रविवार, 12 नवंबर 2017

सियासी दलदल में पटेल-इंदिरा

तारीख और तवारीख के रिश्ते कभी-कभी कुछ पेचीदगियां गढ़ देते हैं।31 अक्तूबर को ही लीजिए। इस दिन आधुनिक भारत के निर्माता सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती है, तो हिन्दुस्तान की लौह महिला इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी। विवादों की आंच से स्वार्थों का तंदूर सुलगाने वाले राजनेता अक्सर ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के बारे में अधकचरे फैसले सुना देते हैं। यह इतिहास की मूल अवधारणा के साथ अन्याय है। जिस तरह तारीखें एक-दूसरे से बावस्ता होती हैं, वैसे ही महान व्यक्तित्वों में समानता के तमाम सूत्र पाए जाते हैं। 
पहले पटेल की बात 
सरदार वल्लभभाई पटेल को लेकर इधर किस्म-किस्म के विचार व्यक्त किए जा रहे हैं। कोई उन्हें नेहरू से महान साबित करने में जुटा है, तो किसी को ऐसे दावों पर आपत्ति है। जो लोग नेहरू और पटेल के बीच की चुनिंदा असहमतियों को विवाद का दर्जा देते हैं, उन्हें कुछ तथ्यों पर गौर फरमाना चाहिए। साल1947 की शुरुआत तक नेहरू, पटेल और तमाम अन्य नेताओं का रोल कमोबेश एक सा था। उनका मकसद समान था और लड़ाई का तरीका भी। वे ऐसे आंदोलन के अगुवा थे, जिसे देश के आमजन ने अपने खून-पसीने से सींचा था। इस जंग में शामिल होने के लिए जब उन्होंने अपने सुखद भविष्य को लात मारी थी, तब उन्हें इसका इलहाम नहीं था कि वे जीते जी अपना मकसद पूरा कर सकेंगे। 
बापू उनके सर्वमान्य नेता थे और कांग्रेस थोडे़ मत-मतांतरों के साथ समानता के सूत्र तलाशने में कामयाब रही थी, पर अगस्त आते-आते हालात बदल गए। नए उभरते लोकतंत्र को एक प्रधानमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद की आवश्यकता थी। कल तक जो लोग साथ लड़ रहे थे, उनमें से एक को नेतृत्व करना था और अन्यों को सहयोगी की भूमिका निभानी थी। अगर नेहरू की जगह पटेल अथवा राजगोपालाचारी या कोई और होता, तो कहानी के किरदार भले ही बदल गए होते, पर कहानी का ‘प्लॉट’ यही रहता। वे सियासी सहचरी के दिन थे, आज की तरह अनुचरी के नहीं।
इसीलिए कुछ मुद्दों पर अगर नेहरू और पटेल में हम असहमति की खतो-किताबत पाते हैं, तो उनमें सहमति की कशिश और परस्पर सम्मान के भाव भी नजर आते हैं। बाद के दिनों में भारत ने वंशवाद अथवा नेता विशेष की झंडाबरदारी को अपना लिया, इसलिए असहमतियां सार्वजनिक जीवन से नदारद हो गईं। क्या यह विचार का विषय नहीं कि असहमतियों के बावजूद हमारी पहली सरकार भारत के एकीकरण के साथ तमाम ऐसी संस्थाओं की स्थापना में कामयाब हो गई! वही संस्थाएं और परंपराएं आज तक हमारे लोकतंत्र की रक्षा कर रही हैं। 
नेहरू और पटेल के रिश्ते को समझने के लिए उन्हीं दिनों में लौटना होगा। मौजूदा अनुभवों के आधार पर अतीत को आंकना कभी-कभी खतरनाक साबित होता है। इसकी कीमत कोई और नहीं, बल्कि खुद सरदार पटेल चुका रहे हैं। वह अगर विवादप्रिय व्यक्ति होते, तो बिना खास खून-खराबे के 550 से अधिक रियासतों का भारतीय संघ में विलय कैसे करा पाते? यहां एक संयोग का जिक्र जरूरी है। पटेल की पहली चुनावी जंग और इंदिरा गांधी के जन्म का यह शताब्दी वर्ष है। जनवरी 1917 में सरदार ने अहमदाबाद म्युनिसपैलिटी का चुनाव जीता था। उन्हें महज एक वोट से वह चुनावी फतह हासिल हुई थी। 
