तेजी से राहुल गांधी की सीमाएं सामने आती गई हैं उतनी ही तेजी से पार्टी और कार्यकर्ताओं के एक धड़े के बीच से प्रियंका गांधी का नाम उछलता रहा है. अपनी राजनीति को भाई और मां की लोकसभा सीटों तक सीमित रखने वाली प्रियंका को पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी देने की मांग बहुत पहले से उठ रही है. हाल ही में पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता केवी थॉमस ने प्रियंका को पार्टी में बड़ी भूमिका देने की वकालत की. बड़ी तादात में कांग्रेसियों का ऐसा मानना है कि पार्टी के पास अब आखिरी पत्ता प्रियंका गांधी ही हैं. ऐसे में अस्तित्व के संकट से गुजर रही पार्टी को संजीवनी देने के लिए सोनिया गांधी को प्रियंका को आगे लाना चाहिए. गिरिजाशंकर कहते हैं, ‘ पार्टी को स्पष्ट रूप से तय करना होगा कि उसका नेतृत्व कौन करेगा. सोनिया, राहुल और प्रियंका के कॉकटेल ने ही तो पार्टी का सारा खेल खराब किया है. राहुल को नुकसान पहुंचाने में प्रियंका की भी भूमिका रही है. बाहर आकर प्रियंका ने अपने भाई को मजबूत करने की जगह और कमजोर किया है.’
गिरिजाशंकर अपनी बात को विस्तार देते हुए कहते हैंैं, ‘चुनाव में अगर पार्टी एक साथ कई चेहरों को लेकर उतरती है तो मामला प्रभावशील नहीं रह पाता. इस चुनाव में कांग्रेस ने यही किया है. एक तरफ उसने राहुल को उतारा तो दूसरी तरफ प्रियंका भी मोदी से दो-दो हाथ करने लगीं. पता चला कि कार्यकर्ता राहुल को छोड़कर चुनाव के बीच में प्रियंका को नेतृत्व सौंपने की मांग करने लगा. इस कारण से भी पार्टी की बुरी गत हुई.’ रशीद भी मानते हैं कि राहुल के रहते हुए अगर पार्टी ने प्रियंका को आगे किया तो पार्टी की समस्या और बढ़ेगी.  बकौल गिरिजाशंकर, ‘कांग्रेस का रिवाइवल परिवार के माध्यम से ही होगा. हां, उन्हें यह तय करना होगा कि उन तीनों में से पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा.’
 ‘बिलकुल नहीं. किसी और को अगर आगे लाया गया तो पार्टी उसे स्वीकार नहीं करेगी. राहुल गांधी पहले विकल्प हैं और प्रियंका गांधी आखिरी’
एक तरफ जहां प्रियंका को जिम्मेदारी देने की बात की जा रही है वहीं यह तथ्य भी रेखांकित करना जरूरी है कि जिन प्रियंका से पार्टी के दुर्दिनों को दूर करने की उम्मीद की जा रही है उन्हीं प्रियंका के रायबरेली और अमेठी की सीटों पर किए गए आक्रामक चुनाव प्रचार के बावजूद दोनों सीटों पर 2009 के मुकाबले कांग्रेस की जीत का अंतर इस बार काफी घटा है. अमेठी में तो राहुल की जीत का अंतर पिछली बार के तीन लाख वोटों के आंकड़े से गिरकर एक लाख पर आ गया. जानकार मानते हैं कि यह सही है कि प्रियंका राहुल की तुलना में न सिर्फ एक अच्छी वक्ता हैं बल्कि लोगों से जुड़ते हुए भी दिखाई देती हैं, लेकिन वे कितनी अच्छी नेता हैं इसकी परीक्षा होना अभी बाकी है.
लेकिन क्या पार्टी का नेतृत्व गांधी परिवार के बाहर किसी और के संभालने की संभावना है ? नीरजा कहती हैं, ‘बिलकुल नहीं. किसी और को अगर आगे लाया गया तो पार्टी उसे स्वीकार नहीं करेगी. राहुल पहले विकल्प हैं और प्रियंका आखिरी.’
कांग्रेस के लिए चुनौती इसलिए भी और गंभीर हो जाती है कि देश में चुनावों की शैली कुछ वैसी ही होती जा रही है जैसी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की होती है. यानी राष्ट्रीय स्तर पर आपको एक ऐसा नेता चाहिए जो आम जनता से जुड़ सके. अपनी बात लोगों तक पहुंचा सके. पूरी पार्टी का प्रतिनिधित्व कर सके. बोस कहते हैं, ‘पार्टी बहुत लंबे समय तक अनिश्चितता की स्थिति में नहीं रह सकती है. उसे चुनना होगा. राहुल या प्रियंका.’ वे एक और बात की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, ‘अगर पार्टी ने इन दोनों में से किसी को चुन भी लिया तब भी उसकी समस्या खत्म नहीं होगी क्योंकि चाहे राहुल हों या प्रियंका, दोनों ही फुल टाइम राजनेता नहीं हंै. उन्हें थोड़ा राजनीति करनी है, फिर विदेश भी घूमना है. परिवार को भी देखना है. और भी कई शौक हैं. ऐसे में वे कैसे मोदी जैसे राजनेता का मुकाबला कर पाएंगे जो 24 घंटे राजनीति में ही डूबा रहता है. इन दोनों को यह भी फैसला करना होगा कि क्या वे पूरी तरह से खुद को राजनीति में झोंकने के लिए तैयार हैं या नहीं.
कांग्रेस के सामने नेतृत्व के सवाल के साथ ही उसके संगठन के ढांचे के कमजोर होने का सवाल भी मुंह बाए खड़ा है. लोकसभा चुनाव में भयानक हार के बाद से ही पार्टी की सेहत सुधारने को लेकर पार्टी के अंदर से लेकर बाहर तक तमाम सुझाव सामने आने लगे हैं. पार्टी में सुधार के लिए जरूरी कदमों की मीडिया से चर्चा करते हुए मणिशंकर अय्यर कहते हैं, ‘पार्टी में सुधार के लिए हमें विशेष रूप से दो दस्तावेजों पर ध्यान देना सबसे जरूरी है. पहला- 1990 में पार्टी को लोकतांत्रिक बनाने के लिए उमाशंकर दीक्षित द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट जिसे उस साल पार्टी ने स्वीकार किया था. वह रिपोर्ट आज तक लागू नहीं हुई. उस रिपोर्ट को लागू करने की जरूरत है. दूसरा- 1999 में तैयार हुई आत्मनिरीक्षण संबंधी रिपोर्ट जिसे 2000 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) ने स्वीकार किया था. उसे भी आज तक लागू नहीं किया गया. उसके सुझावों को पार्टी में लागू करने की आवश्यकता है.’ सीडब्ल्यूसी में विशेष आमंत्रित सदस्य अनिल शास्त्री ने भी हाल ही में कहा कि पार्टी को ‘गंभीर आत्ममंथन की जरूरत है लेकिन निश्चित तौर पर पहले की तरह नहीं जिसमें आत्ममंथन से निकले सुझावों को कभी लागू नहीं किया गया.’
फोटोः विकास कुमार
कांग्रेस संगठन में सुधार के लिए तमाम नेता सबसे पहले सीडब्ल्यूसी में सुधार की जरूरत पर बल देते हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद कमलनाथ ने भी हाल ही में सीडब्ल्यूसी में बड़ा परिवर्तन करने की वकालत की. सीडब्ल्यूसी पार्टी की सबसे शक्तिशाली इकाई है जहां से सारे बड़े निर्णय लिए जाते हैं. लेकिन उसके सदस्यों का एक तरफ सालों से चुनाव नहीं हुआ तो दूसरी तरफ वह पार्टी के राज्य सभा में नामित सदस्यों से भरी पड़ी है.
कमलनाथ के अनुसार कांग्रेस की स्थिति सुधारने के लिए सबसे पहले जरूरत है कि वर्किंग कमिटी का चुनाव किया जाए. वे कहते हैं, ‘पहले एक निर्वाचित वर्किंग कमिटी बनाई जानी चाहिए. लेकिन पार्टी में कई ऐसे नेता हंै जो इसका विरोध करते हैं. चुनाव होने लगे तो फिर ऐसे लोगों को संरक्षण मिलना बंद हो जाएगा. देश की राजनीति पिछले पांच सालों में काफी बदल चुकी है. कांग्रेस को भी बदली परिस्थिति में खुद को बदलना होगा. हमें पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है.’
पार्टी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि संरक्षण की बीमारी ने ऊपर से लेकर नीचे तक पार्टी को जकड़ रखा है. अभी स्थिति यह है कि आप काबिल हों या न हों, मेहनती हों या नहीं, लेकिन अगर आपको चापलूसी आती है तो फिर आपको पार्टी में आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. शायद चापलूसी की उसी संस्कृति का उदाहरण था जब तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने सोनिया गांधी को पूरे देश की मां करार दे दिया. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘आप वर्किंग कमिटी को देख लीजिए उसमें से कितने लोग चुनाव जीते हैं या जीतने का दम रखते हैं. 22 में से 10 सदस्य नॉमिनेटेड हैं. मोहन प्रकाश जैसे लोग जिनके पास चार से अधिक राज्यों का प्रभार रहा है वे देश की किसी भी सीट से चुनाव नहीं जीत सकते. राज्य के मुख्यमंत्री इसके मेंबर नहीं हंै. कमलनाथ नौ बार लोकसभा जीते हैं, लेकिन वे इसके सदस्य नहीं हैं. यह तमाशा नहीं तो और क्या है.’
