मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

न कोई सरोकार, न कोई नीति फिर भी कहा "अन्नदाता सुखी भव"

बीते 25 बरस का सच तो यही है कि देश में सत्ता किसी की रही हो लेकिन किसान की खुदकुशी रुकी नहीं। और हर सत्ता के खिलाफ किसान का मुद्दा ही सबसे बड़ा मुद्दा होकर उभरा। तो क्या ये मान लिया जाये कि विपक्ष के लिये किसान की त्रासदी सत्ता पाने का सबसे धारधार हथियार है और सत्ता के लिये किसान पर खामोशी बरतना ही सबसे शानदार सियासत। क्योंकि राहुल गांधी तो विपक्ष की राजनीति करते हुये मंदसौर पहुंचे लेकिन पीएम खामोशी बरस कजाकस्तान चले गये। कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह दिल्ली छोड़ मंदसौर जाने के बदले बिहार चले गये। बाब रामदेव के साथ मोतीहारी में योग करने  लगे और किसानों के हालात पर बोलने की जगह योग पर ही बोलने लगे। तो क्या ये कहा जा सकता है कि राजनीति अपना काम कर रही है और किसान की त्रासदी जस की तस। यानी एक तरफ सत्ता योग कर रही है तो दूसरी तरफ विपक्ष सियासी स्टंट हो रहा है । दरअसल राजनीति के इसी मिजाज को समझने की जरुरत है क्योंकि किसान की फसल बर्बाद हो जाये तो मुआवजे के लाले पड़ जाते हैं।


कर्ज में डूब वह खुदकुशी कर लेता है लेकिन भारत में विधायक-सांसद चुनाव हार कर भी विशेषाधिकार पाये रहता है। हर पूर्व विधायक सांसद को भी किसान की आय से 300 से 400 गुना ज्यादा कम से कम मिलता ही है। देश में किसान की औसत महीने की आय 6241 रुपये है लेकिन विधायक सांसद को पेंशन-सुविधा के  नाम पर हर महीने 2 से ढाई लाख मिलते हैं। तो नेताओं के सरोकार किसान के साथ कैसे हो सकते हैं और संसद के भीतर याद कीजिये तो किसानों को लेकर किसी भी बहस को देख लीजिये संकट कोरम पूरा करने तक का आ जाता है। यानी 15 फिसदी  संसद में किसानों की समस्या पर चर्चा में शामिल नहीं होते। तो फिर किसानों का नाम लेकर राजनीति साधने या सत्ता चलाने का मतलब होता क्या है। क्योंकि राजनीति कर सत्ता पाने के लिये हर राजनीतिक दल को चंदा लेने की छूट है। और चंदा संयोग से ज्यादातर वही कारपोरेट और औघोगिक घराने देते हैं, जिनका  मुनाफा सरकार की उन नीतियो पर टिका होता है जो किसानों के हक में नहीं होती। मसलन खनन से लेकर सीमेंट-स्टील प्लांट की ज्यादातर जमीन खेती की जमीन पर या उसके बगल में होती है। 