सरदार वल्लभभाई पटेल के व्यक्तित्व को जानने के लिए हमें उनके कृतित्व को दो भागों में बांटना होगा- आजादी के पहले, स्वतंत्रता के पश्चात। उनके बारे में जब भी बात होती है, तो उन्हें भारतीय एकीकरण का नायक बताकर लोग रुखसत हो लेते हैं, जबकि 1928 के बारदोली सत्याग्रह ने न केवल उनकी संवेदनशील नेतृत्व क्षमता को उजागर किया, बल्कि उन्हें नई पहचान भी दी। बारदोली की महिलाओं ने ही उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि से नवाजा था। आप पूछेंगे, महिलाएं क्यों? बताता हूं।
यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि पटेल उन नेताओं में एक थे, जिन्होंने राजनीति में स्त्रियों के साथ भेदभाव का खुलकर विरोध किया था। सरदार ने ‘डिस्ट्रिक्ट म्युनिसिपल एक्ट’ से उस सेक्शन 15 (1) (सी) को खत्म करवाया, जो औरतों को चुनाव लड़ने से रोकता था। उनकी यह दलील थी कि निर्वाचित सदन से औरतों को बाहर रखने का मतलब अहमदाबाद की आधी आबादी के प्रतिनिधित्व को समाप्त करना है। इस नेक निर्णय के ठीक 40 बरस बाद यानी 1966 में इंदिरा गांधी ने बहैसियत प्रधानमंत्री हिन्दुस्तान की बागडोर सम्हाली थी।
पटेल के बरक्स इंदिरा गांधी वंशवाद की उपज थीं। उन्होंने समय गुजरने के साथ-साथ ‘एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति’ की परंपरा को बल दिया। 1975 में इंदिरा ने देश पर आपातकाल तक थोप दिया, परंतु इससे भारत को ताकतवर बनाने में उनका योगदान खत्म नहीं हो जाता। सिक्किम के हिन्दुस्तान में विलय और पाकिस्तान के विभाजन के जरिए उन्होंने साबित कर दिया कि देश की सीमाओं में बढ़ोतरी के साथ सुरक्षा मामलों में वह अद्वितीय हैं। सिर्फ यही दो कार्य उन्हें अमर करने के लिए पर्याप्त हैं, हालांकि उनके खाते में और भी बहुत कुछ है। पटेल ने देश का एकीकरण किया था और नेहरू ने जमींदारी प्रथा का खात्मा। इंदिरा गांधी ने ‘प्रिवी पर्स’ खत्म कर देश से राजा-महाराजा युग को सदा-सर्वदा के लिए विदा कर दिया। उन्होंने ऐसे तमाम काम किए, जो आम आदमी के हक-हुकूक के लिए जरूरी थे। इसीलिए आपातकाल और ऑपरेशन ब्लू स्टार के बावजूद इंदिरा गांधी एक जनप्रिय शासक साबित हुईं। जिन लोगों ने 31 अक्तूबर, 1984 को उनकी हत्या के बाद देश भर में लोगों को रोते हुए देखा था, वे इसकी हामी भरेंगे। 
कौन कहता है कि वह अलोकतांत्रिक थीं?
अगर मैं पटेल को आधुनिक भारत का निर्माता और इंदिरा गांधी को वर्तमान भारत की जननी कहूं, तो शायद कुछ लोगों को अच्छा न लगे, पर यह सच है कि इंदिरा के अलावा कोई अन्य प्रधानमंत्री आज तक न तो देश की सीमा को बढ़ा सका और न ही पाकिस्तान जैसे चिर शत्रु के टुकडे़ कर सका। रही बात उनसे जुड़े विवादों की, तो मैं इन्हें बुरा नहीं मानता। संसार के सबसे बडे़ लोकतंत्र को स्वस्थ ‘डिबेट’ का हक हासिल होना ही चाहिए। तकलीफ तब होती है, जब हम निजी छींटाकशी पर उतर आते हैं। थोथे तर्कों की यह कालिख न केवल हमारे पुरखों की मर्यादा को धूमिल करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर वैचारिक प्रदूषण का अभिशाप भी थोप देती है। इससे बचने के लिए हमें किसी पटेल या इंदिरा की समीक्षा की नहीं, बल्कि अपने अंदर झांकने की जरूरत है। इस नेक काम के लिए 31 अक्तूबर से अधिक बेहतर भला और कौन सा दिन हो सकता है?
【साभार】HT