हालांकि पार्टी में ही कमलनाथ से इत्तफाक न रखने वाले लोग भी हैं कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सदस्य और वरिष्ठ नेता वीरेंद्र सिंह कहते हैं, ‘यह सुनने में जरूर अच्छा लग सकता है लेकिन क्या संरक्षण देने का काम कमलनाथ नहीं करते हैं? मैं जब मध्य प्रदेश का प्रभारी था तो उन्होंने खुद मुझसे लोगों को टिकट देने कि सिफारिश की थी. राजनीति में बिना संरक्षण के काम हो ही नहीं सकता. दिक्कत संरक्षण में नहीं है, दिक्कत इस बात से है कि जिसे आप संरक्षण देकर टिकट दिलवाते हो उसकी हार की जिम्मेदारी भी आपको लेनी होगी. हां, आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने की बात सही है. सही को सही और गलत को गलत कहने का अधिकार कार्यकर्ताओं को मिलना चाहिए.’ वीरेंद्र आगे कहते हैं, ‘पार्टी में ऊपर से नीचे तक सर्जरी की जरूरत है. इस चुनाव में हमारा कार्यकर्ता निरुत्साहित था. पार्टी से आम जनता का जुड़ाव न के बराबर हो गया है. यह तो 130 साल पुरानी पार्टी है इसलिए बच गई वरना तो कब की खत्म हो गई होती.’
जिस कार्यकर्ता के निरुत्साहित होने की बात वीरेंद्र कह रहे हैं उस कार्यकर्ता की स्थिति यह हो गई थी कि वह अपनी सरकार के खिलाफ गुस्से से भरा बैठा था. शशिभूषण कहते हैं, ‘ हमारी अपनी सरकार में ही कार्यकर्ताओं की कोई सुनवाई नहीं थी. मंत्री लोग हम लोगों को नौकर की तरह ट्रीट करते थे. जब कार्यकर्ता ही सरकार से प्रसन्न नहीं था तो वह आम लोगों से आपकी तारीफ क्या करेगा?’
एक तरफ जहां पार्टी केंद्रीय संगठन को दुरुस्त करने पर चर्चा कर रही है वहीं पार्टी के भीतर से ही इस बात को लेकर आवाज उठनी शुरु हो गई है कि कैसे पार्टी ने अपने कर्मों से सभी राज्यों में अपने संगठन को मरणासन्न अवस्था में पहुंचा दिया है. कांग्रेस पर हमेशा यह आरोप लगता रहा है कि वह पिछले कई दशकों से राज्य में मजबूत नेतृत्व उभरने से रोकती आई है. इस सोच के साथ कि भविष्य में राज्यों में मजबूती से उभरता कोई नेता उसे चुनौती न दे सके. इंदिरा गांधी के बारे में यह बात मशहूर थी कि वे जब कोई पौधा लगाती हैं तो कुछ समय बाद उसे उखाड़कर देखती हैं कि कहीं पौधे की जड़ें बड़ी तो नहीं हो गईं.
इंदिरा गांधी के बारे में यह बात मशहूर थी कि वे जब कोई पौधा लगाती हैं तो कुछ समय बाद उसे उखाड़कर देखती हैं कि कहीं पौधे की जड़ें बड़ी तो नहीं हो गईं
राज्य संगठन के साथ कांग्रेस का क्या बर्ताव है, इसका एक उदाहरण 2012 में देखने को मिला. मौका हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों का था. चुनाव के दो महीने पहले तक कांग्रेस यह तय नहीं कर पा रही थी कि वह प्रदेश में किसके नेतृत्व में चुनाव लड़े. ऐसा नहीं था कि उसके पास कोई नेता नहीं था. प्रदेश कांग्रेस के नेताओं में सबसे वरिष्ठ और अनुभवी (पांच बार मुख्यमंत्री ) वीरभद्र सिंह उसके पास थे जिनके बारे में किसी को शक नहीं था कि पूरे हिमाचल में सर्वाधिक लोकप्रिय कांग्रेसी नेता वही हैं. लेकिन जड़ नापकर नेता को नापने की अपनी मानसिकता के तहत पार्टी वीरभद्र के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से बचती रही. आखिर में जब वीरभद्र ने पार्टी छोड़ने की तैयारी कर ली और अगले दिन वे एनसीपी में जाने वाले थे कि सोनिया ने उन्हें पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनकर शिमला जाने को कहा. खैर, वीरभद्र मान गए. चुनाव में पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई.
हर राज्य में कांग्रेस की यही कहानी है. पार्टी ने हर जगह से मजबूत और लोकप्रिय नेताओं का एक तरफ सफाया किया तो दूसरी तरफ चापलूसों को लगातार बढ़ाती रही. जानकार उत्तराखंड का उदाहरण भी देते हैं कि कैसे प्रदेश मेंे पिछले विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद विधायकों की पसंद और स्थानीय स्तर पर लोकप्रिय नेता हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाने की जगह पार्टी ने विजय बहुगुणा के हाथ कमान सौंप दी.
कांग्रेस के अंदर से ही नेतृत्व की इस रणनीति के खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं. हाल ही में पार्टी के वरिष्ठ नेता कमलनाथ ने कहा कि दिल्ली से बैठकर 10 लोग पूरे देश में पार्टी को संचालित नहीं कर सकते. हमें प्रदेश की राजनीति को राज्यों के ऊपर छोड़ना होगा. दिल्ली से बैठकर उसे नियंत्रित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.
रशीद किदवई आंध्र प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘2004 और 2009 में कांग्रेस को यहां 30 से ज्यादा सीटें मिली थीं. लेकिन राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद वह ऐसे फिसली कि फिर संभल नहीं पाई. कांग्रेस के पास अन्य राज्यों में भी ताकतवर नेताओं का अभाव है. ज्यादातर राज्यों में उसके पास बड़े कद का कोई नेता नहीं बचा है.’
फोटो: विकास कुमार
पार्टी का भविष्य क्या रूप लेता है यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन जानकारों का एक तबका इस बात को मानता है कि जब तक पार्टी इस सोच के सहारे चलेगी कि चाहे जो हो जाए गांधी परिवार के किसी व्यक्ति से कोई प्रश्न नहीं पूछा जा सकता, वह हर तरह के मूल्यांकन के बाहर है और परिवार कभी गलत हो ही नहीं सकता तब तक पार्टी की स्थिति पूरी तरह से सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं.
उधर, पार्टी नेताओं के साथ ही राजनीतिक पंडितों के एक बड़े तबके का मानना है कि अभी कांग्रेस का मर्सिया नहीं लिखा जा सकता. बोस कहते हैं, ‘आपातकाल के बाद भी ऐसे ही हुआ था. 77 में इंदिरा गांधी की हार के बाद के बाद लोग कहने लगे थे कि अब तो कांग्रेस खत्म हो गई. कोई उस समय कांग्रेस की वापसी के बारे में सोच नहीं सकता था. लेकिन 80 में इंदिरा ने फिर से जोरदार वापसी की.’
जितनी जरूरत संगठन को मजबूत करने की है उतनी ही इस बात की भी कि गांधी परिवार खुद अपने राजनीतिक तौर-तरीकों में तब्दीली लाए
खैर, कांग्रेस को एक तरफ जहां नेतृत्व से लेकर संगठन के तमाम मसलों पर काम करने की जरूरत है वहीं उसे सहयोगियों को लेकर भी चिंतित होने की आवश्यकता है. चुनाव में पार्टी उस महामारी की तरह फैल गई थी जिसके संपर्क में जो दल आया उसका सफाया हो गया. मायावती ने अपनी पार्टी की बुरी गत के लिए भी कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया. मायावती का कहना था कि लोगों ने उन्हें यूपीए को समर्थन करने की सजा दी है. ऐसे में पार्टी को उस छवि को भी तोड़ना होगा जिससे यह संदेश जा रहा है कि कांग्रेस से जो जुड़ता दिखेगा उसका हश्र भी कांग्रेस जैसा ही होगा. पार्टी और परिवार के शुभचिंतक इस बात की तरफ भी इशारा करते हैं कि जितनी जरूरत नेतृत्व के प्रश्न को हल करने और संगठन को मजबूत करने की है उतनी ही इस बात की भी है कि गांधी परिवार खुद अपने राजनीतिक तौर तरीकों में तब्दीली लाए. पिछली सरकार में मंत्री रह चुके एक नेता कहते हैं, ‘परिवार को पार्टी को गुलाम समझने और और उसे रिमोट से संचालित करने की मानसिकता से बाहर आना होगा. इस चुनाव में जनता ने हमारे खिलाफ इसलिए भी वोट किया क्योंकि उसने देखा कि कैसे प्रधानमंत्री एक परिवार के आगे दीन-हीन बना हुआ था और पार्टी नेतृत्व राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के माध्यम से सरकार की नकेल कसता रहता था.’
पार्टी के ही एक अन्य नेता कहते हैं, ‘पिछले 10 सालों में ऐसा संदेश गया मानो प्रधानमंत्री कांग्रेस परिवार की नौकरी कर रहा हो. इससे जनता के बीच गलत मैसेज गया. गांधी परिवार उसे अंग्रेजों की तरह दिखाई देने लगा. प्रधानमंत्री के उस बयान ने भी कोढ़ में खाज का काम किया जिसमें उन्होंने कहा था ‘मैं राहुल जी के नेतृत्व में काम करने को तैयार हूं.’