लेकिन मुश्किल इतनी भर नहीं है। राजनीति कैसे सांसद विधायक के सरोकार किसान-मजदूर से खत्म कर सिर्फ पार्टी के लिये हो जाते है ये एंटी डिफेक्शन बिल के जरीये समझा जा सकता है । मसलन मंदसौर की घटना पर मंदसौर के ही बीजेपी सांसद किसानों पर संसद में वोटिंग होने पर अपनी पार्टी के खिलाफ वोट नहीं दे सकते। यानी मंदसौर के किसान अगर एकजुट होकर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशो को लागू कराने पर  अड जाये तो मंदसौर का ही सांसद क्या करेगा। व्हिप जारी होने पर पार्टी का साथ देना होगा । क्योंकि याद कीजिये बीजेपी ने भी 2014 के चुनावी  घोषणापत्र में 50 फीसदी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया। लेकिन 21 फरवरी 2015 को कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा कि 50 फीसदी न्यूनतम  समर्थन मूल्य बढ़ाना संभव नहीं है। क्योंकि ऐसा करने से बाजार पर विपरित प्रभाव होगा । यानी चुनावी घोषणापत्र जैसे दस्तावेज में किए वादे का भी  कोई मतलब नहीं। तो फिर चुनावी घोषमापत्र और सरकारो के होने का मतलब ही किसानो के लिये क्या है। क्योंकि महाराष्ट्र में तो बकायदा पीएम और सीएम दोनो ने ही लागत से पचास फिसदी ज्यादा देने का वादा किया था । यानी नेताओं  के सरोकार जब सामाजिक और आर्थिक तौर पर किसानों के साथ होते नहीं है तो  पिर किसानों की बात करने वाला विपक्ष हो किसानों के बदले योग करते हुये कृषि मंत्री हैं। किसानों के जीवन पर फर्क पड़ेगा कैसे। क्योंकि देश की अर्थव्यस्था में किसानी कही टिकती नहीं मसलन देश के ही सच को परख लें।  किसानो पर कुल कर्ज है 12 लाख साठ हजार करोड का है जिसमें फसली कर्ज 7 लाख 70 हजार करोड का है तो टर्म लोन यानी खाद बीज का लोन 4 लाख 85 हजार  करोड का है। और उसके नीचे की लकीर बताती है कि देश के 50 कॉरपोरेट का चार लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए का कर्ज संकटग्रस्त है यानी बैंक मान चुकी  है कि वापस आने की संभावना बहुत कम है। कॉरपोरेट को चिंता नहीं कि संकटग्रस्त कर्ज चुकाएगा नहीं तो क्या होगा क्योंकि उसे एनपीए मानने से लेकर री-स्ट्रक्चर करने की जिम्मेदारी सरकार की है। और एनपीए का आलम ये है कि वह 6 लाख 70 हजार करोड़ का हो चुका है । और इन सब के बीच बीते तीन बरस में केन्द्र सरकार ने देश के ओघोगिक घरानों को 17 लाख 14 हजार 461 करोड़ की रियायत टैक्स इंसेटिव के तौर पर दे दी है। तो देश में कभी एनपीए, टैक्स माफी या सकंटग्रस्त तर्ज पर बहस नहीं होती। हंगामा होता है तो किसानों के सवाल पर । क्योंकि देस में 26 करोड पचास लाख परिवार किसानी से जुडे है । तो फिर राजनीति तो किसानी के नाम पर ही होगी । और बाजार इक्नामी के साये तले किसान की अर्थव्यवस्था कहा मायने रखती है। और शायद यही से सवाल खडा होता है कि कर्जमाफी से भी किसान का जीवन बदलता क्यों नहीं।  