बुधवार, 1 नवंबर 2017

उम्मीद बराबरी के लोकतंत्र की........

जो 60 साल में नहीं हुआ वह 60 महीने में होगा। कुछ इसी उम्मीद के आसरे मई 2014 की शुरुआत हुई थी। और 40 महीने बीतने के बाद अक्टूबर 2017 में राहुल गांधी गुजरात को जब चुनावी तौर पर नाप रहे हैं तो अंदाज वही है जो  2013-14 में मोदी का था। तो क्या इसी उम्मीद के आसरे गुजरात में दिसंबर 2017 की शुरुआत होगी, जैसे 2014 मई में मोदी सरकार की शुरुआत हुई थी। तो फिर भारत कितना बदल चुका है। बदल रहा है या अब न्यू इंडिया के नारे  तले युवा भारत स्वर्णिम भविष्य देख रहा है। यानी हर चुनावी दौर में सत्ता के खिलाफ विपक्ष का नारा चाहे अनचाहे फैज की नज्म याद करा ही देता है ..सब ताज उछाले जाएंगे...सब तख्त गिराए जाएंगे..हम देखेंगे। तो क्या  विरोध और विद्रोह की ये अवाज चुनाव के वक्त अच्छी लगती है। क्योंकि सत्ता से उम्मीद खत्म होती है तो विपक्ष जनता बनकर सत्ता पर काबिज होने की मश्क्कत करती है। और चुनाव प्रक्रिया लोकतंत्र का राग बाखूबी जी लेती है। तो क्या चुनाव सत्ता-सियासत -राजनीति से खत्म होती जनता की उम्मीदों को बरकरार रखने का एक तरीका मात्र है। संसद से भरोसा ना डिगे। लोकतंत्र काराग बरकरार रहे। ये सारे सवाल इसलिये क्योकि श्रम व रोजगार मंत्रालय की  2016 की रिपोर्ट कहती है देश में 4,85,00,000 युवा बेरोजगार हैं। बेरोजगारी दर 12.90 फिसदी हो चुकी है। देश में सिर्फ 2,96,50,000 लोगों के पास रोजगार है। 9,26,76,000 किसान परिवारों की आय देश की औसत आय से  आधी से भी कम है। 11,90,98.000 मजदूर परिवारों की आय किसानो की औसत आय के आधे से कम है। यानी कौन सा भारत किस चुनावी उम्मीद और आस के साथ बनाया  जा रहा है। ये सवाल हर चुनाव को जीने के बाद देश के सामने कहीं ज्यादा बड़ा क्यों हो जाता है। जबकि चुनावी लोकतंत्र का अनूठा सच तो यही है कि हर  पांच बरस में देश और गरीब होता है। नेता रईस होते हैं। चुनावी खर्च बढ़ते चले जाता है। राजनीतिक पार्टियों का खजाना भरता चला जाता है।

यानी दुनिया में सबसे ज्यादा भूखे लोगों के देश में चुनाव पर सबसे ज्यादा रईसी के साथ खर्च कैसे किया जाता है और देश ही राजनीतिक सत्ता की हथेलियों पर नाचता हुआ दिखायी क्यों देता है जरा इसे चुनाव आयोग के अपने आंकडों से ही समझ लें। देश के पहले आम चुनाव 1951-52 में 10 करोड 45 लाख रुपये खर्च हुये। आर्थिक सुधार से एन पहले 1991 के आम चुनाव में 3 अरब 59 करोड 10 लाख रुपये खर्च हुये। 2004 के चुनाव में 13 अरब 20 करोड 55 लाख रुपयेखर्च हुये। और पिछले चुनाव यानी 2014 के चुनाव में 34 अरब 26 करोड 10 लाख रुपये खर्च हुये। यानी ये कल्पना के परे है कि देश की इक्नामी  में जितना उछाल आया। लोगों की आय में जितनी बढोतरी हुई। मजदूर-किसान को दो जून की रोटी के लिये जितना मिला, उससे हजार से कई लाख गुना ज्यादा की बढोतरी देश में चुनावी लोकतंत्र को जीने में खर्च हो गई। और इस तंत्र को  जीने के लिये अब हिमाचल और गुजरात तैयार हैं। जहां चुनाव कराने में जो भी खर्चा होगा उससे विकास की कितनी झडी लग जाती इस दिशा में ना भी सोचे तो भी 19 करोड भूखे नागरिको का पेट तो भरा ही जा सकता है । क्योंकि सिर्फ गुजरात में ही चुनाव कराने में ढाई अरब रुपये से ज्यादा देश के खर्च होगें । और चुनाव प्रचार में जब हर उम्मीदवार को 28 लाख रुपये खर्च करने इजाजत है तो दो अरब से ज्यादा सिर्फ उम्मीदवार अपने प्रचार में खपा देगें । क्योकि गुजरात की प्रति सीट पर अगर चार उम्मीदवारो के 28-28 लाख खर्च को जोडकर अगर चार उम्मीदवारो को ही माने तो एक करोड 12 लाख रुपये हो जाते है । और 182 सीट का मतलब है 2 अरब तीन करोड से ज्यादा ।

तो क्या वाकई चुनावी तंत्र इतना मजबूत हो चुका है कि वह लोकतंत्र पर हावी है या फिर लोकतंत्र के असल मिजाज को खारिज कर चुनाव को ही जानबूझ कर लोकतंत्र करार दिया गया है। क्योंकि सत्ता परिवर्तन की ताकत को ही लोकतंत्र मान लिया गया है। और बराबरी के वोट को ही गैर बराबरी की रोटी से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण मान लिया गया है ।
(साभार)

साहेब का मेरठ...2014 में 1857 का गदर और 2019 में गालिब की 'सराब'

2 फरवरी 2014 और 28 मार्च 2019 का अंतर सिर्फ तारिख भर का नही है । बल्कि भारत जैसे देश में कोई सत्ता कैसे पांच बरस में हाफंने लगती है । कैस...