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

जैसे-जैसे चुनावों का समय आता है नेता अपने चुनावी फायदे के लिए घृणित एवं उन्मादी भाषणों का सहारा लेने लगते हैं। वे आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने से नहीं चूकते। इससे नेताओं का तो कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन समाज की समरसता, सौहार्द एवं शांति भंग होती है। हाल के ही मामलों को देखें तो चुनाव आयोग ने समाज में कटुता फैलाने एवं उन्मादी भाषणों पर भाजपा नेता अमित शाह और समाजवादी नेता आजम खान की रैलियों पर रोक लगा दी। यानी ये दोनों नेता उत्तर प्रदेश में लोकसभा के बाकी बचे चरणों में रैली, भाषण, जुलूस आदि में हिस्सा नहीं ले सकेंगे। 

गौर करने वाली बात है कि ये दोनों नेता अपने पार्टी सुप्रीमो के काफी करीबी हैं। अमित शाह भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के और आजम खान सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के करीबी हैं। अमित शाह पार्टी संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने में माहिर माने जाते हैं तो आजम खान सपा में मुस्लिमों का बड़ा चेहरा हैं। आजम खान की सपा में कितनी अहमियत है, यह इसी से साबित होती है कि मुलायम सिंह यादव अपने भाषण से पहले आजम खान को मंच की कमान सौंपते हैं। सवाल है कि इन दोनों नेताओं पर बैन लगने से क्या भाजपा और सपा को यूपी में अपनी चुनावी रणनीति को झटका लगा है। 

गुजरात दंगों के समय अमित शाह वहां के गृह राज्य मंत्री थे। दंगों को लेकर उनके ऊपर गंभीर आरोप लग चुके हैं। उन्हें लोकसभा चुनावों के लिए उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है। भाजपा ने शाह को यूपी में चुनाव प्रचार और पोल मैनेंजमेट की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। चर्चा थी कि शाह उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों के लिए जनसभाओं को संबोधित करने वाले थे लेकिन पहले चरण के मतदान से पहले शाह ने शामली और बिजनौर में जो `बदला` लेने वाला भाषण दिया, उस पर चुनाव आयोग त्योरियां चढ़ गईं और उसने शाह की रैलियों पर बैन लगा दिया। अमित शाह आने वाले दिनों में बरेली, मुरादाबाद, रामपुर, फिरोजाबाद, कानपुर, इलाहाबाद, फैजाबाद, बहराइच, कैसरगंज और आजमगढ़ में जनसभाएं और रोड-शो करने वाले थे। यही नहीं, वाराणसी में उन्हें चुनाव प्रचार को धार देना था लेकिन चुनाव आयोग की कड़ाई के आगे उनका पूरा कार्यक्रम धूल-धूसरित हो गया। 


आजम खान की अगर बात करें तो आजम ने पिछले दिनों गाजियाबाद में एक जनसभा के दौरान कहा कि कारगिल में जीत हिंदू सैनिकों ने नहीं बल्कि मुस्लिम सैनिकों ने सुनिश्चित की। आजम के इस बयान को समुदायों के बीच कटुता फैलाने वाला माना गया और चुनाव आयोग ने आजम खान पर आगामी चुनावी सभाओं को संबोधित करने से रोक लगा दी। आजम खान पर आईपीसी के तहत कई धाराओं में मुकदमा भी दर्ज किया गया है। 

पहले चरण के मतदान से पहले इन दोनों नेताओं ने जो बयान दिया, वह अभी केवल एक शुरुआत थी। चुनाव आयोग ने सही समय पर कदम उठाया नहीं तो आने वाले दिनों में अमित शाह और आजम खान दोनों अपने-अपने वोटों के ध्रुवीकरण के लिए आपत्तिजनक, उकसावे और उन्मादी बयानों का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते। स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं भय रहित चुनाव संपन्न कराने का पूरा दारोमदार चुनाव आयोग पर होता है। लेकिन कई बार ऐेसा भी देखने में आता है कि नेता आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करते हैं लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती। उन्हें नोटिस जारी कर महज कागजी खाना-पूर्ति की जाती है। 