ये सवाल इसलिए क्योंकि कर्ज माफी तात्कालिक उपाय से ज्यादा कुछ नहीं-लेकिन किसानों के दर्द पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हुए राजनेताओं ने इसी उपाय को केंद्रीय उपाय करार दे डाला है। सच तो यह है कि 70 बरस में ऐसी व्यवस्था नहीं हो पाई कि किसान खुद अपने पैर पर खड़ा हो सके। सिर्फ किसान ही क्यो पूंजी से पूंजी बनाने के खेल में जो नहीं है उसके लिये आगे बढने का या कहे जिन्दगी बेहतर बनाने को कोई इक्नामी प्लानिंग देश में हुई ही नहीं है । मसलन यूपी की दो तस्वीरों को याद कर लीजिये। राहुल गांधी की खाट सभा में लोग तीस सौ रुपये की खाट लूटने में ही लग गये और योगी की सभा के बाद लोग 40 रुपये का डस्टबीन लूटने में ही लग गये। जबकि दोनों ही किसान-मजदूर। सिस्टम को बेहतर बनाने की बात कर रहे थे। यानी देश में किसानों की जो माली हालत है, उसमें सुधार कैसे आये और किसान भी गर्व से सीना चौडा कर खेती करें, क्या ऐसे हालात देश में आ सकते है। ये सवाल इसलिये क्योंकि किसानी को बेहतर करने के लिए जो इंतजाम किए जाने चाहिए थे-वो तो हुए नहीं अलबत्ता दर्द से कराहते किसानों को कर्जमाफी के रुप में लॉलीपॉप थमाया गया। तो एक सवाल अब है कि क्या राज्य सरकारें किसानों का कर्ज माफ कर सकती हैं और क्या ऐसा करने से किसानों की दशा सुधरेगी। तो दोनों सवालों का जवाब है कि ये आसान नहीं। क्योंकि कई राज्यों का वित्तीय घाटा जीडीपी के 5 फीसदी से 10 फीसदी तक पहुंच गया है, जबकि नियम के मुताबिक कोई भी राज्य अपने जीडीपी के 3 फीसदी तक ही कर्ज ले सकता है । यानी पहले से खस्ता माली हालत के बीच किसानों की कर्ज माफी का उपाय आसान नहीं है क्योंकि राज्यों के पास पैसा है ही नहीं और विरोध प्रदर्शन के बीच कर्ज माफी का ऐलान हो जाए, बैंक कर्ज माफ भी कर दें तो भी साहूकारों से लिया लोन माफ हो नहीं सकता ।-किसान कर्ज माफी के बाद भी बैंक से कर्ज लेंगे और एक फसल खराब होते ही उनके सामने जीने-मरने का संकट खड़ा हो जाता है,जिससे उबारने का कोई सिस्टम है नहीं । फसल बीमा योजना अभी मकसद में नाकाम साबित हुई है । और कर्ज माफी की संभावनाओं के बीच भी किसान की मुश्किलें बढ़ती ही हैं,क्योंकि वो कर्ज चुकाना नहीं चाहता या चुका सकता अलबत्ता नए कर्ज मिलने की संभावना बिलकुल खत्म हो जाती है। तो सवाल कर्ज माफी का नहीं,सिस्टम का है। और सिस्टम का मतलब ही जब राजनीतिक सत्ता हो जाये तो कोई करें क्या  । तो होगा यही कि आलू दो रुपये किलो होगा और आलू चिस्प 400 रुपये किलो । टमाटर 5 रुपये होगा और टमौटो कैचअप 200 रुपये किलो । और संसद की कैंटीन में चिप्स है, कैचअप है । और पीएम भी कैंटीन की डायरी में लिख देते है, अन्नदाता सुखी भव ।
(साभार)

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

ठेके पर चल रही है देश की हायर एजुकेशन

दिल्ली यूनिवर्सिटी के 45 कालेजों में 1734 पद खाली पड़े हैं। इसके लिये बकायदा 10 जून से लेकर 15 जुलाई 2017 के बीच विज्ञप्ति निकालकर बताया भी किया कि रिक्त पद भरे जायेंगे। कमोवेश हर विषय या कहें फैकल्टी के साथ रिक्त पदों का जिक्र किया गया  । यानी देश की टॉप  यूनिवर्सिटी में शुमार दिल्ली यूनिवर्सिटी का जब ये आलम है तो देश की बाकी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में क्या हो सकता है ये सोचकर आपकी रुह कांप जायेगी। क्योंकि हायर एजुकेशन को लेकर  बकायदा हर राज्य में सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी बनायी गई । और अव्वल नंबर पर जेएनयू का जिक्र बार बार बार होता है। और देश के आईआईटी, आईबीएम और एनआईटी को बेहतरीन .यूनिवर्सिटी माना जाता है । पर हालात कितने बदतर हैं जरा ये भी देख लिजिये । पहले देश के टॉप दस सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी, जहा 70 फीसदी से ज्यादा पद रिक्त हैं। तो सिलसिलेवार समझें। सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा में 87.1 फिसदी पद रिक्त पड़े हैं तो सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ तमिलनाडु में 87.1 फिसदी। और इसी तरह सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ ओडिशा में 85 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ बिहार में 84.4 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ पंजाब में 80.7 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ केरल में 78.6 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ कश्मीर में 75.6 फिसदी । इंदिरा गांधी नेशनल  ट्राइबल यूनिवर्सिटी [ मध्यप्रेदश } में 75.4 फिसदी ।सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ हिमाचल में 73.4 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ सिक्किम में 72.1 पिसदी पद रिक्त है । यूं यूनिवर्सिटी की फेहरिस्त में जेएनयू और बीएचयू में छात्रो का हंगामा तो हर किसी को याद है । सियासत भी खूब हुई । 


मसलन आप भूले नहीं होंगे जेएनयू में आजादी के नारे । पर इन नारों से इतर किसी ने नहीं पूछा कि जेएनयू में कितने पद रिक्त पडे हैं।  सरकार की रिपोर्ट कहती है 323 पद खाली पड़े हैं । भरे क्यों नहीं गये । तो कोई बोलने को तैयार नहीं । और जो बीएचयू फिल्हाल बिना वीसी के है और छात्राओं पर पुलिस ने डंडे क्यो बरसाये, ये सवाल अब भी बार बार गूंज रहा है और छात्राओं के सवाल अब भी कानो में गूंज रहे होंगे कि बीएचयू कैसे बिगड़ गया । उसे बचाना होगा तो  मदनमोहन मालवीय जी के बीएचयू का हाल ये है कि बीएचयू में 896 रिक्त पद है । यानी  सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के कुल 15862 पदों में से 5958 पद रिक्त पडे हैं । इसीलिये दुनियाभर में टाप यूनिवर्सिटी में अक्सर चर्चा होती है कि नौ छात्रो पर एक शिक्षक होना चाहिये । पर भारत में 23 छात्रों पर एक शिक्षक है । और देश में जिस आईआईटी, आईबीएम और  एनआईटी को बेहतरीन यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया जाता है । वहां का हाल ये है कि  6000 से ज्याद पद रिक्त पडे है । और इसके अलावे सिर्फ देशभर के इंजीनियरिंग कालेजों को परख लें तो सरकारी आंकडे ही कहते हैं कि इंजीनिंयरिंग कालेजो के 4 लाख 2 हजार पदो में से एक लाख 22 हजार पद रिक्त पडे है । यानी मुश्किल इतनी भर नहीं है कि सरकार रिक्त पदो पर भर्ती क्यो नहीं करती मुस्किल तो ये भी है कि जिस यूजीसी के मातहत सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आती है । उस यूजीसी के पास कोई परमानेंट चेयरमैन तक नहीं है । एडहाक चैयरमैन है ।  वाइस चैयरमैन का पद भी खाली पडा है । फाइनेनसियल एडवाइजर ही सचिव का काम देख रहा है । 

तो हायर एजूकेशन के लिये यूजीसी से लेकर सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी  जब एडहॉक चैयरमैन से लेकर एडहॉक प्रोफेसर पर  निर्भर होगी तो होगा क्या । हो ये रहा है कि बडी तादाद में हायर एजुकेशन के लिये देश के बच्चे दूसरे देशों में जा रहे हैं। और कल्पना कीजिये हायर एजुकेशन को लेकर देश का बजट 33323 करोड रुपये है । जबकि हर बरस दूसरे देसो में पढने जा रहे बच्चो के मां-बाप एक लाख 20 हजार करोड से ज्यादा की रकम खर्च कर रहे है । एसोचैम की रिपोर्ट कहती है 2012 में ही 6 लाख बच्चे हर बरस देओश छोड कर बाहर पढाई के लिये चले जाते थे । तो बीते पांच बरस में इसमें कितना इजाफा हो गया होगा और उनके लिये देश में हायर एजूकेशन की कोई व्यवस्था क्यों नहीं है । ये अपने आप में सवाल है ।
(साभार)

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

जन-जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर जन-भागीदारी की मांग करती राजनीति सत्ता

खुली अर्थव्यवस्था की जो लकीर पीवी नरसिंह राव ने जो लकीर 1991 में खींची,  उसी लकीर पर वाजपेयी चले, मनमोहन सिंह चले और अब मोदी भी चल रहे हैं । और खुली इक्नामी की इस लकीर का मतलब यही था कि रोजगार हो या शिक्षा । इलाज हो या घर । या फिर सुरक्षा । जब सब कुछ प्राइवेट सेक्टर के हाथों में इस तरह सौंपा गया कि सरकार या तो हर जिम्मेदारी से मुक्त हो गई। या फिर सरकार खुद ही कमीशन लेकर काम देने की स्थिति में आ गई । क्योंकि प्राईवेट सेक्टर को काम करना है और मुनाफा कमाना है । या कहें मुनाफा कमाना है तो कोई भी काम करना है । इन दोनो हालातों के बीच ही जनता के चुने हुए नुमाइन्दों की राजनीतिक सत्ता कैसे चलती है, अब इस सवाल को समझने की भी जरुरत है। क्योंकि सिलसिलेवार तरीके से जब हालात को परखें तो फिर जनभागेदारी कैसे सरकार के साथ होगी । जिसकी मांग स्वच्छता को लेकर 2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री ने की ये भी सवाल होगा । मसलन सरकारी नौकरी की तुलना में कई गुना ज्यादा प्राइवेट सेक्टर में नौकरी है। मसलन 1 करोड़ 72 लाख 71 हजार नौकरी सरकारी क्षेत्र में है । तो प्राइवेट सेक्टर में 1,14,22,000 है तो असंगठित क्षेत्र में 43 करोड 70  लाख नौकरियां हैं। तो फिर जनता रोजगार के लिये सरकार की तरफ क्यों देखेगी । और पांच साल के लिये चुनी हुई किसी भी सत्ता के पांच बरस के दौर में 8 हजार से ज्यादा सरकारी नौकरियों का आवेदन नहीं निकलता। तो सरकारी नौकरी है नहीं। 