चुनाव आयोग को बिना भेद-भाव किए आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले नेताओं पर कार्रवाई करनी चाहिए। हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कुछ अधिकारियों का तबादला करने से इंकार कर दिया था लेकिन जैसे ही चुनाव आयोग सख्त हुआ ममता को झुकना पड़ा। चुनाव आयोग को कुछ इसी तरह की कार्रवाई आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले सभी मामलों में करनी चाहिए। कार्रवाई का भय होगा तभी नेता आपत्तिजनक, भड़काऊ और उन्मादी बयान देने से परहेज करेंगे।

गुरुवार, 6 मार्च 2014

अजय माकन जबसे मीडिया प्रभारी बने हैं तब से उनका ज्यादा समय अपनी ही पार्टी के नेताओं के बयान से से पार्टी का पीछा छुड़ाने में लग रहा है. कभी आफ रिकार्ड तो कभी आन रिकार्ड. एक बयान पर सफाई दे राहत की सांस लेते हैं तब तक दूसरा बयान विवाद खड़ा कर चुका होता है. बयानबाजी का आलम ये है कि राहुल गांधी को चेतावनी देनी पड़ी कि नेता एक सुर में बोलें औऱ पार्टी लाईन पर बोले. लेकिन उसका भी असर इन बयान बहादुर नेताओं पर पड़ते दिख नही रहा. उदाहरण है भूख औऱ गरीबी पर चल रही ताजा बयानबाजी.


राशिद मसूद कहते हैं कि दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में 5 रूपये में एक वक्त का खाना मिलता है. तो राज बब्बर साहब का बयान आता है कि मुंबई में 12 रूपये में खाना मिलता है. ये दोनों ही बयान न सिर्फ गरीबी औऱ भूख का मजाक उड़ाते दिखते हैं बल्कि मज़ाक से आगे बढ़ क्रूरता की हद भी पार कर जाते हैं. लेकिन कांग्रेस को इस बयान से होने वाला नफा नुकसान 24 घंटे बाद समझ में आया औऱ तभी उसकी संवेदनशीलता भी जागी.
एक बार फिर अजय माकन सफाई देते नज़र आये. कांग्रेस ने अपने दो नेताओं रशीद मसूद औऱ राज बब्बर के बयान से किनारा कर लिया. कहा कि ये उनके निजी विचार हैं. तो थोड़ी ही देर में राज बब्बर का माफीनामा आ गया. कहा कि नही चाहता कि मेरे बयान की वजह से पार्टी को कोई नुकसान हो और साथ ही अपने बयान पर खेद जताया. उन लोगों से माफी मांगी जिन्हें उनके इस बयान से ठेस पहुंचा हो.
लेकिन कांग्रेस औऱ राज बब्बर दोनों को ये समझना पड़ेगा कि बयान पर माफी मांग लेने या किनारा कर लेने से ये बात खत्म नही होती. क्योंकि जहां देश की एक बड़ी आबादी गरीबी औऱ भूख से हर रोज जूझती है वहां इस तरह की बयानबाजी? ये बयान साफ करते हैं कि ये नेता कितने जमीन पर है. जनता की दुख दर्द के कितने करीब हैं. ये जानते हुए भी कि पांच रूपये में दिल्ली में कहीं एक वक्त का खाना नही मिलेगा फिर भी हमने जामा मस्जिद इलाके में जानने की कोशिश की कि पांच रूपये में क्या वाकई खाना मिलता है.
एक दिलचस्प जवाब मिला कि पांच रूपये में खाना तो नही लेकिन पेट भर कर दुआ मिलेगी. मसूद साहब जामा मस्जिद इलाके में पांच रूपये में खाना मिलता होगा लेकिन वो तब जब आप जनता से रूबरू रहे होंगे, उसके बीच रहे होंगे. याद कीजिए आखिरी बार आप कब गए थे इस इलाके में खाना खाने, तो फिर शायद आपको अपने बयान की सच्चाई खुद समझ में आ जाएगी. आपकी पार्टी के आफिस में भी पांच रूपये में खाना नही मिलता, कभी वहीं तशरीफ ले जाते चीजों की कीमत पता चल जाती. एकबारगी यकीन नही होता कि ये नेता जमीनी हकीकत से इतने दूर हैं.
दरअसल इस पूरी बयानबाजी की शुरूआत हुई योजना आयोग के उस आंकड़े से जिसमें ये दावा किया गया कि देश में गरीबी कम हो गयी है. इसके मुताबिक देश में गरीबों का अनुपात 2004-5 के 37.2 फीसदी से गिरकर 2011-12 में 21.9 फीसदी हो गया हैं. गरीबी की सीमा रेखा शहरी इलाके के लिए प्रति व्यक्ति 1000 रूपये की आमदनी औऱ ग्रामीण इलाके के लिए 816 रूपये मानी गयी.
ये मानक तेंदुलकर कमेटी की पद्धति के आधार पर तय हैं जो पिछले साल काफी विवादों में रहा. क्यूंकि इसमें एक व्यक्ति के लिए ग्रामीण इलाके में 27.20 और शहरी इलाके में 33.33 रूपये प्रतिदिन की आमदनी को आधार माना गया. जिसके बाद नई पद्धति तय करने के लिए डाक्टर सी रंगराजन की अध्यक्षता में एक्सपर्ट कमेटी बनायी गयी जो अगले साल अपनी रिपोर्ट देगी. लेकिन जबतक नई पद्धति के तहत नए मानक तय नही हो जाते तब तक योजना आयोग ने पुराने मानक के आधार पर ही ये आंकड़े जारी किए.
जाहिर है जहां कांग्रेस का हाथ गरीब के साथ का नारा देने वाली पार्टी इसका श्रेय लेने में जुटी तो वहीं विपक्ष इसे चुनाव के मद्देनज़र यूपीए का परफार्मेंस सुधराने की साजिश करार देने में. योजना आयोग के इन आंकड़ों को सही ठहरा इसे यूपीए सरकार की सफलता का ताज बनाने की होड़ में कांग्रेस के नेता बयानबाजी करते चले गए. अपनी ही पार्टी औऱ सरकार की बार बार दोहराई इस सच्चाई को भी सीधे नज़रअंदाज कर दिया कि महंगाई एक चिंता का विषय है.
इस साल के अंत तक में होने वाले विधानसभा चुनाव औऱ फिर अगले साल लोकसभा चुनाव की चिंता यूपीए सरकार के सर चढ़कर बोल रही है. देश के आर्थिक हालात, गिरता रूपया, बढ़ती कीमतें औऱ घटती नौकरी ने मध्यम वर्ग को पहले ही  यूपीए के प्रति सशंकित कर दिया है. सरकार के हालिया आर्थिक फैसलों को जिसे दूर करने की कोशिश के तौर पर पर देखा जा सकता है.
इसके साथ ही कांग्रेस औऱ यूपीए सरकार को लगता है कि गरीबी कम करने का तमगा लेकर शायद वो आर्थिक मोर्चे पर इंक्लूसिव ग्रोथ वाला अपना चेहरा सामने करे तो फायदे में रहेगी. फूड सिक्योरिटी आर्डिनेंस हो या एफडीआई का फैसला कांग्रेस ने प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी ही पीठ जमकर थपथपायी, पार्टी के बड़े नेता औऱ मंत्री इसपर बहस में उतरे. मकसद ये कि यूपीए के कार्यक्रमों औऱ योजनाओं का प्रचार प्रसार हो लेकिन दिक्कत ये है कि चर्चा औऱ विवाद का केन्द्र बन रहे हैं उसके अपने ही नेताओं के इस तरह के बेतुके बयान.

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

आवंटन के बाद लूट का खेल


मोटा माल तो चंदन बसु ने भी बनाया

कोयला मंत्रालय के दस्तावेजों में 58 कोयला ब्लाक कटघरे में हैं। इनमें 35 कोयला ब्लाक पायी निजी कंपनिया ऐसी हैं, जो या तो राजनीतिक नेताओं से जुड़ी हैं या फिर मंत्री, सांसदों या सीएम के कहने पर आंवटित की गई हैं। किसी की सिफारिश मोतीलाल वोहरा ने की। तो किसी की सिफारिश शिवराज सिंह चौहान ने । किसी की सिफारिश नवीन पटनायक ने की तो किसी की सुबोधकांत सहाय ने। लेकिन यह सच आवंटन के भारी भरकम कैग रिपोर्ट के पीछे दबा ही रह गया कि कोयले का असल खेल तो पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार के नाक तले ना सिर्फ शुरु हुआ बल्कि चंदन बसु ने अपने पिता ज्योति बसु की लीगेसी तले इस खेल में पहले सिर्फ हाथ डाला और आज की तारीख में गले तक मुनाफा बना कर पर्दे के पीछे हर राज्य सरकार के साथ मिलकर खेल खेल रही है।

यह खेल शुरु कैसे होता है इसलिये लिये दो दशक पीछे लौटना होगा। पीवी नरसिंह राव के दौर में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने ही 1992 में सबसे पहले कोल इंडिया को केन्द्र से मदद देने से मना किया और बकायदा पत्र लिखा गया कि कोल इंडिया अब अपना घाटा-मुनाफा खुद देखे। उसके तुरंत बाद 1993 में कोल इंडिया के कानूनों में बदलाव कर उन निजी कंपनियों को खादान देने पर सहमति बनायी गई जो कोल इंडिया से कोयला लेकर अपना काम चलाते लेकिन उन्हे कोल इंडिया की बाबूगिरी में परेशानी होती। 1993 में ही ईस्टर्न माइनिंग एंड ट्रेडिंग एंजेसी यानी इमटा नाम से बंगाल में एक कंपनी बनी। और 1993 में ही इमटा की पहल पर पहला कोयला खादान आरपीजी इंडस्ट्रीज को मिला। इमटा ने आरपीजी इंडस्ट्री को मिली खादान को आपरेशनल बनाने और डेवलप करने का जिम्मा लिया । और इसके बाद इमटा ही बंगाल के खादानों को अलग अलग निजी कंपनियों से लेकर पावर और माइनिंग की सरकारी कंपनियो दिलाने भी लगी और खादान का सारा काम करने भी लगी। उस दौर में हर बरस एक या दो ही खादान किसी कंपनी को मिलती और संयोग से हर बरस बंगाल का नंबर जरुर होता। 1995 में बंगाल राज्य बिजली बोर्ड तो 1996 में बंगाल के ही पावर डेवलपमेंट कारपोरेशन को खादान आवंटित हुई। और इस कतार में 2009 तक पश्चिम बंगाल में 27 कोयला खादान आंवटित की गई। हैरत इस बात को लेकर नहीं होगी की रश्मि सीमेंट से लेकर आधुनिक कारपोरेशन और विकास मेटल पावर से लेकर राजेश्वर लौह उघोग तक को कोयला खादान मिल गया। जिनका कोई अनुभव कोयला खादान या पावर या स्टील उघोग में खादान मिलने से पहले था ही नहीं। हैरत तो इस बात को लेकर है कि हर खादान का काम इमटा कर रहा है। हर परियोजना में इमटा साझीदार है। और इमटा नाम ही सिफारिश का सबसे महत्वपूर्ण वाला नाम बन गया। क्योंकि माना यही गया कि इसके पीछे और किसी का नहीं बल्कि ज्योति बसु के पुत्र चंदन बसु का नाम है और सामने रहने वाला नाम यूके उपाध्याय का है, जो इमटा के मैनेजंग डायरेक्टर है। वह इमटा बनाने से पहले कोल इंडिया के खादानों में बालू का ठेका लिया करते थे।

कोल इंडिया के दस्तावेज बताते हैं कि उज्ज्वल उपाध्याय यानी यूके उपाध्याय को सालाना 10 लाख तक का ठेका झरिया से लेकर आसनसोल तक के खादानो में बालू भरने का मिलता। लेकिन चंदन बसु के साथ मिलकर ईस्ट्रन माइनिंग एंड ट्रेडिंग एजेंसी यानी इमटा बनाने के बाद यू के उपाध्याय की उडान बंगाल से भी आगे जा पहुंची। चूंकि चंदन बसु का नाम ही काफी था तो कोलकत्ता से लेकर दिल्ली तक यह बताना जरुरी नहीं था कि इमटा का डायरेक्टर कौन है या इसके बोर्ड में कौन कौन हैं। और आज भी स्थिति बदली नहीं है। इंटरनेट पर कंपनी प्रोफाइल में हर राजय के साथ इमटा के धंधे का जिक्र है लेकिन एक्जक्यूटिव डाटा, बोर्ट के सदस्यो का नाम या फिर कमेटी के सदस्यों में किसी का नाम अभी भी नहीं लिखा गया है। जबकि कोयला खादानों के जरीये इमटा ने अपना धंधा बंगाल से बाहर भी फैला दिया।
सबसे पहले बंगाल इमटा कोल माइन्स बना तो उसके बाद झारखंड के लिये तेनूधाट इमटा । पंजाब के लिये पंजाब इमटा कोल माइन्स। कर्नाटक और महाराष्ट्र के लिये कर्नाटक इमटा कोल माइन्स। कर्नाटक में बेल्लारी खादानो में भी इमटा ने पनी पकड़ बनायी और बेल्लारी थर्मल पावर स्टेशन प्रोजेक्ट में ज्वाइंट वेन्चर के जरीये कर्नाटक इमटा कोल माइन्स कंपनी जुड़ी। इसी तरह झारखंड के पाकुड में पंजाब राज्य बिजली बिजली बोर्ड के नाम पर खादान लेकर पंजाब इमटा कोल माइन्स के तहत काम शुरु किया। मुनाफे में बराबर के साझीदार की भूमिका है। लेकिन इस कड़ी में पहली बार इमटा को 10 जुलाई 2009 को बंगाल के गौरांगडीह में हिमाचल इमटा पावर लि.के नाम से कोयला खादान आवंटित हुआ। यानी इससे पहले जो इमटा अपने नाम का इस्तेमाल कर करीब 30 से ज्यादा कोयला खादानों को आवंटित कराने से लेकर उसके मुनाफे में हिस्सदार रही। वहीं सीधे कोयला खादान लेकर अपने तरीके से काम शुरु करने ने इमटा के प्रोफाइल को भी बदल दिया। अब इमटा सिर्फ खादानों को आपरेशनल बनाने या डेवपल करने तक सीमित नहीं है बल्कि देश के अलग अलग हिस्सों में एक्सक्लूसिवली कोयला सप्लाई भी करता है। और यह कोयला बेल्लारी से लेकर हिमाचल के पावर प्रोजेक्ट तक जा रहा है। झारखंड और बंगाल में खादानों को लेकर इमटा की सामानांतर सरकार कैसे चलती है यह दामोदर वैली कारपोरेशन [डीवीसी] के सामानांतर डीवीसी इमटा कोल माइन्स के कामकाज के तरीके से समझा जा सकता है।