और सरकारी नीतियों से अगर प्राईवेट सेक्टर की नौकरी कम होगी तो फिर नौकरी का संकट तो गहरायेगा ही जैसे अभी गहरा रहा है । इसी तरह शिक्षा, हेल्थ , घर और सुरक्षा को लेकर भी जनता सरकार की तरफ क्यों देखे । जब शिक्षा को लेकर सरकार का बजट 46,356  करोड हो और निजी क्षेत्र का बजट 7,80,000 करोड का है । जब हेल्थ सर्विस का सरकारी बजट 48,878 करोड का है और प्राईवेट क्षेत्र के हेल्थ सर्विस का बजट साढे छह लाख करोड़ का हो चुका हो । जो 2020 तक 18 लाख करोड का हो जायेगा । तो फिर सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम का मतलब बची क्या । इसी तरह घरों को लेकर भी हालात को समझे तो पिछले ढाई बरस में एक लाख तीन हजार सरकारी घर बने तो 4 लाख 71 हजार प्राइवेट घर बनकर  खाली पडे है । प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 2022 तक 4 करोड 30 लाख घर बनाने का लक्ष्य है । चुनाव 2019 में होने है । पहले ढाई बरस में लक्ष्य का सिर्फ 7 पिसदी घर बना है तो सरकार की तरफ किस नजर से जनता देखेगी । और इस कडी में जब पुलिस का जिक्र होगा तो समझना ये भी होगा निजी सुरक्षाकर्मियों की तादाद पुलिसकर्मियों से ज्यादा हो गई है । हालत ये है कि देश में पुलिस की संख्या 14 लाख है । जबकि निजी सुरक्षाकर्मियों की संख्या 70 लाख है। पूरे देश की पुलिस को लेकर बजट करीब 54 हजार करोड़ का है । पर दूसरी तरफ निजी सुरक्षाकर्मियों को लेकर प्राइवेट सेक्टर का बजट 60 हजार करोड़ पार कर चुका है । जो अगले दो बरस में 80 हजार करोड़ हो जायेगा। लेकिन पुलिस सुधार और सुधार के लिये बजट की रफ्तार बताती है कि अगले दो बरस में पुलिस बजट में 5 हजार करोड़ से ज्यादा की बढोतरी हो नहीं सकती है ।  तो फिर चुनी हुई सरकारो का मतलब सिवाय प्राइवेट सेक्टर अनुशासन में काम करें उसके अलावे । 