पहले तो थोड़ा बहुत था लेकिन डीवीसी की 11 वीं और 12 वीं योजना में तो सारा काम ही डीवीसी इमटा के हाथ में है। यानी कंपनी का विस्तार कैसे होता है अगर इंटरनेट पर देखे तो लग सकता है कि इमटा सरीखी हुनरमंद कंपनी को जरीये देश के 17 पावर प्लांट, 9 स्पांज आयरन उघोग और 27 कोयला खादानों को आपरेशनल बनाने मे इमटा का जवाब नहीं। लेकिन जब इंटरनेट से इतर तमाम योजनाओं की जमीन को देखेंगे तो कोयला खादान के आवंटन का खेल समझ में आयेगा जो कैसे चंदन बसु या कहे इमटा के नाम भर से होता है। असल में कोयला आवंटन करने वाली स्क्रीनिंग टीम के नाम भी लाभ पाने और लाभ पहुंचाने वाले ही है। मसलन एक वक्त कोल इंडिया के चेयरमैन रहे यू कुमार । रिटायरमेंट के बाद कोल इंडिया के प्रतिनिधी के तौर पर स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य भी रहे और इसी दौर में आदित्य बिरला उघोग में सलाहकार के तौर पर काम भी करते रहे। लेकिन कोयला खादान के खेल को नया आयाम रिलांयस ने दिया । सिंगरौली के साशन में सरकारी बिड के जरीये 4000 मेगावाट थर्मल पावर प्लाट का लाइसेंस मिला। फिर इसके लिये 12 मिलियन टन की कोयला खादान मिली । जहां से 40 बरस तक कोयला निकाला जा सकता है। लेकिन रिलायंस ने इसके सामांनातर चितरंजी में भी 4000 मेगावाट का निजी पावर प्लांट लगाने का ऐलान कर कहा कि वह बिजली खुले बाजार में बेचेगा। मगर कोयला साशन की उसी खादान से निकालेगा। यानी सरकारी पावर प्लांट के लिये मिले सरकारी खादान का कोयला निजी पावर प्लाट के उपयोग में लायेगा। यानी सरकारी बिड में महज एक रुपये 19 पैसे प्रति यूनिट बिजली दिखायी। और खुले बाजार में नौ रुपये तक प्रति यूनिट बेचने की तैयारी। इस पर टाटा ने आपत्ति की। यह मामला अदालत में भी गया। जिसके बाद चितरंजी के पावर प्लांट पर तो रोक लग गई है । लेकिन इस तरीके ने इन निजी पावर प्लांट को लेकर नये सवाल खड़े कर दिये कि आखिर बीते आढ बरस में कोई सरकारी पावर प्लांट बनकर तैयार हुआ क्यों नहीं जिनका लाइसेंस और ठेका निजी कंपनियों को दिया गया। जबकि निजी पावर प्लांट का काम कहीं तेजी से हो रहा है और कोयला खादानों से कोयला भी निजी पावर प्लांट के लिये निकाला जा रहा है। यानी सरकार का यह तर्क कितना खोखला है कि खादानों से जब कोयला निकाला ही नहीं गया तो घाटा और मुनाफे का सवाल ही कहां से आता है।
असल में झारखंड के 22 खादान, उडीसा के 9 खादान, मध्यप्रदेश के 11 और बंगाल के 9 कोयला खादानो में से बाकायदा कोयला निकाला जा रहा है। और सिगरैली के साशन में रिलायंस की खादान मोहरे एंड अमलोरी एक्सटेंसन ओपन कास्ट में भी 1 सिंतबर 2012 से कोयला निकलना शुरु हो गया। यानी कोयला खादान घोटाले ने अब झारखंड,छत्तीसगढ,मध्यप्रदेश और उडीसा,बंगाल में काम तो शुरु करवाया है। लेकिन खास बात यह भी है कि करीब 60 से ज्यादा कोयला खादानें ऐसी भी हैं, जिनका एंड यूज होगा क्या यह किसी को नहीं पता। इसलिये यह एक सवाल ही है कि दिल्ली में जो कई मंत्रालयों से मिलकर बनी कमेटी जांच कर रही है वह महज खाना-पूर्ती कर कुछ पर तलवार लटकायेगी या फिर खादानो के खेल का सच सामने लायेगी।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

सबसे खतरनाक है सियासी सपनों का सौदा

देश में सपनों की कमी नहीं और 2014 के लोकसभा चुनाव को लेकर हर राजनेता सपने बेचने को तैयार है। यहां तक की प्रधानमंत्री की रेस में शामिल कद्दावर राजनेता भी सपनों को बेचने निकले हैं और अपने सपनों को मरने देना नहीं चाहते। नरेन्द्र मोदी का सपना है बंगाल में केसरिया लहराये। मोदी को लगने लगा है कि 2014 में 272 के आंकड़े को छूना है तो फिर बंगाल में इतिहास रचना होगा। 42 सीटों वाले बंगाल में सिर्फ बीजेपी के पास एक सीट है। 2009 में जसंवत सिह गोरखालैंड वाली जमीन से जीते थे। विधानसभा में तो बीजेपी का खाता भी नहीं खुला। तो सवाल पश्चिम बंगाल में सेंध लगाने का नहीं बल्कि कोलकाता में 5 फरवरी को जो भीड मोदी को सुनने आयी, उसे वोट में बदल कर लाल बंगाल को केसरिये में बदलने का ख्वाब मोदी ने पाला है। इसालिये बेखौफ मोदी यह कहने से नहीं चूके कि दिल्ली की सत्ता पर बैठकर भी बंगाल को बदला जा सकता है। यूं बंगाल में कभी केसरिया जमीन बनी ही नहीं तो बीजेपी खड़ी होती कहां।

2011 के विधानसभा चुनाव सभी 294 सीटो पर चुनाव लड़कर भी केसरिया का सच शून्य ही रहा। 2006 में तीन दर्जन सीटो पर बीजेपी ने अपने उम्मीदवारों को खड़ा करने का सपना पाला और वह भी शून्य में सिमट गया। लेकिन अब मोदी है और मोदी ने लालकिले का सपना देखा है। तो फिर बंगाल को अधूरा कैसे छोड़ सकते हैं। वैसे सपना तो मुलायम, नीतिश कुमार, जयललिता और नवीन पटनायक की चौकड़ी ने भी देखा है। किसी ने तीसरे मोर्चे का सपना देखा है तो किसी ने तीसरे मोर्चे के जरिये पीएम बनने का सपना। और इसकी पहली आहट 5 फरवरी को ही संसद में तब दिखायी दी जब 11 राजनीतिक दलों ने हाथ मिलाकर कहा कि चुनाव के लिये जनता को लुभाने वाली मनमोहन सरकार की नीतियों को अब संसद से सड़क पर जाने नहीं देंगे। और यही गांठ 2014 के चुनाव में तीसरे मोर्चे की दस्तक है। तो तीसरे मोर्चे के सपनों पर ध्यान दें तो वामपंथी गठबंदन की अगुवाई करते प्रकाश करात के पास चार दल हैं लेकिन लोकसभा की महज 24 सीट हैं। इसी तरह मुलायम के पास 22, नीतीश कुमार के पास 19, नवीन पटनायक के पास 14, जयललिता के पास 9, बाबूलाल मंराडी के पास 2, देवेगौडा के पास 1 और मंहत के पास भी एक ही सांसद है। यानी इनकी जमीन कितनी पोपली है इसका अंदाजा इसी से लग सकता है हर चेहरे का वजूद उसके अपने राज्य में सिमटा हुआ है और जयलिलता और नवीन पटनायक को छोड दें तो कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो अपने राज्य में ही नंबर एक पर हो। लेकिन सपने हैं तो उड़ान भरी जा रही है। और फिलहाल इनके पास 543 में से महज 92 सीटे हैं।

सपनो की इस सियासत में ममता बनर्जी भी शामिल हो जायें, इसकी कवायद शुरु हो गयी है। यह सपना इसलिये क्योंकि वाम के साथ ममता कैसे खड़ी होंगी, यह भी किसी सपने से कम नहीं। इसके सामानांतर अनूठा सवाल तो यह है कि बंगाल की 42 में से 31 सीट ऐसी है, जहां मोदी के विकास के मंत्र पर गुजरात की प्रयोगशाला भारी पड़ेगी। और देश में इसी चेहरे को विस्तार मिल जाये तो 543 में से 218 सीटो पर गुजरात की प्रयोगशाला मोदी के विकास के मंत्र पर भारी पड़ेगी। लेकिन मोदी 2014 की नब्ज को 272 की तर्ज पर पकडना चाह रहे हैं तो भाषणों में मोदी की मुनादी भी बदलाव की हवा को तेज करने वाली ही होती जा रही है। सपनों की इस सियासत में कांग्रेस भी पीछे रहना नहीं चाहती है तो सपनो की सियासत को और तेज उड़ान खांटी कांग्रेसी जनार्दन दिवेदी ने दे दी है। मनमोहन सरकार ने जिस तरह सरकारी शासन पानी को कैश ट्रांसफर तक के हालात में वोट बैंक के लिये ला खड़ा किया। और विकास की लकीरों के जरीये समाज में असमानता चरम पर पहुंचा दी, उसमें पहली बार कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने आरक्षण का सवाल गरीबी के साथ जोड़कर अपने हाथ को आम आदमी के साथ खड़ा करने का सपना फिर पाला है। तो जो होना चाहिये उसे सपना बनाया जा रहा है या फिर सपनो के घोडे पर सवार होकर सियासी उड़ान भरने की मंशा अब कांग्रेस ने भी पाल ली है। लेकिन संयोग ऐसा है कि नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के सपनो का सच उनकी अपनी बनायी सियासी जमीन पर ही टिकी है। एक ने गुजरात को प्रयोगशाला बनाया तो दूसरे ने देश को। अंतर सिर्फ इतना है कि राहुल गांधी को देश में अपनी बनायी प्रयोगशाला की जमीन पर खडे होकर ही सपने बेचने हैं। लेकिन मोदी को गुजरात से निकलकर हर राज्य में अलह अलग सपने बेचने हैं। बंगाल की जमीन पर नरेन्द्र मोदी के निशाने पर वामपंथी आ जाते है और वामपंथियों के मुद्दे को चुरा कर कांग्रेसी जातीय आधार पर टिके वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है। खुले तौर पर आर्थिक आधार पर आरक्षण का सवाल जनार्दन उठाते हैं और उसके बाद सोनिया गांधी बयान के जरीये साफ करती है कि आरक्षण पर काग्रेस का नजरिया बदला नहीं है, जातीय आधार तो बरकरार रहे लेकिन 2009 के चुनावी मैनिफैस्टो में तो आर्थिक तौर पर कमजोर तबको को आरक्षण देने की बात कांग्रेस ने कही ही थी।

सवाल सिर्फ इतना है कि कांग्रेस को यह सब कहने की जरुरत क्यों पड़ रही है। जबकि बीते 9 बरस 9 महीनो में मनमोहन सरकार ने सिर्फ सपने ही बेचे है। और सपनों को बेचते बेचते आज जब कांग्रेस ढलान पर है तो वह अपने सपनों से देश के सपनों को जोड़ने का सपना देख रही है। लेकिन जातीय आधार पर टिके आरक्षण का सपना भी चूर चूर तो नहीं हो रहा। क्योंकि यूपी में मुलायम और मायावती, बिहार में लालू यादव और नीतीश कुमार ऐसे बडे खिलाड़ी हैं जो आरक्षण के जरिये जातीय विकास के सपने बेचते रहे लेकिन राज्य का विकास सपनो की उडान से ही गुफ्तगू करता रहा। और आरक्षण पाकर भी जातीय समीकरण की राजनीति ने हाशिये पर पड़े तबकों की जिन्दगी ही उडन-छू कर दी। इसलिये एक बार फिर आरक्षण का मंत्र भी बदल कर खुद का टेस्ट कांग्रेस कर रही है। गुजरात को लेकर कांग्रेस की सतही सियासत तो और ही गुल खिला रही है। क्योंकि मोदी देश में घूम घूमकर राहुल गांधी की सियासत को आइना दिखा रहे हैं तो अब राहुल गांधी मोदी की जमीन पर जा कर चुनौती देने का मन बना रहे हैं। 8 फरवरी को गुजरात के बरदोली में राहुल गांधी विकास खोज यात्रा की अगुवाई करेंगे। माना यही जा रहा है कि गुजरात के सीएम देश भर में घूम घूम कर जिस गुजरात मॉडल का बखान कर रहे हैं, उसी मॉडल की हवा निकालने के लिये राहुल गांघी आदिवासी बहुल इलाके बरदोली जा रहे हैं। लेकिन सपनों की सियासत का ताना बाना बुनने वाले कांग्रेसियों के लिये राहुल की गुजरात उढान का राजनीतिक सच कुछ और है।

दरअसल कांग्रेस की राजनीतिक जीत गुजरात में आदिवासी बहुल इलाकों में ही ज्यादा रही है। लेकिन बीते विधानसभा चुनाव में मोदी ने कांग्रेस के वर्चस्व वाले आदिवासी इलाके में भी सेंध लगा दी। 2009 में आदिवासी बहुल 5 सीटो में से कांग्रेस ने 3 सीट जीती थी। 2012 के विधानसभा चुनाव में इन 3 लोकसभा सीट के तहत आने वाली 22 में से 13 सीट मोदी ने जीत ली। असल में मोदी ने आदिवासियो के लिये तीन लोकलुभावन काम कर दिये। पहला हर आदिवासी को घर, दूसरा ,खेती की जमीन पर मालिकाना हक,और तीसरा कल्याण योजना के जरीये आर्थिक मदद। तो असल में राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि अगर 2014 के लोकसभा सीट में काग्रेस आदिवासी बहुल इलाको में भी जीत नहीं पायेगी तो यह कांग्रेस की हार से कही ज्यादा बड़ी मोदी की जीत होगी। क्योंकि सत्ता कभी भी पलटी हो लेकिन कांग्रेस ने कभी आदिवासी बहुल इलाको में सीटे गंवायी नहीं। तो राहुल की राजनीति का नायाब सच एक तीर से दो निशाना साधना है। एक तरफ सीटों को बचाना और दूसरी तरफ सीटों को बचाने के लिये विकास खोजो यात्रा के जरीये मोदी को घेरना। ऐसे में एक सपना दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नायक ने भी देखा है । इस सपने में हर दागी खारिज है और तीसरे मोर्चे की बात हो या मोदी या राहुल की सपना यही देखा गया है कि कोई भी संसद की चारदीवारी को छू भी नहीं पाये। जी, यह सपना देखा है अरविन्द केजरीवाल ने। दिल्ली की सत्ता आम आदमी की सत्ता है और देश की संसद भी आम आदमी की ससंद हो सकती है लेकिन क्या वाकई यह देश इस सपने को उड़ान भरने देगा। या फिर 2014 की हर कवायद सपने में बदलेगी और चुनाव बाद लोकतंत्र का नारा लगाते हुये एक नये तरीके का गठबंधन देश की जनता को ही चिढ़ाकर सत्ता पर काबिज हो जायेगा। और नारा लगेगा। लोकतंत्र जीत गया। या फिर सबसे खतरनाक है सपनो का सौदा करना।