प्राइवेट सेक्टर में किसे कितना लाभ मिले ये नये सिस्टम बिल्ट-आपरेट-ट्रासफंर  सिस्टम यानी बीओटी से भी समझा जा सकता है । जिसमें सरकार निजी सेक्टर को लाइसेंस देती है । जिस क्षेत्र का काम  दिया जाता है उससे मुनाफा कमाकर वापस उसे सरकार को सौपा जाता है । मसलन सडक और  पुल कोई प्राईवेट सेक्टर बनाता है  उससे मुनाफा कमाता है । पिर सरकार को दे देता है । तो क्या सरकारे इसीलिये पेल हो रही है या फिर जनता का भरोसा धीरे धीरे सरकार से ही उठने लगा है । ये सवाल हर उस परिस्थिति से जोडा जा सकता है जिन परिस्थितियो में जनभागीदारी का सवाल सरकार उठाती  है । याद किजिये 2006 में मनमोहन सरकार ने पीपीपी मॉडल शुरु किया । जनता ने जमीन दी । सरकार ने मुआवजा दिया । पर देश में रोजगार या कमाई के लिये कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर है ही नहीं तो मुआवजा लेकर भी जमता फक्कड हो गई। और  अब जब मोदी स्वच्छता के लिये जनभागीदारी का जिक्र कर गये तो उसके पीछे के इस सच को भी हर किसी ने देखा कि 60 हजार करोड स्वच्छता के प्रचार प्रसार में कैसे खर्च हो गये । धन जनता का । या कहे देश का । स्वच्छता देश की । पर प्रचार प्रसार राजनीतिक लाभ के लिये और काम की सफलता का सरकारी आंकडा ही तीस फिसदी का ।तो जो गलती पीपीपी मॉडल को लेकर मनमोहन कर रहे थे । क्या वही गलती जनभागीदारी के नाम पर मोदी कर रहे हैं । क्योकि राजनीतिक लाभ के लिये राजनीतिक सत्ता का कामकाज पांच बरस चलता है यह आखिरी सच हो चला है। इसलिये सरकारी योजनाये वक्त से पहले दम तोड रही है । आलम ये कि बीते साल 6000 नए स्टार्टअप शुरु हुए थे, जिनकी संख्या इस साल सितंबर के महीने तक घटकर 800 पर आ गई है। और आईबीएम इंस्टीट्यूट फॉर बिजनेस वैल्यू एंड ऑक्सफोर्ड इक्नोमिक्स की रिपोर्ट कहती है कि देश के 90 फीसदी स्टार्टअप शुरु होने के पांच साल में बंद हो जाएंगे क्योंकि उनमें कोई नवीनता और खास बिजनेस मॉडल ही नहीं है । और तो और पांच बरस की सफलता दिखाने का ही तरीका नोटबंदी-जीएसटी तो नहीं । क्योकि कपड़ा मंत्रालय के आंकड़े कह रहे हैं कि तीन साल में 67 टैक्सटाइल यूनिट बंद हो गई, जिनसे 17600 लोगों की नौकरी चली गई । ज्यादातर नौकरी तीसरे साल गई । तो ये आकंड़ा संगठित क्षेत्र का है, और असंगठित क्षेत्र की लघु कपड़ा इकाइयां  कितनी बंद हो गई-इसका किसी को अता पता नहीं है अलबत्ता सीएमआईई का सर्वे कहता है कि नोटबंदी के बाद असंगठित क्षेत्र में 15 लाख लोगों की नौकरी गई । और हालात धीरे धीरे कैसे बिगड़ रहे हैं-इसका अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि कपड़ा, धातु, चमड़े, रत्न एवं आभूषण, आईटी एवं बीपीओ, ट्रांसपोर्ट, ऑटोमोबाइल्स और हतकरघा जैसे संगठित क्षेत्रों में रोज़गार निर्माण में तेज गिरावट आई है । उधर, कॉरपोरेट सेक्टर का हाल भी बिगड़ा हुआ है। एलएंडटी जैसी कंपनी ने 2017 की पहली दो तिमाही में 14000 लोगों की छंटनी की । एचडीएफसी बैंक ने 3230 लोगों को निकाल दिया । इस वित्तीय साल की पहली तिमाही में ही पांच में तीन बड़ी आईटी कंपनियों ने करीब 5000  लोगों को निकाल दिया । तो सरकार अगर जिम्मेदारी से पल्ला झाड कर प्राईवेट सेक्टर पर टिक जाये । और वोट की नीतियो से अगर निजी क्षेत्र में भी नौकरी खत्म होने लगे तो फिर 'एमबिट कैपिटल’ की नयी रिसर्च रिपोर्ट को समझना चाहिये जो कहती है कि , " देश में बढ़ती बेरोजगारी से न केवल असमानता बढ़ेगी बल्कि अपराधों में तेजी और सामाजिक तनाव मे भी बढ़ोतरी हो सकती है"
(साभार)

साहेब का मेरठ...2014 में 1857 का गदर और 2019 में गालिब की 'सराब'

2 फरवरी 2014 और 28 मार्च 2019 का अंतर सिर्फ तारिख भर का नही है । बल्कि भारत जैसे देश में कोई सत्ता कैसे पांच बरस में हाफंने लगती है । कैस...