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

1 लाख 76 हजार करोड़ का 2 जी स्कैम, 1 लाख 85 हजार करोड़ का कोयला घोटाला और अब करीब सवा लाख करोड़ का गैस घोटाला। 2जी घोटाले के खेल में 6 कॉरपोरेट घरानों के नाम आये। कोयला घोटाले में 27 कॉरपोरेट और 19 कंपनियों के नाम आये। और गैस घोटाले में रिलायंस इंडस्ट्री का नाम आया। 2जी घोटाला 2008 में हुआ। कोयला घोटाला 1998 से शुरु हुआ और 2010 तक जारी रहा। गैस घोटाले की शुरुआत 2004 में हुई। यानी 2जी घोटाला मनमोहन सिंह के दौर में हुआ तो कोयला घोटाला वाजपेयी के दौर से शुरु होकर मनमोहन सिंह के दौर में ज्यादा तेजी से होने लगा। और गैस के घोटाले पर हस्ताक्षर तो मनमोहन सिंह के दौर में हुये लेकिन केजी बेसिन को मुकेश अंबानी के हवाले 2002 में वाजपेयी सरकार के दौर में ही किया गया। और इन तीनों की कीमत जिस औने पौने दाम में कॉरपोरेट को दी गयी और उससे जो मुनाफा कॉरपोरेट ने कमाया उसे अगर सीएजी के दायरे में देखें तो देश को 2जी, कोयला और प्रकृतिक गैस के घोटाले से 4 लाख 86 हजार 591 करोड का चूना लगा दिया गया। तो देश को चूना लगाने वाली इस रकम यानी 486591 करोड़ रपये के मायने भी समझ लें। मौजूदा वक्त में अगर यह रकम रसोई गैस और पेट्रोल डीजल में राहत के लिये जोड़ दी जाये। यानी तमाम लूट के बाद भी जो कीमत आम जनता से सरकार वसूल रही है अगर उसमें 4 लाख 86 हजार करोड की सब्सिडी मिलने लगे तो महंगाई में तीन सौ फीसदी की कमी आ जायेगी। क्योंकि तब पेट्रोल औसतन 70 रुपये लीटर से घटकर 36 रुपये लीटर पर आ जायेगा। डीजल में 60 फीसदी प्रति लीटर की कमी हो जायेगी। और रसोई गैस प्रति सिलेन्डर आम जनता को 250 रुपये में मिलने लगेगा।

यू महंगाई का सवाल इस लिये भी इन तीनों से जुड़ा है क्योंकि इन तीनों पर कॉरपोरेट का सीधा कब्जा है। यानी सरकार चाहे तो भी इनकी कीमत तय नहीं कर सकती है और जिन कॉरपोरेट के हाथ में इसका लाइसेंस होगा वह अपने मुनाफे को आंक कर ही कीमत तय करेगा। तो इन कीमतो से पड़ने वाले सीधे असर को समझें तो औघोगिक उत्पाद,खेती और सफर के महंगे होने में इन तीनो की भूमिका सबसे बड़ी है। क्योंकि इसी की वजह से गैस के पावर प्लांट से लेकर खाद तक की कीमतें बढ़ीं। जो 1 अप्रेल से और ज्यादा बढ़ेंगी। और इस लकीर पर संयोग से 2जी के घोटाले ने संचार व्यवस्था को भी लूटतंत्र में बदला है तो आधुनिक होते भारत में सिर्फ वहीं सुकून से जी सकता है, जिसकी जेब भरी हो या फिर औसतन कमाई हर महीने कम से कम 52 हजार जरुर हों। यानी जिस देश में सालाना कमाई ही औसतन 50 हजार बतायी जाती हो। और इस 50 हजार रुपये सालाना औसतन कमाई का सच यह हो कि देश की 80 फीसदी आबादी की सालाना कमाई महज 4 हजार रुपये से कम हो तो कल्पना कीजिये कि देश में असमानता का पैमाना कितना तीखा है और कारपोरेट की कमाई कितनी ज्यादा है। कारपोरेट-सरकार नैक्सैस के खेल में देश के ही संसाधनों की कीमत कैसे तय होती होगी यह भी अब खुले तौर पर सामने लगा है।

दरअसल, सवाल सिर्फ कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए का नहीं है, यह बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए का भी है। मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडिया लिमिटेड को को बारह बरस पहले वाजपेयी सरकार ने प्रकृतिक गैस निकालने के लिये केजी बेसिन सौपा। और वाजपेयी सरकार के जाने के बाद 2004 में मनमोहन सरकार ने मुकेश अंबानी के साथ गैस खरीदने का सौदा किया। दरअसल दिल्ली सरकार ने जिन दो केन्द्रीय मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले में एपआईआर दर्ज की है उसकी वजह उन्हीं के पेट्रोलियम मंत्री रहते हुये मुकेश अंबानी की हर शर्त मानने का आरोप है। मसलन 2004 में पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर थे और 2006 में मणिशंकर अय्यर को तब पेट्रोलियम मंत्री पद से हटा दिया गया जब रिलांयस ने खर्च करने की आधिकतम निर्धारित रकम 2.39 बिलियन डालर से बढाकर 8.8 बिलियन डालर करने की मांग की। साथ ही प्रति यूनिट गैस की कीमत 2.34 डालर से बढ़ाकर 4.2 डालर करने की मांग की । अय्यर नहीं माने तो मनमोहन सिंह ने मंत्रिमंडल में परिवर्तन कर मुरली देवडा को पेट्रोलियम मंत्री बना दिया और देवडा ने रिलायंस की तमाम शर्तो पर सहमति दी, जिस पर कैबिनेट ने मुहर लगा दी। इसी तरह रिलांयस ने अगला खेल 2012 में किया। उस वक्त जयराल रेड्डी पेट्रोलियम मंत्री थे और रिलांयस ने प्रति यूनिट गैस 4.2 डॉलर से बढ़ाकर 14.2 डालर प्रति यूनिट करने की मांग की। जयपाल रेड्डी नहीं माने तो मनमोहन सिंह ने मंत्रिमंडल में परिवर्तन कर वीरप्पा मोइली को पेट्रोलियम मंत्री बना दिया। और मंत्री बदलते ही समझौता हो गया। तय यही हुआ कि 1 अप्रैल 2014 से प्रति यूनिट गैस की किमत 8.4 डालर प्रति यूनिट होगी।

दरअसल, गैस के इस खेल को बेहद बारिकी से अंजाम दिया गया। क्योंकि जब सरकार ने गैस के खरीद मूल्य को बढ़ाने से इंकार किया तो कई वजहो को बताते हुये गैस के उत्पादन में कमी कर दी गयी। उसके बाद जो रिपोर्ट सरकार के सामने आयी वह भी कम दिल्चस्प नहीं है। बताया गया कि मुकेश अंबानी से समझौता कर लें तो रिलायंस को 43000 करोड़ का लाभ होगा। और रिलायंस ने उत्पादन कम कर दिया है और विदेशी बाजार से गैस खरीदना पड़ रहा है तो सरकार पर 53000 करोड का बोझ पड़ रहा है। तो रिलायंस के आगे मनमोहन सरकार झुक गयी। और इसी मामले को सीपीआई सांसद गुरुदास दास गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में भी उठाया। और सीएजी ने भी अपनी रिपोर्ट में करीब एक लाख 25 हजार करोड का मुनाफा रिलायंस को देने का आरोप भी लगाया। लेकिन इन सब के बाद अब दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने इस पूरे मामले को ही आपराधिक मामले करार दे दिया है। और दिल्ली के एंटी करप्शन ब्यूरो को एफआईआर दर्ज करने के आदेश दे दिये है। उसके बाद कई सवाल खड़े हो गये हैं। एफआईआर दर्ज करने के बाद एंटी करप्शन ब्यूरो क्या आरोपियों को गिरफ्तार करेगा। क्या गिरफ्तारी से बचने के लिये अब आरोपी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटायेंगे। क्या खनिज संपदा को लेकर रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट को ही आधार बना लिया जायेगा। क्या सुप्रीम कोर्ट अब तेजी से काम करेगा और कोई फैसला जल्द सुना देगा। बड़ा सवाल कि 1 अप्रैल 2014 से गैस की कीमत क्या होगी। लेकिन सिस्टम का मतलब क्रोनी कैपटिलिज्म हो चुका है यह तो मान लीजिये।

साहेब का मेरठ...2014 में 1857 का गदर और 2019 में गालिब की 'सराब'

2 फरवरी 2014 और 28 मार्च 2019 का अंतर सिर्फ तारिख भर का नही है । बल्कि भारत जैसे देश में कोई सत्ता कैसे पांच बरस में हाफंने लगती है । कैस...